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वीडियो गेम कैसे बन रहे हैं चरमपंथियों के नए हथियार
- Author, कार्ल मिलर और शिरोमा सिल्वा
- पदनाम, बीबीसी क्लिक
पिछले क़रीब तीन महीनों के शोध में पाया गया है कि यहूदी-विरोधी विचारधारा, नस्लभेद और समलैंगिकों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए वीडियो गेमों का इस्तेमाल हो रहा है.
डीलाइव और ओडिसी जैसी लाइव स्ट्रीमिंग सर्विसेज़ पर इस बारे में चैट होता है.
इन जगहों पर कॉल ऑफ़ ड्यूटी और माइनक्राफ्ट जैसे वीडियो गेमों को लेकर बातचीत होती है.
बाद में बातचीत टेलीग्राम जैसे प्राइवेट मैसेजिंग ऐप्स पर शिफ़्ट हो जाती है.
इस क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का कहना है कि रोज़ाना की बातचीत में चरमपंथ से जुड़े नैरेटिव को शामिल करने से लोगों का उग्रवाद की ओर झुकाव पैदा हो सकता है.
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रोबलौक्स और माइनक्राफ्ट जैसे प्लेटफार्म का हो रहा इस्तेमाल
शोधकर्ताओं ने ये भी पाया कि जिन गेमों में खेलने वाला अपनी भूमिका चुन सकता है या अपने माहौल के हिसाब से बदलाव कर सकता है, उसका इस्तेमाल ऐसे कामों के लिए हो रहा है.
इनमें रोबलौक्स और माइनक्राफ्ट जैसे प्लैटफार्म और गेम क्रिएशन सिस्टम शामिल हैं. इन जगहों पर नाज़ी यातना शिविरों और चीन के वीगर मुस्लिमों के लिए तैयार शिविर होते हैं.
रोबलौक्स के एक गेम में तो प्लेयर को नस्लवादी व्यक्ति की भूमिका निभाने को कहा जाता है, जिसमें वो अल्पसंख्यकों को अपनी गाड़ी से कुचल सकता है.
इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्ट्रैटेजिक डॉयलाग के जैकब डेवी ने कहा, ''इनका इस्तेमाल बहुत ज़्यादा लोग नहीं करते, लेकिन इन पर अतिवादी विचार रखने वाला भूमिका तैयार कर अपनी उग्रवादी फंतासी को ऑनलाइन जी सकता है.''
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गेमिंग कंपनियों का दावा-दुरुपयोग रोकने के लिए तैयार
रोबलौक्स का इस बारे में कहना है, "हमारे पास दो हज़ार मॉडरेटर और तकनीक हैं, जो प्लेटफॉर्म को सुरक्षित रखने के लिए लगातार चौबीसों घंटे काम करते रहते हैं. हमारी कोशिश रहती है कि बातचीत सभ्य और शालीन रहे. यदि हमें इस तरह का कोई भी कंटेट दिखता है, तो हम उस पर फौरन कार्रवाई भी करते हैं."
वहीं माइनक्राफ्ट ने कहा है, "आतंकवाद और हिंसा से संबंधित कंटेंट पर हमारे यहां पूरी तरह से रोक है. ये हमारी नीति और मानक के विरुद्ध है. यदि हमारे सिस्टम पर ऐसा कोई कंटेंट आ भी जाता है, तो हम उसे वहां से हटाने के लिए फौरन क़दम उठाते हैं.''
हालांकि शोधकर्ताओं का कहना है कि सोशल मीडिया पर नियमों को सख़्ती से लागू करने के बाद लगता है कि चरमपंथियों ने गेमिंग साइट्स का रुख़ कर लिया है.
इस पर डेवी ने कहा, "अतिवादी विचारधारा वालों को अपनी विचारधारा फैलाने के लिए ये सुरक्षित स्थान मिल गया है या फिर ये कह सकते हैं कि वो यहां प्रॉपगैन्डा के पुराने तरीक़ों का इस्तेमाल कर सकते हैं."
वे कहते हैं, "ऑनलाइन गेमिंग के माध्यम से एक जैसी हॉबी रखने वाले अपने तरह के लोगों से मिला जा सकता है. इसमें चरमपंथी विचारधारा के लोग भी शामिल है. इस माध्यम से वो अपने जैसी सोच रखने वालों से जुड़ सकते हैं. उनसे सामाजिक जुड़ाव क़ायम कर सकते हैं, जो आगे चलकर और मज़बूत हो सकता है. ये इसलिए अहम हो जाता है कि इससे दुनिया भर में उग्रवादी विचारधारा को आगे बढ़ाया जा सकता है."
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गेम के बहाने राजनीति
फासीवाद विरोधी संगठन 'होप नॉट हेट' के जो मुल्हाल का कहना है, ''एक बार जब आप इस दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं तो कट्टरता पांव जमाने लगती है. तब आप दूसरी बैठकों में छोटे-छोटे समूहों में शामिल होने लगते हैं, जो ज़रूरी नहीं कि गेम खेल रहे हों बल्कि राजनीति पर खुलकर बात कर रहे हों."
बीबीसी के सवाल के जवाब में टेलीग्राम ने कहा कि वो इस मामले पर सक्रिय तौर पर निगाह रखते हैं और ऐसे कंटेंट को हटा देते हैं. हालांकि डिलाइव और ओडिसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.
दोनों का कहना है कि उनकी नीतियां नफ़रत और हिंसक उग्रवाद के प्रति सख़्त रवैया रखती है और वो दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने वाले कंटेंट को हटाने में ख़ुद पहल करते हैं.
जो मुल्हाल ने बताया कि स्कूल या काम के बाद जब आप घर पर बैठकर गेम खेलते हैं तो खेल में ये सब सामान्य लगने लगता है. लेकिन आपको अहसास ही नहीं होता कि यह कितना ख़तरनाक हो सकता है.
कम नज़र रखने वाली जगहों का हो रहा इस्तेमाल
रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज इंस्टीट्यूट, आतंकवाद का मुक़ाबला करने वाले विशेषज्ञों के एक समूह का हिस्सा है. इसने बड़े पैमाने पर ऑनलाइन गेमिंग की जांच पड़ताल शुरू की है, ताकी चरमपंथ का मुक़ाबला किया जा सके.
रक्षा मामलों के थिंक टैंक की एक सदस्य डॉ. जेसिका वाइट ने कहा, "ऑनलाइन और चैट स्पेस, जहां इन बातों पर कम नज़र रखी जाती हो, उन्हें चरमपंथी धीरे-धीरे हथियाने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि हमें इस मामले पर तथ्य जुटाने की ज़रूरत है."
सरकार भी गेमिंग इंडस्ट्री से विचार-विमर्श कर रही है ताकि चरमपंथियों के हाथों गेमिंग स्पेस के ग़लत इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सके.
ब्रिटेन की गेमिंग इंडस्ट्री से जुड़ी संस्था का कहना है कि इस पर रोक लगाने के लिए वो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करते हैं और सरकारी एजेंसियों के भी लगातार संपर्क में रहते हैं, ताकि गेम खेलने वालों को सुरक्षित रखा जा सके.
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