झारखंड में 20 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म मिलने का दावा

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी के लिए
झारखंड के साहिबगंज जिले में राजमहल की पहाड़ियों पर करोड़ों साल पुराने जीवाश्म (फॉसिल्स) मिले हैं.
इन जीवाश्मों पर जुरासिक काल के पेड़ों की पत्तियों की छाप (लीफ इंप्रेशन) है. इसके 150-200 मिलियन वर्ष पुराने होने का दावा किया जा रहा है.
माना जा रहा है कि ये जीवाश्म उन पेड़ों के हैं, जो कभी शाकाहारी डायनासोर का भोजन रहे होंगे.
अब इस इलाके में जुरासिक काल (मेसोज्यायिक एज) के जंतुओं के जीवाश्म (एनिमल फॉसिल्स) मिलने की संभावनाएं फिर से बढ़ गई हैं.
अगर ऐसा हुआ, तो शोधकर्ताओं के लिए उनकी रुचि के नए दरवाजे खुल जाएंगे.
साहिबगंज स्थित पीजी कालेज में भूगर्भशास्त्र के प्राध्यापक डॉक्टर रंजीत प्रसाद सिंह ने बीबीसी को यह जानकारी दी.

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उन्होंने बताया कि तालझारी प्रखंड के दूधकोल गांव में मिले इन जीवाश्मों को संरक्षित करने और उस इलाके को इको सेंसेटिव जोन घोषित करने के लिए वे मुख्य सचिव और कुछ दूसरे अधिकारियों को पत्र लिख रहे हैं. ताकि, कोरोना संक्रमण कम होने के बाद लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (जीएसआई) के वैज्ञानिकों के साथ यहां खुदाई कर और जीवाश्मों की तलाश की जा सके.
दूधकोल गांव साहिबगंज ज़िले के मंडरो में निर्माणाधीन फासिल्स पार्क से 45 किलोमीटर और झारखंड की राजधानी रांची से करीब 425 किलोमीटर दूर है.
डॉक्टर रंजीत कुमार सिंह पिछले 12 साल से राजमहल की पहाड़ियों के जीवाश्मों पर शोध कर रहे हैं. वे बीरबल साहनी इंस्टीच्यूट, आईआईटी खड़गपुर और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की कई रिसर्च टीमों का हिस्सा रहे हैं. इस इलाक़े में हुए तमाम शोध अभियानों में उनकी भागीदारी रही है और झारखंड में उनकी पहचान जीवाश्म विशेषज्ञ के बतौर है.
रहस्यमय राजमहल की पहाड़ियां

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राजमहल की पहाड़ियों में पहले भी ऐसे जीवाश्म मिल चुके हैं. साहिबगंज के अलावा पाकुड़ और आसपास के दूसरे ज़िलों में भी ऐसे जीवाश्म मिलते रहे हैं. इस इलाके में पहले मिले जीवाश्मों के अंदर पहले भी ऐसे लीफ इंप्रेशन देखे जा चुके हैं.
लेकिन, इससे पहले ऐसे लीफ इंप्रेशन जीवाश्मों के अंदर मिलते रहे हैं. वैज्ञानिकों ने जीवाश्मों को तोड़ने और दो चट्टानों के बीज ऐसे इंप्रेशन देखे थे. यह पहली दफा है, जब ऐसे इंप्रेशन फासिल्स के ऊपरी भाग और बहुतायत मात्रा में मिले हैं. इन्हें आसानी से देखा जा सकता है.
जीवाश्म विषेशज्ञ डॉक्टर रंजीत सिंह ने बीबीसी से कहा, "दूधकोल में फॉसिल्स के ऊपर मिले कुछ लीफ इंप्रेशन टिलोफाइलम प्रजाति के पौधों के हैं. ऐसी वनस्पतियां जुरासिक काल में पायी जाती थीं. लेकिन, कुछ लीफ इंप्रेशन ऐसे भी हैं, जिनकी पहचान नहीं की जा सकी है. फ़िलहाल, यह मान सकते हैं कि ये पेड़ काफी लंबे रहे होंगे और शाकाहारी डायनासोर ऐसी पत्तियों और इन पेड़ों की टहनियों को खाते होंगे."
उन्होंने यह भी कहा, "यहां जुरासिक काल के वनस्पति जीवाश्म मिलते रहे हैं, इसलिए धरती की खुदाई कर यह पता लगाने की कोशिश की जानी चाहिए कि क्या यहां जंतुओं के जीवाश्म हैं या नहीं. यह कैसे संभव है कि यहां डायनासोर युग के पेड़ों के जीवाश्म मिलें लेकिन डायनासोर का निशान नहीं मिले. अगर अच्छी तरह शोध करें, तो राजमहल की पहाड़ियों पर डायनासोर या जुरासिक काल के दूसरे जीव-जंतुओं के जीवाश्म या उनसे जुड़ी दूसरी चीजें (मसलन-अंडा) मिल सकती हैं."
कैसे मिले जीवाश्म

