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उम्र का बढ़ना सोच पर निर्भर है | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
उम्र वक़्त के साथ बढ़ती है, यह बात सही है. लेकिन उसका असर नज़र आने से रोका जा सकता है. और यह मुमकिन हो सकता है अच्छी, सकारात्मक सोच के ज़रिए. अमरीका के टेक्सास विश्विद्यालय में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि आशावादी नज़रिया रखने वालों पर निराशावादियों के मुक़ाबले उम्र का कम असर होता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि उम्र का असर कम करने में आनुवंशिक कारण और शारीरिक स्वास्थ्य भी अहम भूमिका निभाते हैं. यह अध्ययन साइकॉलॉजी ऐंड एजिंग पत्रिका में छपा है. टेक्सास के इस दल ने मेक्सिकन-अमरीकी समुदाय के अधिक आयुवर्ग के 1558 लोगों पर यह जानने के लिए अध्ययन किए कि क्या सकारात्मक सोच और शारीरिक अवस्था में कोई तालमेल है. सात साल चलने वाले इस अध्ययन के शुरुआती दौर में ये सभी लोग पूरी तरह तंदरुस्त और चाकचौबंद थे. उसके बाद यह पता चला कि वक़्त गुज़रने के साथ वे लोग ज़्यादा कमज़ोर होते चले गए या उन पर उम्र का असर ज़्यादा दिखाई देने लगा जो दुखी रहते थे. उनके विपरीत हर हाल में ख़ुश रहने वाले लोग युवा ही नज़र आते रहे. अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि सकारात्मक सोच और स्वास्थ्य के बीच सीधा तालमेल ढूँढने के लिए कुछ और खोज की ज़रूरत है. रासायनिक प्रभाव लेकिन यह कहा जा सकता है कि सकारात्मक भावनाओं का रासायनिक प्रभाव होता है. इस दल के नेता डॉक्टर ग्लेन ऑस्टिर ने बीबीसी से कहा, "मेरा मानना है कि दिमाग़ और शरीर के बीच सीधा संपर्क है. हमारी सोच और रवैया शरीर को पूरी तरह प्रभावित करते हैं और उसका असर स्वास्थ्य पर पड़ता है". इसी पत्रिका में छपे एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि केवल सोच ही नहीं बल्कि समाज के नकारात्मक और सकारात्मक रवैये से भी इस बात का सीधा संपर्क है. यानी अगर किसी व्यक्ति को यह एहसास दिलाया जाए कि वह समर्थ है और समाज को उसकी ज़रूरत है, तो वह ज़्यादा समय तक स्वस्थ रह सकता है. ख़ुद को बेकार और नाकारा समझने वाला व्यक्ति स्वंय को जल्दी ही बूढ़ा भी महसूस करने लगता है. |
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