आसाम चाय की प्याली में तूफ़ान

चाय उत्पादन

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    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी न्यूज़

पूरी दुनिया में चाय के मशहूर ब्रांड असम टी पर <link type="page"><caption> जलवायु परिवर्तन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/09/130902_pests_climate_sks.shtml" platform="highweb"/></link> का ख़तरा मंडराने लगा है.

विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान और बारिश में हो रहे बदलाव के साथ सामंजस्य बिठाने में उत्पादन लागत बढ़ रही है. लेकिन उत्पादक बाज़ार में प्रतियोगिता के चलते दाम नहीं बढ़ा सकते.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है और इसके कुल उत्पादन का आधा हिस्सा असम से आता है.

वैज्ञानिक और चाय उत्पादक बताते हैं कि भारत के पूर्वोत्तर राज्य में सामान्य तापमान बढ़ चुका है. यहां सूखे मौसमों का अंतराल लंबा होने लगा है और बारिश के ढर्रे में लगातार बदलाव हो रहा है.

उत्तरी असम के डिब्रूगढ़ इलाक़े में चाय की खेती करने वाले मनीष बागड़िया कहते हैं, ''पहले यहां एक समान बारिश होती थी.''

<link type="page"><caption> कार्बन डाई ऑक्साइड ख़तरनाक स्तर पर </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/05/130511_science_carbon_dioxide_sp.shtml" platform="highweb"/></link>

वे कहते हैं, ''पिछले एक दशक से किसी ख़ास महीने में भारी बारिश हो जाती है, जिससे बगीचे की सतह की मिट्टी बह जाती है.''

लागत बढ़ी

सूखे मौसमों के लंबे हो जाने से फ़सलों पर कीट पतंगों का ख़तरा बढ़ रहा है, जिसके लिए अधिक से अधिक <link type="page"><caption> कीटनाशक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2013/09/130902_pests_climate_sks.shtml" platform="highweb"/></link> इस्तेमाल करना पड़ता है और इससे लागत बढ़ती जा रही है.

एक अन्य उत्पादक प्रभात बेजबरुआ बताते हैं कि कीट-पतंगे दशकों से सुसुप्ता अवस्था में थे, लेकिन अब सभी प्रकार के कीटों की संख्या बढ़ने लगी है.

कुछ उत्पादकों कहना है कि इन कीटों से मुक़ाबला तो किया जा सकता है, लेकिन बारिश के ढर्रे में आए बदलाव से निपटना मुश्किल है.

असम के चाय बागान बारिश और सूरज की रोशनी के मामले में बहुत ही उपयुक्त स्थान पर हैं, पर यह संतुलन अब समाप्त हो रहा है.

हाल ही में असम के चाय बगानों पर जलवायु परिवर्तन के असर का अध्ययन करने वाले आईआईटी, गुवाहाटी के प्रोफ़ेसर अरूप कुमार शर्मा भी उत्पादकों की बातों से सहमत नज़र आते हैं.

प्रो. शर्मा के अनुसार, ''अध्ययन में जो नतीजे सामने आए, उससे पता चलता है कि इन इलाक़ों में सूखे मौसम का अंतराल लंबा होगा और मानसून के दौरान भी भारी बारिश की बारंबारता बढ़ेगी.''

उनके अनुसार, शोधकर्ताओं के समूह ने पाया कि मॉनसून में बारिश के समय में बदलाव हुआ है और यह चाय उत्पादन को प्रभावित करेगा.

बारिश में बदलाव

map tea production

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इमेज कैप्शन, 2050 तक तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी होने पर उत्पादन में पड़ने वाला प्रभाव प्रतिशत में.

उन्होंने बताया, ''कुछ इलाक़ों में पहले से ही मानसून लेटलतीफ़ होता रहा है और इसका मतलब है कि लोग केवल मार्च में ही चाय की पत्तियां तोड़ सकते हैं, जबकि आधी सदी से फ़रवरी में पत्तियां तोड़ी जाती रही हैं.''

शर्मा के अनुसार, अभी बारिश का प्रमुख समय जून या जुलाई है जबकि हमारे आंकड़े बताते हैं कि भविष्य में बारिश का मुख्य महीना सितंबर होगा.

हालांकि, भारतीय चाय संघ के अनुसार, पिछले साल असम ने 62 करोड़ किलो चाय का उत्पादन किया, जोकि 2012 के मुकाबले तीन करोड़ किलो ज़्यादा है.

टी रिसर्च एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने एक अध्ययन कराया था. इसमें भी तापमान बढ़ने और बारिश के मौसम के छोटे होने की बात सामने आई थी.

एसोसिएशन निदेशक आरएम भागवत कहते हैं, ''हमें वॉटर हार्वेस्टिंग और फ़ौव्वारा सिंचाई आदि का सहारा लेना होगा. इससे लागत तो थोड़ी बढ़ेगी, लेकिन उत्पादन भी बढ़ेगा.''

केन्या को फ़ायदा

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चाय के उत्पादन के क्षेत्र में भारत के मुख्य प्रतिद्वंद्वी केन्या और श्रीलंका हैं.

विशेषज्ञों का कहना है कि तापमान में वृद्धि से केन्या को फ़ायदा हो रहा है, क्योंकि पिछले दिनों ठंड से यहां चाय उद्योग काफ़ी प्रभावित रहा है, जबकि श्रीलंका की स्थिति असम जैसी ही है.

कोलंबो टी ट्रेडर एसोसिएशन के अध्यक्ष केरागाला जयंथा कहते हैं, ''आजकल यहां 20 से 30 मिनट अंतराल वाली भारी बारिश बढ़ी है.''

उनका कहना है कि अभी तक पौधे ऐसी बारिश से अधिक प्रभावित नहीं हुए हैं, लेकिन आने वाले 10-15 वर्षों में स्थितियां और मुश्किल हो जाएंगी.

असम के चाय उत्पादकों के सामने यह स्थिति पहले ही आ चुकी है.

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