फ़ेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया में न्यूज़ बंद की, सरकार से ठनी, आगे क्या होगा?

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ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा है कि फ़ेसबुक के देश में यूज़र्स के लिए न्यूज़ सामग्री पर प्रतिबंध लगाने से उनकी सरकार नहीं डरती.
उन्होंने कहा कि "ऑस्ट्रेलिया को अनफ्रेंड" करने की फ़ेसबुक की कोशिश दुर्भाग्यपूर्ण है.
इससे पहले सोशल मीडिया कंपनी फ़ेसबुक ने गुरुवार को ऑस्ट्रेलिया में न्यूज़ से जुड़ी सामग्री को प्रतिबंधित कर दिया है. गूगल ने भी कहा है कि वह ऑस्ट्रेलिया में अपना सर्च इंजन बंद कर सकता है.
दुनिया की इन दो बड़ी टेक कंपनियों और ऑस्ट्रेलिया सरकार के बीच विवाद की वजह एक प्रस्तावित क़ानून है जो कि टेक कंपनियों और मीडिया संस्थाओं के बीच बाज़ार में शक्ति संतुलन स्थापित करने के लिए लाया जा रहा है.
ऑस्ट्रेलियाई संसद के निचले सदन में प्रस्तावित क़ानून को पारित कर दिया गया है. अब ये प्रस्तावित क़ानून सीनेट में पास होने की प्रक्रिया में है.
लेकिन पहले जान लेते हैं कि आख़िर ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां ऑस्ट्रेलिया पर किस बात को लेकर दबाव बना रही हैं.

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आख़िर क्या है मामला?
वर्ल्ड फर्स्ट नाम के इस प्रस्तावित क़ानून का उद्देश्य विज्ञापन का राजस्व अमेरिकी टेक कंपनियों को जाने से मीडिया को हो रहे आर्थिक नुकसान का हल निकालना है.
अगर ये विधेयक पारित हो जाता है तो टेक कंपनियों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. इसके साथ ही इंटरनेट पर उपलब्ध न्यूज़ सामग्री तक लोगों की पहुंच भी प्रभावित हो सकती है.
इस मुद्दे पर लंबे समय से बात हो रही है और चिंता जताई जा रही हैं कि टेक कंपनियों का मीडिया संस्थाओं पर बाज़ार के स्तर पर प्रभुत्व है.
ऑस्ट्रेलिया में गूगल एक मुख्य सर्च इंजन है जिसे सरकार द्वारा बेहद आवश्यक सेवा के रूप में परिभाषित किया गया है और जिसकी बाज़ार प्रतिस्पर्धा बेहद कम है.
आस्ट्रेलियाई सरकार की नियामक संस्था ऑस्ट्रेलियाई प्रतिस्पर्धा एवं उपभोक्ता आयोग (एसीसीसी) ने साल 2018 में मीडिया एवं विज्ञापन के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी माहौल पर गूगल एवं फ़ेसबुक के असर को लेकर जाँच का आदेश दिया था.
संस्था ने पाया कि मीडिया एवं टेक कंपनियों के बीच शक्ति का असंतुलन है. इस आधार पर संस्था ने एक क़ानून बनाने की सिफारिश की जो कि दोनों तरह की कंपनियों के बीच शक्ति संतुलन स्थापित करेगी.
पिछले साल जुलाई महीने में ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने एक नए विधेयक को पेश किया था जिसकी वजह से फेसबुक और गूगल ने ऑस्ट्रेलिया में अपनी सेवाएं देना बंद करने की धमकी दी थी.

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इस क़ानून में क्या ख़ास है?
इस प्रस्तावित क़ानून में ये व्यवस्था की गई है कि टेक कंपनियां न्यूज़ सामग्री के लिए भुगतान करें. हालांकि, अब तक ये स्पष्ट नहीं किया गया है कि उन्हें कितना भुगतान करना होगा.
ये क़ानून एक संगठन के रूप में मीडिया संस्थाओं को टेक कंपनियों से नेगोशिएट करने की ताकत देगा ताकि उस सामग्री की कीमत तय हो सके जो कि टेक कंपनियों की न्यूज़ फीड और सर्च रिज़ल्ट्स में नज़र आती है.
अगर ये समझौता असफल हो जाता है तो ऐसे मामले ऑस्ट्रेलिया कम्युनिकेशंस एवं मीडिया अथॉरिटी के समक्ष जा सकते हैं.
प्रस्तावित क़ानून के अनुसार अगर इस तरह के मामले में टेक कंपनियां दोषी पाई गई तो कंपनी को प्रत्येक ग़लती पर दस मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 56 करोड़ रुपये) देने होंगे या फिर कंपनी के स्थानीय टर्नओवर का दस फीसदी हर्जाने के तौर पर चुकाना होगा.
सरकार के मुताबिक़, इस क़ानून के तहत सबसे पहले गूगल और फे़सबुक पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा लेकिन ये अन्य कंपनियों पर भी लागू हो सकता है.

