अब ज़हर से नहीं डरते हैं खटमल

खटमल और इंसानों के बीच 'खून का रिश्ता' है. इंसान की लाख कोशिशों के बाद भी <link type="page"><caption> खटमल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2010/09/100903_bedbugs_ap.shtml" platform="highweb"/></link> सदियों से उसके साथ हमबिस्तर हैं और लगता है कि यह नाता टूटने वाला नहीं.
खटमलों को मारने के लिए लोग कई तरीके अपनाते हैं, जहरीली दवाओं का छिड़काव भी इनमें शामिल है. लेकिन अब खटमलों ने इनसे बचने का तरीक़ा खोज लिया है.
अमरीका में हुए एक शोध में पता चला है कि खटमलों की चमड़ी मोटी हो गई है. इस वजह से कई ज़हरीली दवाएं रिसकर उनके शरीर में नहीं जा पाती हैं.
‘साइंसटिफ़िक जर्नल’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित शोध के मुताबिक़ वैज्ञानिकों ने इससे जुड़े जैविक बदलाव वाले 14 जीन का पता लगाया है.
बेअसर हैं दवाएं
शोध के मुताबिक़ इनमें खटमलों की चमड़ी का मोटा हो जाना भी शामिल है. मोटी चमड़ी ज़हर को रिस कर अंदर जाने से रोकती है. इस वजह से ज़हरीले पदार्थ खटमल के तंत्रिका तंत्र को प्रभावित नहीं कर पाते हैं.
अध्ययन में यह भी पता चला है कि खटमल कुछ ऊंचे दर्जे का एंजाइम भी बना रहे हैं, जो कीटनाशकों के मेटाबॉलिजम की रफ़्तार को तेज़ कर देते हैं.
अमरीका के केंटकि विश्वविद्यालय में कीट विज्ञान के प्रोफ़ेसर और इस शोध के लेखकों में से एक सुब्बा पिल्लई कहते हैं कि ऐसे साहसी कीड़े आणविक तरक़ीबों का सहारा ले रहे हैं.
वे बताते हैं, ''खटमल कीटनाशकों के प्रभाव से बचने के लिए प्रतिरोध की एक से अधिक तकनीकों को अपनाते हैं.''
खटमल वैसे तो पूरी दुनिया में पाए जाते हैं. लेकिन हाल के वर्षों में ये यूरोप, अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया में इनकी बाढ़ सी आ गई है.
खटमल सोए हुए इंसान का ख़ून चूसकर ही ज़िंदा रहते हैं. ख़ून चूसने के बाद वे खुजली और लाल चकत्ते छोड़ जाते हैं.
<link type="page"><caption> खटमल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2011/02/110202_bugs_fma.shtml" platform="highweb"/></link> से छुटकारा पाना आसान नहीं है. ये कई महीने तक बिना खाए-पिए रह सकते हैं. ये तबतक खु़द को छिपाए रखते हैं, जबतक कि उनका शिकार वापस नहीं आ जाता.
खटमलों को मारने के लिए दुनियाभर में कृत्रिम कार्बनिक यौगिक पायरथ्राइड का इस्तेमाल किया जाता है. एक समय तो यह खटमल मारने के लिए बहुत प्रभावशाली दवा थी. लेकिन अब ऐसा नहीं है.
प्रोफ़ेसर पिल्लई बताते हैं कि ज़हर से होने वाली मौत से बचने के लिए <link type="page"><caption> खटमलों ने जैविक तंत्र</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/2010/09/100903_bedbugs_ap.shtml" platform="highweb"/></link> विकसित कर लिए हैं.
अध्ययन के लिए विश्विवद्यालय के पास के अपार्टमेंट से कीटों की 21 प्रजातियां ली गई थीं.
इनके अध्ययन से पता चला कि खटमल में खोजे गए जीन, जो पायरथ्राइड से बचने की प्रतिरोधक क्षमता रखते थे, वे खटमल के चमड़ी में थे.
अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे वैज्ञानिकों अधिक प्रभावशाली रसायन विकसित करने में मदद मिलेगी.
प्रोफ़ेसर पिल्लई कहते हैं कि भारत जैसे देशों में जहाँ खटमल बहुत बड़ी समस्या नहीं हैं, लोग अपने फ़र्नीचर को धूप में रख देते हैं. धूप की वजह से खटमल नीचे गिरकर मर जाते हैं.
वे कहते हैं कि अमरीका में भी खटमल मारने के लिए कुछ इसी तरह की तरकीब अपनाई जा रही है.
इसका सबसे अच्छा तरीका यह है कि खटमल वाली जगह को 30-35 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म कर दिया जाए, इसके बाद खमटल गर्मी की वजह से खुद बाहर आएंगे और मर जाएंगे.












