वियाग्रा बनने की कहानी में कोरोना की दवा के लिए क्या है सबक

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- Author, लॉरा प्लिट
- पदनाम, बीबीसी मुंडो
जब दो दशक पहले अमरीका में वियाग्रा की खोज हुई थी तब इसे लेकर ख़ूब हो हल्ला मचा था.
पुरुषों में नपुंसकता दूर करने वाली इस दवा को किसी क्रांति की तरह बतलाया गया.
इसके असर को देखते हुए इसकी तुलना गर्भनिरोधक गोली की खोज से पैदा हुए प्रभाव से की गई.
लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसे बनाने वाली कंपनी फाइज़र ने इसे हृदय में रक्त के प्रवाह को सुचारु रूप से शुरू करने के लिए बनाया था.
हृदय में रक्त का प्रवाह कम होने से दर्द की शिकायत होती है इस एनजीना कहते हैं.
जब वियाग्रा का क्लिनिकल ट्रायल किया गया तब इसके दिलचस्प साइड इफेक्ट्स नज़र आए. यह पुरुषों के शरीर में उत्तेजना पैदा करने लगा.
वियाग्रा का इस्तेमाल
इस नतीजे के बाद कि यह हृदय संबंधी समस्या को दूर करने में दूसरी दवाओं जितना ही है, शोधकर्ताओं ने इस पर काम रोकने का फ़ैसला ले लिया था.
लेकिन जब उन्हें वियाग्रा के इस इफेक्ट के बारे में पता चला तब उन्होंने शोध को जारी रखने का फ़ैसला लिया.
अब वियाग्रा का इस्तेमाल सिर्फ़ पुरुषों में नपुंसकता को दूर करने के लिए नहीं होता बल्कि कम मात्रा में इसका इस्तेमाल हृदय संबंधी रक्तचाप की समस्या में भी होता है.
ब्रैंड नाम रिवाटीओ के नाम से यह दवा बाज़ार में उपलब्ध है.
यह एक दिलचस्प उदाहरण है इस बात का कि जो दवा दूसरे मक़सद से तैयार की जाती है, कई बार वो किसी दूसरी ही बीमारी के लिए कारगर हो जाती हैं.
इटरफेरॉन जैसी दवाएँ
विशेषज्ञों का कहना है कि इसके कई फ़ायदे होते हैं.
अभी कोविड-19 का वैक्सीन ढूढ़ने के दौरान कई सारी दवाओं की टेस्टिंग की गई है.
इसमें क्लोरोक्विन और इससे जुड़ी हुई हाइड्रोक्लोरोक्वीन, रेमडेसिवियर और बीटा इटरफेरॉन जैसी दवाएँ शामिल हैं.
लेकिन अब सवाल है कि वे दवाएँ वाक़ई में कितना कारगर हो सकती है, जो कोरोना वायरस के लिए बनाई ही नहीं गई है?
यह तरीक़ा कब से सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया जा रहा है और इसके क्या फ़ायदे हैं?

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समय की बचत
इस प्रक्रिया को ड्रग रिपोजिशनिंग कहते हैं. विशेषज्ञ इस प्रक्रिया के मुख्य फ़ायदों में सबसे बड़ा फ़ायदा समय की बचत बताते हैं.
ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ लीवरपुल के क्लिनिकल एंड मॉल्युकूलर फॉर्माकोलॉजी के प्रोफेसर मुनीर पीर मोहम्मद बीबीसी से बातचीत में कहते हैं कि इस प्रक्रिया में समय की बचत होती है.
वो कहते हैं, "किसी ड्रग को बिल्कुल शून्य से तैयार करने में सबसे पहले उसे लैबोरेट्री में तैयार कर के उसके असर को कोशिकाओं पर परखते हैं और उसके बाद उसका प्रक्लिनिकल अध्ययन करते हैं. इंसानों पर आजमाने से पहले इसे और भी दूसरी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है."
"इसके बाद लाइसेंस लेने के लिए कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है. इस प्रक्रिया में 10 से 17 साल का वक्त लग सकता है. कोरोना के मौजूदा संकट को देखते हुए अगर हम इन प्रक्रियाओं को तेज़ी से भी करते हैं तो भी कम से कम नई दवा को बाज़ार में लाने में कम से कम पांच साल लगेंगे. अभी हमारे पास इतना समय नहीं है."
क्लिनिकल ट्रायल
प्रोफेसर मुनीर पीर मोहम्मद आगे बताते हैं, "ड्रग रिपोजिशनिंग का सबसे बड़ा फायदा यह है कि बनाई गई दवाइयां इंसानों पर टेस्ट की जा चुकी होती है. इसलिए इसकी सुरक्षित होने को लेकर डेटाबेस मौजूद होता है कि कैसे यह काम करता है. सिर्फ एक ही बात जाननी होती है कि यह किसी बीमारी विशेष पर काम कर रहा या नहीं."
पीर मोहम्मद हालांकि यह स्पष्ट करते हैं कि इंसानों को सीधे देने से पहले इनका क्लिनिकल ट्रायल जरूरी होता है क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि यह काम करेगा कि नहीं. यह अलग परिस्थितियों में कितना कारगर है, इसका पता सिर्फ क्लिनिकल ट्रायल में ही लगाया जा सकता है.
समय की बचत के साथ-साथ निश्चित तौर पर पैसे की भी इस प्रक्रिया में बचत होती है.
ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी ऑफ मर्डोक के फॉर्माकोलॉजी के प्रोफेसर इयान मुलाने कहते हैं, "एक दवा कंपनी दो बिलियन डॉलर एक नई दवा की खोज पर खर्च करता है, जिसे बाज़ार में पहुँचने में सालों लगते हैं."

