क्या पाकिस्तान मार्शल लॉ की ओर बढ़ रहा है?

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- Author, अहमद राशिद
- पदनाम, लेखक एवं पत्रकार, पाकिस्तान
21 जनवरी की तारीख पाकिस्तान में आम दिनों जैसी ही थी. उस दिन बलोचिस्तान सूबे में क्वेटा शहर के पास एक फ़िदायीन हमले में 29 शिया मुसलमानों की मौत हो गई.
इस वारदात में सुन्नी चरमपंथियों का हाथ बताया गया. एक फ़िदायीन बम हमलावर ने विस्फोटकों से लदी एक कार से एक मुसाफिर बस को टक्कर मार दी जिसमें मारे गए शिया मुसलमान सफ़र कर रहे थे. इस बीच कराची में तीन शिया मुसलमानों को गोली मार दी गई.
<link type="page"><caption> (नाज़ुक दोराहे पर पाकिस्तान)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/01/140126_pakistan_political_analysis_vr.shtml" platform="highweb"/></link>
ये एक और हमला था जिसकी जिम्मेदारी सुन्नी चरमपंथियों ने ली. और ठीक इसी रोज जाने माने ऊर्दू लेखक और प्रोफेसर असगर नदीम को लाहौर में अज्ञात बंदूकधारियों ने जख्मी कर दिया. ये सिलसिला यहीं नहीं रुका. कराची में पोलियो की दवा पिला रहे तीन कार्यकर्ताओं को तालिबान चरमपंथियों ने हलाक़ कर दिया. इस हमले में दो औरतें भी मारी गईं.
कराची में ये हफ्ते भर के अर्से में तीसरा हमला था. इस बीच पाकिस्तानी फौज़ ने ये दावा किया कि उसके बम हमले में 40 चरमपंथी मारे गए हैं. इस दावे के एक दिन पहले ही रावलपिंडी में सेना मुख्यालय के पास एक फ़िदायीन हमला किया गया था. फौज़ की कार्रवाई को बदला चुकाने की नज़र से देखा गया.
चरमपंथियों से बातचीत
एक दिन पहले ही देश के उत्तर-पश्चिम में फौज़ की एक टुकड़ी पर बम हमला किया गया जिसमें 20 जवान हलाक़ हो गए. फौज़ की ओर से ताकत के इस्तेमाल ने तालिबान को और हमले करने का बढ़ावा ही दिया. 22 जनवरी को देश में हुई अलग अलग हिंसक घटनाओं में 12 सुरक्षा कर्मी मारे गए.
<link type="page"><caption> (तालिबान का कब्जा)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/01/140127_afghanistan_foreign_troop_rns.shtml" platform="highweb"/></link>
पाकिस्तान में हिंसा का ये आलम लगातार जारी है. ऐसा पहले कभी देखा-सुना नहीं गया और अब ये भयानक हो चला है. बीते महीनों में देश छोड़ने वाले लोगों की तादाद भी बढ़ी है. मुल्क के अभिजात्य और कुलीन वर्ग के लोग अपने बच्चों को देश से बाहर भेज रहे हैं.
महीनों तक नवाज़ शरीफ़ की सरकार चरमपंथियों से बातचीत की बेमतलब की नीति पर अमल करने की कोशिश करती रही लेकिन कोई रास्ता नहीं खुल पाया और अब वो इस रास्ते पर घिसटती हुई दिख रही है. इस मुद्दे पर नवाज़ शरीफ़ की सरकार लाचार लग रही है, मसले से संजीदगी के साथ निपटने की उनकी कोई चाहत नहीं दिखती.
सरकार की कमजोरी

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सब कुछ बातचीत की झूठी उम्मीद के सहारे छोड़ दिया गया लगता है और सेना को चरमपंथियों पर कार्रवाई करने के आदेश दिए जा रहे हैं. बीते साल जून में सत्ता सँभालने के बाद आर्थिक सुधार, भारत के साथ अमन, अफगानिस्तान के साथ बातचीत और घर में चरमपंथ से निपटने जैसे मसलों पर नवाज़ शरीफ़ की हुकूमत अपने वादे के मुताबिक बहुत सुस्त रफ्तार में आगे बढ़ी है.
<link type="page"><caption> (पोलियो अभियान टला)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/01/140126_pakistan_polio_rns.shtml" platform="highweb"/></link>
मालूम पड़ता है कि उन पर जिम्मेदारियों का भारी बोझ है और वे कुछ कर नहीं पा रहे हैं और कई लोगों को ये डर है कि शरीफ़ ने हार मान ली है. नागरिक सरकार और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है.
लगातार हलाक़ होते अपने जवानों और फैसले लेने में सरकार की कमजोरी के कारण फौज़ नवाज़ शरीफ़ की हुकूमत से बुरी तरह से निराश है. हालांकि न तो फौज ने और न ही सरकार ने चरमपंथ के खिलाफ बर्दाश्त न करने के रवैये का जरा सा भी कोई इशारा किया है जिसका मतलब सभी चरमपंथी गुटों पर कार्रवाई करना होगा.
फ़िदायीन हमले