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दूधकोल गांव की एक लड़की अपने मवेशियों के साथ पहाड़ियों की तरफ गयी थी. तभी महुआ के एक पेड़ के नीचे उसने चमकीला पत्थर देखा और उसे उठाकर घर ले आयी. घर के लोगों को लगा कि उस पत्थर पर हिंदू देवी-देवताओं पार्वती और शंकर की आकृतियां बनी हैं. इससे भयभीत होकर वह परिवार उस पत्थर को दोबारा उसी पेड़ के नीचे रख आया. फिर यह बात गांव भर में फैल गई.
गांव के लखन पंडित ने बताया कि गांववालों ने उसे देवता मानकर उसकी पूजा-अर्चना शुरू कर दी. अब वहां मंदिर बनाने की प्रक्रिया की जा रही है. दूसरे गांवों के लोग भी इसके दर्शन के लिए आने लगे हैं. वहां इन दिनों मेले-सा नजारा है. ग्रामीणों ने वहां बांस की बल्लियों का घेरा कर दिया है.
लखन पंडित ने कहा, "इस बीच मैंने इसकी सूचना भूवैज्ञानिक डॉक्टर रंजीत को दी. तब वे मेरे गांव आए और बताया कि यह पत्थर दरअसल क्वार्ट्ज खनिज है. इसके बाद वे दर्जनों गांववालों के साथ दूधकोल पहाड़ी के दूसरे हिस्सों की तरफ़ भी गए, तो उन्हें लीफ इंप्रेशन वाले जीवाश्म दिखे. फिर हम सबने उनकी मदद कर थोड़ी-बहुत खुदाई की, तब वैसे कई जीवाश्म मिले. उनपर खूबसूरत पत्तों के छाप हैं. अब गांव के लोग अपने स्तर से उसकी सुरक्षा कर रहे हैं."
पहाड़िया आदिवासियों का गांव - दूधकोल

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करीब 60 घरों वाले दूधकोल गांव की अधिकतर आबादी पहाड़िया आदिवासियों की है. कुछ घर संथालों और ग़ैर आदिवासी जातियों के भी हैं. गांव में स्थित पहाड़ी पर लोगों का आना-जाना नहीं के बराबर है.
लिहाजा, पहाड़ी पर चढ़ने का रास्ता काफी पतला और झाड़ियों के बीच से निकलता है. इस कारण पहले किसी की नजर इन जीवाश्मों पर नहीं पड़ी.
बीरबल साहनी भी कर चुके हैं शोध
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया (जीएसआई) से जुड़े वैज्ञानिक राजमहल की पहाड़ियों की खुदाई पहले भी करते रहे हैं. उन्हें इसी इलाके के कटघर गांव में अंडों के जीवाश्म मिले थे, जो रेप्टाइल्स की तरह थे.
मशहूर वैज्ञानिक बीरबल साहनी ने भी इन पहाड़ियों पर लंबा वक्त बिताया था. 1940 के दशक में उन्होंने यहां पेंटोजाइली प्रजाति के प्लांट फासिल्स की खोज की. उनके बाद देश-दुनिया के कई वैज्ञानिक यहां आए और जीवाश्मों की खोज की जाती रही.

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भूवैज्ञानिक डॉक्टर रंजीत कहते हैं कि राजमहल की पहाड़ियों पर ऐसे जीवाश्मों के पाए जाने की मूल वजह इस इलाके में कभी हुए बड़े ज्वालामुखी विस्फ़ोट हैं. माना जाता है कि उन विस्फोटों ने यहां की बसावट बदल दी और तब के पेड़ और जीव जंतु चट्टानों के बीच फंस गए. अब उन्हीं के जीवाश्म मिलते रहते हैं. लेकिन, अभी तक यहां एनिमल फॉसिल्स नहीं मिले हैं. इसकी खोज की जानी चाहिए.
तालझारी के प्रखंड विकास अधिकारी साइमन मरांडी ने बीबीसी से कहा, "दूधकोल गाँव में जीवाश्मों के मिलने की घटना से वाक़िफ़ हूं. इसकी विस्तृत जानकारी जुटाई जा रही है. इसके बाद वरिष्ठ अधिकारियों को इस संबंधित रिपोर्ट भेजी जाएगी."
कैसे-कैसे फॉसिल्स

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वनस्पति फॉसिल्स तीन तरह के होते हैं. वैज्ञानिकों ने इन्हें कंप्रेशन, इंप्रेशन और टेट्रिफाइड श्रेणियों मे रखा है. कंप्रेशन फॉसिल्स वैसे जीवाश्म हैं, जो दो चट्टानों में दबने के कारण बने. इस प्रक्रिया में पौधों को सॉफ्ट टिश्यूज तो हट गए लेकिन हार्ड टिश्यूज बचे रह गए. इंप्रेशन वैसे फॉसिल्स हैं, जिनपर तब के वक्त की छाप रह गई. मसलन, पेड़ों की जड़ें, पत्तियां या टहनियों की छाप. दूधकोल मे मिले फॉसिल्स इंप्रेशन फॉसिल्स हैं, क्योंकि उनपर पत्तियों की छाप है.
बकौल डॉक्टर रंजीत, टेट्रिफाइड फॉसिल्स की वह वेरायटी है जो पेड़ों में छेद के कारण बनी. इसमें पेड़ों में किसी भी तरह की छेद रहने के कारण उनके अंदर सिलिका चला गया और सालों बाद पूरा का पूरा पेड़ पत्थर की मानिंद दिखने लगा. राजमहल की पहाड़ियों पर ऐसे सभी प्रकार के फॉसिल्स मौजूद हैं.
देश का इकलौता फॉसिल्स पार्क
इन्हीं वजहों से साहिबगंज ज़िले के मंडरों में भारत का अब तक का इकलौता फॉसिल्स पार्क बनाया जा रहा है.
इसका निर्माण पूरा होने के बाद यहां तरह-तरह के फॉसिल्स रखे जाएंगे. उन पर उसके पाए जाने का पूरा ब्योरा अंकित होगा, ताकि शोधकर्ताओं को उसके बारे में जानकारी इकट्ठी करने में कोई दिक्कत नहीं हो.
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