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'मंगल पर कभी पानी था' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने कहा है कि उसका 'अपोर्च्यूनिटी रोवर' मंगल ग्रह पर जिस क्षेत्र में गया वहाँ कभी पानी होने के निशान पाए गए हैं. नासा का कहना है कि रोवर मंगल ग्रह के मध्यवर्ती इलाक़े के नज़दीक उतरा था जिसे मैरीडियानी प्लेनम के नाम से जाना जाता है. नासा ने मंगलवार को कहा कि उस इलाक़े में मौजूद चट्टानों की परतों को देखकर यही पता लगता है कि वे अतीत में भारी मात्रा में पानी के संपर्क में रही होंगी. नासा के एक वैज्ञानिक स्टीव स्क्वीरेस ने कहा, "उन चट्टानों का स्वरूप पानी के संपर्क में आकर ही बदला होगा और वे पानी की तली में बैठ गई होंगी." स्टीव स्क्वीरेस अमरीका के कोर्नेल विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता हैं और रोवर की वैज्ञानिक सामग्री के वही प्रधान जाँचकर्ता हैं. स्टीव स्क्वीरेस ने कहा कि उनकी टीम ने रोवर यान पर लगे कैमरों, दूरबीनों और अन्य मशीनी उपकरणों का बहुत ही अच्छा विश्लेषण किया है. स्टीव स्क्वीरेस ने मंगलवार को वाशिंगटन में एक संवाददाता सम्मेलन में बताया, "पिछले क़रीब एक पखवाड़े से हम लोग हर बारीक़ से बारीक़ टुकड़े का अध्ययन कर रहे थे और उसकी पहेलियों को सुलझा रहे थे." "क्या इन चट्टानों पर कोई असर हुआ? क्या उनका आकार बदलने में पानी का असर रहा? ऐसे सभी सवालों का ठोस जवाब है - हाँ." जीवन के निशान स्टीव स्क्वीरेस ने कहा कि इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए बहुत सारे सबूत हैं और उनमें से एक है-उन चट्टानों पर सल्फ़ेट रसायन की मौजूदगी.
"मंगल ग्रह पर जाने के इस अभियान का मक़सद यही जानना था कि क्या वहाँ कभी जीवन के अनुकूल हालात रहे हैं?." स्टीव स्क्वीरेस ने कहा कि ऐसा माना जा सकता है कि बहुत पहले मंगल ग्रह पर भारी मात्रा में पानी रहा होगा जिससे जीवन संभव हो सकता था. "लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि वहाँ यकीनन कभी कोई जीवन रहा होगा." ग़ौरतलब है कि 'अपोर्च्यूनिटी यान' के साथ जाने वाला दो पहियों का रोबोट स्पिरिट इस साल चार जनवरी को मंगल ग्रह पर पहुँचा था. अपोर्च्यूनिटी मंगल की दूसरी तरफ़ 25 जनवरी को पहुँचा. |
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