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इनमें वे पंजाबी गुट भी हैं जोकि कश्मीर में भारत की हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. लगातार हमलों से सुरक्षा बलों और आम लोगों को निशाना बनाकर चरमपंथियों का हौंसला हर रोज बढ़ रहा है जबकि इन हमलों से प्रभावित लोगों में निराशा का माहौल है.
<link type="page"><caption> (शिया ज़ायरीन की मौत)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/01/140121_pak_shia_killed_sdp.shtml" platform="highweb"/></link>
पाकिस्तानी तालिबान पहले तो केवल सुरक्षा बलों और आम नागरिकों को निशाना बनाते थे लेकिन अब वे मस्जिदों, गिरिजाघरों और बाजारों पर बम बरसा रहे हैं और बीते कुछ महीनों में तालिबान राजनेताओं, नौकरशाहों और फौज़ और पुलिस के आला अफसरों की हत्याएँ करने के मामलों में उस्ताद हो गया है.
तालिबान ने इन हमलों को अंजाम देने के लिए फ़िदायीन हमलों, बंदूकधारी हमलावरों और सड़क किनारे बारूदी सुरंगें बिछाकर इन हमलों को अंजाम दिया. इस बीच पाकिस्तान में सुन्नी चरमपंथियों के गुट लश्कर-ए-झांगवी ने देश भर में शिया मुसलमानों के खिलाफ कत्लोगारत की मुहिम चला रखी है.
युद्ध अपराध

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इसके नेता पंजाब सूबे में खुले आम घूमते हैं और उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाता है. पाकिस्तान में शियाओं के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान अब पूरे देश में फैल गया है और इसका असर हर शहर और सूबे पर देखा जा सकता है. इसमें पंजाब सूबा भी शामिल है जिसे हाल तक महफूज़ माना जाता था.
<link type="page"><caption> (पाकिस्तान का हिंदू मंदिर)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2014/01/140108_katasraj_temple_va.shtml" platform="highweb"/></link>
21 जनवरी को ही जारी की गई ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट में कहा गया है, "पूरे पाकिस्तान में चरमपंथी गुटों को अपनी गतिविधियाँ अंजाम देने की खुली छूट हासिल है. कानून लागू करने वाली एजेंसियों और अफसरों ने या तो अपनी आँखें बंद कर रखी हैं या हमलों को रोक पाने में लाचार हो गए हैं."
रिपोर्ट के मुताबिक तालिबन के हमले अब युद्ध अपराधों की तरह हो गए हैं. हालात इस कदर खराब हैं कि पाकिस्तान को पोलियो मुक्त कराने के लिए पैसे दे रही अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के मुखिया बिल गेट्स ने हिंसा की वजह से मदद रोकने के संकेत दिए हैं. तालिबान ने पिछले दो सालों के दौरान तकरीबन 30 पोलियो कार्यकर्ताओं को मार दिया गया है.
पाकिस्तान तालिबान

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हर किसी को ये मालूम है कि क्या किए जाने की जरूरत है. लोग सोचते हैं कि शरीफ़ को टीवी पर आकर देश से बात करनी चाहिए और ये बताना चाहिए कि हालात किस कदर खराब हो गए हैं. उसके बाद विपक्षी राजनीतिक दलों को अपने साथ लाने की जरूरत है.
<link type="page"><caption> (राजनेताओं पर हमले)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/01/140112_pakistan_politicians_attacted_aa.shtml" platform="highweb"/></link>
और जो ऐसा नहीं करते हैं उन्हें सरकार और फौज की ओर से चरमपंथियों का समर्थन करने के लिए शर्मिंदा किया जाना चाहिए और सबसे आखिर में उत्तरी वज़ीरिस्तान में जहाँ चरमपंथियों का सबसे प्रमुख गढ़ है, फौज़ को कार्रवाई करने का आदेश दिया जाना चाहिए.
बहरहाल पिछले कुछ महीनों में परेशानियाँ और बढ़ गई हैं. जो चरमपंथी पहले अलग अलग गुटों में स्वतंत्र रूप से सक्रिय थे, वे अब कराची, सिंध, पंजाब और बलोचिस्तान सूबे में पाकिस्तान तालिबान के झंडे तले इकट्ठा हो रहे हैं. उनका इरादा सिस्टम पर कब्जा करना, फौज़ को हराना और मुल्क में मजहबी हुकूमत लागू करना है.
मार्शल लॉ

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इराक़ और सीरिया में अल-कायदा को नाटकीय रूप से दोबारा उठते हुए दुनिया देख चुकी है. सीरिया में गृह युद्ध की स्थिति दिन पर दिन खराब होती जा रही है. किसी ने नहीं सोचा था कि अल कायदा के पास इतनी ताकत आ जाएगी कि वो शहरों पर कब्ज़ा कर लेंगे लेकिन इराक़ में फालुजा और रमादी पर कब्जा करके अल-कायदा ने ये दिखा दिया है.
<link type="page"><caption> (कितना कामयाब होगा पाकिस्तान?)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2014/01/140110_pakistan_disinvestment_vr.shtml" platform="highweb"/></link>
ठीक इसी तरह पाकिस्तान के सरहदी शहर पेशावर और क्वेटा में भी सुरक्षा हालात बिगड़ गए हैं. बंदरगाह और कारोबारी ठिकाने कराची के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं और वो दिन अब दूर नहीं जब कोई शहरी इलाका या उसका कोई हिस्सा पाकिस्तानी तालिबान के कब्जे में चला जाए.
अगर मुल्क की मौजूदा सुरक्षा स्थिति और बिगड़ती है तो तालिबान का अगला निशाना शहरी ठिकानों में बगावत भड़काना होगा. सेना और नागरिक सरकार के बीच बढ़ते तनाव का नतीजा फौज़ के नियंत्रण वाली हुकूमत या फिर मुल्क में मार्शल लॉ में बदल सकता है.
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