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मॉन्ट्रियल सम्मेलन अंतिम दौर में | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जलवायु में हो रहे परिवर्तनों पर विचार के लिए कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में हो रहा अंतटरराष्ट्रीय सम्मेलन अपने अंतिम दौर में प्रवेश कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र के इस सम्मेलन में दुनिया के विभिन्न देशों के पर्यावरण मंत्री हिस्सा ले रहे हैं. अधिकारियों ने इससे पहले 10 दिनों तक इस बात पर चर्चा की कि कैसे क्योटो संधि में तय लक्ष्यों को हासिल किया जाए और इससे आगे क्या किया जाए. पर्यावरण मंत्री पर्यावरण को गर्म करनेवाली ग्रीनहाउस गैसों और पर्यावरण को लेकर एक किसी समझौते पर सहमति के प्रयास कर रहे हैं. इस बीच 1980 के दशक में ग्रीनहाउस प्रभाव पर सबसे पहले चेतावनी देने वाले प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ जेम्स हैनसन ने ग्रीन हाउस गैसों के संबंध में चेतावनी दी है. उन्होंने कहा है कि अगर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन वर्तमान गति से होता रहा तो 10 वर्षों के अंदर इसपर नियंत्रण करना असंभव हो जाएगा. पृथ्वी के बढ़ते तापमान के मुद्दे पर अमरीका के सैन फ्रांसिस्को और कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में एक साथ बहस हो रही है. सैन फ्रांसिस्को में जहाँ वैज्ञानिक नए शोध सामने रख रहे हैं तो वहीं मांट्रियल सम्मेलन में पृथ्वी का तापमान कम करने के व्यवहारिक तरीकों पर वार्ता हो रही है. चेतावनी डॉ जेम्स हैनसन ने सैन फ़्रांसिस्को में विशेषज्ञों की एक बैठक में कहा कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान पर बहस अब ख़त्म हो चुकी है क्योंकि अब सारा नियंत्रण इंसान के हाथ में है. हैनसन ने उम्मीद की किरण दिखाते हुए ये भी कहा कि अगर मीथेन जैसी गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाई जाए और वाहन उद्योग गैसों के उत्सर्जन पर विशेष ध्यान दे तो स्थिति संभल सकती है. इसी बहस को आगे बढ़ाते हुए यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी के कार्यकारी निदेशक जैकलीन मैक्गलेड ने कहा,"ट्रेन छूट चुकी है. हम सभी इस ट्रेन पर सवार हैं. हम चाहेंगे कि अमरीका भी हमारे साथ आए ताकि ऊर्जा से जुड़ी इस समस्या को सुलझाने में हम एक साथ मिलकर काम कर सकें." उन्होंने कहा कि हमारे पास ख़तरनाक परिणामों को रोकने के लिए अभी समय है. विरोध भी
सभी वैज्ञानिकों की नज़र मांट्रियल में हो रहे सम्मेलन पर भी थी और शायद यही कारण था कि वैज्ञानिक इस मुद्दे को गंभीर बनाने की पूरी कोशिश कर रहे थे. वैज्ञानिकों का कहना था कि लोग धरती के बदलते मिजाज़ को समझ नहीं रहे हैं. बर्फ़ तेज़ी से घट रही है और सूखे प्रदेशों में पानी और कम होता जा रहा है. इस पूरे विवाद में एक समूह ऐसा भी था जिसका कहना था कि प्रकृति के बदलते स्वरूप से धरती के तापमान के बढ़ने या घटने का कोई लेना देना नहीं है. एक तरफ़ तो कनाडा के मांट्रियल शहर में दस दिनों के लिए विभिन्न देशों के वरिष्ठ अधिकारी बहस में लगे थे वहीं इन बंद कमरों के बाहर सामाजिक कार्यकर्ता धुव्रीय भालू की वेशभूषा में प्रदर्शन कर रहे थे. अधिकारियों में ख़ासतौर पर बात हो रही है कि क्योटो संधि को व्यवहारिक तौर पर किस तरह लागू किया जाए. समस्या राजनीतिक है और अधिकारियों के सामने मुश्किल ये है कि भविष्य के लिए क्या योजना हो. बैठक की अध्यक्षता कर रहे कनाडा ने कुछ उपाय सुझाए हैं जिस पर ऑस्ट्रेलिया और चीन जैसे देश सहमत हैं जिन्होंने क्योटो में सुझाए गए उपायों से असहमति जताई थी. अब मुश्किल है भारत और तेल उत्पादक देशों और सबसे ज़रुरी अमरीका को मनाने की. अमरीका को मनाने के लिए 24 अमरीकी सांसदों ने राष्ट्रपति बुश को पत्र भी लिखा है. उन्हीं में से एक सांसद जैफ बिंगामेन, "हमें नेतृत्व देना होगा. हम 25 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हैं. हम दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं. हमें इस समस्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी." हालाँकि मॉन्ट्रियल सम्मेलन में अमरीकी प्रतिनिधिमंडल अब भी कनाडा सरकार के उपायों का विरोध कर रहा है. | इससे जुड़ी ख़बरें दुबई के रेगिस्तान में बर्फ़ ही बर्फ़04 दिसंबर, 2005 | मनोरंजन पर्यावरणवादियों के विश्वव्यापी प्रदर्शन03 दिसंबर, 2005 | पहला पन्ना सम्मेलन में अमरीका की आलोचना28 नवंबर, 2005 | पहला पन्ना 'मॉन्ट्रियल सम्मेलन से कोई उम्मीद नहीं'27 नवंबर, 2005 | विज्ञान यूरोप का शुक्र मिशन शुरू09 नवंबर, 2005 | विज्ञान इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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