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आस्ट्रेलिया क्यों ला रहा है ये क़ानून?
सरकार का तर्क है कि टेक कंपनियों को न्यूज़ रूम को उनकी पत्रकारिता के लिए उचित कीमत अदा करनी चाहिए. इसके साथ ही ये तर्क भी दिया गया है कि ऑस्ट्रेलिया की न्यूज़ इंडस्ट्री के लिए आर्थिक मदद की ज़रूरत है क्योंकि मज़बूत मीडिया लोकतंत्र की ज़रूरत है.
न्यूज़ कॉर्प ऑस्ट्रेलिया (रुपर्ट मर्डोक के मीडिया घराने की एक कंपनी) जैसी मीडिया कंपनियां ने विज्ञापन से होने वाली आय में दीर्घकालिक कमी आने के बाद सरकार पर दबाव बनाया है कि वह टेक कंपनियों को बातचीत के लिए तैयार करे.
ऐसे समय जब मीडिया कंपनियों की कमाई में कमी आ रही है तब गूगल की कमाई में बढ़त देखी जा रही है. साल 2019 में वैश्विक स्तर पर गूगल ने 160 बिलियन डॉलर से ज़्यादा की कमाई की है.
क्या है फे़सबुक की प्रतिक्रिया?
फे़सबुक ने ऐलान किया था कि वह ऑस्ट्रेलियाई यूज़र्स को न्यूज़ सामग्री देखने और शेयर करने से प्रतिबंधित करेगा. फे़सबुक ने कहा है कि प्रस्तावित क़ानून “हमारे प्लेटफॉर्म और प्रकाशकों के बीच रिश्ते को मूल रूप से नहीं समझता” है.
फे़सबुक कहता है कि प्रस्तावित क़ानून ने उन्हें “एक मुश्किल विकल्प चुनने पर बाध्य किया है – इस क़ानून का पालन करें जो कि इस रिश्ते की असलियत की अनदेखी करता है, या ऑस्ट्रेलिया में हमारी सेवाओं में न्यूज़ सामग्री के प्रयोग की अनुमति देना बंद करें.”
फे़सबुक ने कहा है कि “बेहद भारी दिल से हम दूसरे विकल्प को चुन रहे हैं.”
इसके साथ ही फेस़बुक ने ऑस्ट्रेलिया में न्यूज़ सामग्री को प्रतिबंधित कर दिया है. कई यूज़र्स ने कहा है कि वे फे़सबुक पर न्यूज़ सामग्री नहीं देख पा रहे हैं.

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गूगल की प्रतिक्रिया क्या रही?
गूगल ने कहा है कि अगर ये विधेयक पारित हो जाता है तो वह ऑस्ट्रेलिया में अपना सर्च इंजन बंद कर देगा. लेकिन गूगल ने अब ये भी कहा है कि वह मुर्डोक की न्यूज़ कॉर्प को उसकी सामग्री के लिए पैसे देने के लिए तैयार है.
न्यूज़ कॉर्प ने कहा है कि वह एक निश्चित भुगतान राशि के बदले में गूगल के साथ अपनी सामग्री साझा करेगा.
न्यूज़ कॉर्प ने कहा है कि वह और गूगल तीन साल के अनुबंध के तहत एक सब्सक्रिप्शन प्लेटफॉर्म विकसित करेंगे. इसके तहत विज्ञापन से होने वाली आय को साझा किया जाएगा और यूट्यूब पर वीडियो जर्नलिज़्म में निवेश किया जाएगा.
गूगल ने भी अन्य ऑस्ट्रेलियाई कंपनियों के साथ समझौता करने की घोषणा की है जिसमें नाइन एंटरटेनमेंट को 30 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर देने की डील शामिल है.
ऐसे में ये स्पष्ट नहीं है कि प्रस्तावित क़ानून पारित होने के बाद गूगल क्या कदम उठा सकता है.
क्या ये वैश्विक बदलाव की शुरूआत है?
ऑस्ट्रेलिया के कुछ राजनेता और मीडिया विश्लेषक मानते हैं कि इस क़ानून के अस्तित्व में आने से एक बड़ा बदलाव आ सकता है.
ऑस्ट्रेलियाई सीनेटर रेक्स पेट्रिक ने गूगल से कहा है, “ये दुनिया भर में होने जा रहा है... क्या आप हर बाज़ार से बाहर निकलने जा रहे हैं?”
फे़सबुक और गूगल की तुलना में माइक्रोसॉफ़्ट की ओर से एक अलग तरह की प्रतिक्रिया आई है. माइक्रोसॉफ़्ट ने इस प्रस्तावित क़ानून का समर्थन किया है.
माइक्रोसॉफ़्ट ने कहा है, “ये क़ानून तार्किक रूप से ऑस्ट्रेलियाई न्यूज़ प्रतिष्ठानों और डिज़िटल मंचों के बीच शक्ति के असंतुलन को ठीक करने का प्रयास करता है.”
यूरोप में भी इसी तरह का लेकिन थोड़ा अलग विवाद खड़ा होता दिख रहा है. यूरोपीय संघ का एक विवादित कॉपीराइट क़ानून कहता है कि सर्च इंजन और न्यूज़ एग्रीगेटर्स को उनके लिंक्स के लिए पैसे देने चाहिए.
फ्रांस में प्रकाशकों ने गूगल के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत उन्होंने काम करने की एक व्यवस्था तैयार की है.
लेकिन फ्रांस के कई जानेमाने अख़बारों के साथ ही कुछ ऐसी डील हुई हैं. ऐसे में ये ऑस्ट्रेलिया के प्रस्तावित क़ानून से काफ़ी अलग है जिसके नियम काफ़ी सख़्त हैं.

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आगे क्या होगा?
ऑस्ट्रेलिया में इस क़ानून को अच्छा ख़ासा राजनीतिक समर्थन मिला है और ये संसद के निचले सदन में पास हो चुका है.
सीनेट में पास हो जाने पर ये क़ानून बन जाएगा और इसके एक साल बाद इसकी समीक्षा भी की जा सकती है.
लेकिन, फिलहाल फे़सबुक के प्रतिबंध और गूगल की ओर से भी इसी तरह का क़दम उठाने की धमकी को लेकर ऑस्ट्रेलियाई सरकार मज़बूती से खड़ी है.

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