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पैसे की बचत
यह पहले से तैयार ड्रग की तुलना में बहुत महंगा सौदा है.
प्रोफेसर इयान मुलाने कहते हैं, "उस पर से दवा का पेटेंट एक निश्चित समय के बाद समाप्त हो जाता है. हालांकि यह हर मामले में अलग-अलग होता है लेकिन अमूमन दवा के रजिस्ट्रेशन से लेकर यह 20 सालों तक रहता है."
एक बार समयसीमा पूरा होने के बाद कोई भी कंपनी उस दवा को बना सकती है और इसकी जेनरिक दवा बेच सकती है.
सबसे पहले इस तरह के प्रयोग में कामयाबी एस्प्रिन को लेकर मिली थी.
एक सदी से इसका इस्तेमाल दर्द की दवा के रूप में होता आया है लेकिन अब कम मात्रा में इसका इस्तेमाल कुछ मरीजों में दिल के दौरे के जोखिम को कम करने में भी किया जाता है.
और अब नए अध्ययन में पता चला है कि कुछ खास किस्म के कैंसर की रोकथाम में यह प्रभावी हो सकता है.

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पुरानी दवाओं का नया इस्तेमाल
इसके अलावा एक और अहम उदाहरण है थैलिडोमाइड का. यह दवा 1950 और 60 के दशक में जर्मनी की दवा कंपनी ग्रैनथल ने तैयार की थी.
यह गर्भवती महिलाओं में पहले तीन महीने के दौरान चक्कर आने से रोकने के लिए तैयार की गई थी.
इस दवा को साठ के दशक के शुरुआत में बाज़ार से वापस ले लिया गया था क्योंकि दस हज़ार से ज़्यादा बच्चों में जन्म के बाद समस्याएं आई थीं.
इसके कई दशकों के बाद जब इस ड्रंग की रिपोजिशनिंग हुई तो इसे अस्थि मज्जा के कैंसर और लेप्रॉसी के इलाज में कारगर पाया गया.
पहले इन दवाओं को इत्तेफाक़ से किसी बीमारी में कारगर पाया गया था लेकिन बाद यह प्रचलन में आया और सोच समझकर ड्रग रिपोजिशनिंग शुरू की गई.

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इत्तेफाक़ फिर बाद में उद्देश्यपूर्ण
हालांकि हाल के सालों में तकनीक के विकास ने इसे संभंव बनाया है.
अमरीका के एनजीओ क्यूर्स विदिन रिच के डायरेक्टर ब्रुस ब्लूम ने बीबीसी से कहा, "सोच समझकर ड्रग रिपोजिशनिंग बिग डेटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जमाने में ज्यादा आसान हो पाया है."
अगर सोच समझकर दवा को चुनते हैं जैसे कि कोविड-19 के मामले में हो रहा है तो किस दवा को चुना जाए, ये कैसे तय करते हैं?
कोरोना के मामले में सबसे पहले उन दवाओं को रिपोजिशनिंग के लिए चुना गया जो दूसरे वायरस के लिए तैयार किया गया था जैसे रेमडेसिविर.
ये इबोला के इलाज के लिए बनाया गया था लेकिन इसका परिणाम निगेटिव आया था.
कैसे तय करते हैं किस दवा को चुने
हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि जो दवा वायरस से नहीं जुड़ी होती है, वो भी एंटीवायरल साबित होती हैं.
पीर मोहम्मद कहते हैं कि दवा को चुनने के लिए कई मापदंडों का इस्तेमाल करते हैं.
इसके अलावा वो कहते हैं, "यह कोई जादू की छड़ी जैसा नहीं होता है. इसका कुछ असर हो सकता है जैसे रेमडेसिविर के मामले में हुआ है और यह आपको अस्पताल जाने से बचा सकता है लेकिन पूरी तरह से ठीक नहीं कर सकता."
ड्रग रिपोजिशनिंग की सबसे बड़ी समस्या है कि बाज़ार इसमें दिलचस्पी नहीं लेता है.
ब्लूम कहते हैं कि व्यावसायिक तौर पर इस कवायद को प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, जिससे रिपोजिशनिंग को शुरुआती दौर में समर्थन नहीं मिल पाता है.
हालांकि इसमें लागत कम आती है इसलिए यह महत्वपूर्ण है. अगर कंपनी को अपनी लागत निकलती नहीं दिखती है तो वो रिपोजिशनिंग की प्रक्रिया से बचते हैं.

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