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कोरोना: क्या चीन की प्रयोगशाला से आया है ये वायरस?
- Author, पॉल रिंकन
- पदनाम, साइंस एडिटर, बीबीसी न्यूज़
कोरोना वायरस कैसे और कहां से आया इसे लेकर कई तरह की मान्यताएं हैं. कुछ का दावा है कि यह वायरस जानवरों से इंसानों में पहुंचा.
लेकिन किस जानवर से, इसे लेकर अब भी कोई बात पुख़्ता तौर पर नहीं कही जा सकती. कुछ का दावा है कि वायरस पेंगोलिन से इंसानों में पहुंचा तो कुछ चमगादड़ को इसके लिए ज़िम्मेदार मानते हैं.
लोगों का मानना है कि यह चीन के 'वेट-मार्केट' से आया. चीन में कई जंगली जानवरों का इस्तेमाल खाने और दवाइयों के लिए किया जाता है. कोरोना वायरस वहीं से इंसानों में आया.
एक वक़्त तक चमगादड़ को कोरोना वायरस का मूल स्रोत माना जा रहा था. दलील दी जा रही थी कि चीन के वुहान शहर में 'जानवरों की मंडी' से ये वायरस कुछ इंसानों में पहुंचा और उसके बाद पूरी दुनिया में फैल गया.
इसके बाद एक शोध में कहा गया कि इंसानों में यह वायरस पैंगोलिन से आया है. इसे लेकर एक शोध भी हुआ. इस शोध में कहा गया कि पैंगोलिन में ऐसे वायरस मिले हैं जो कोरोना वायरस से मेल खाते हैं. लेकिन ये शोध भी अभी शुरुआती चरण में है.
इसके अलावा एक दूसरी थ्योरी यह भी है कि यह वायरस प्रयोगशाला में तैयार हुआ. लेकिन क्या वाकई यह वायरस चीन के वुहान शहर के किसी लैब से निकला और दुनिया भर में फैल गया?
अमरीकी गृह-मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि दूतावास के अधिकारी चीन के वुहान शहर में स्थित एक वायरस लैब में जैव विविधता को लेकर परेशान थे.
यह लैब उसी शहर में है जहां कोरोना वायरस संक्रमण का पहला मामला सामने आया था और उसके बाद कहीं जाकर पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर गया.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि अमरीकी सरकार उन अपुष्ट रिपोर्ट्स को जांच रही जिनमें कहा गया है कि यह वायरस प्रयोगशाला से बाहर आया है.
तो अगर ऐसा कुछ है तो इस महामारी को लेकर अब तक की जो हमारी समझ है उसमें क्या कुछ नया जुड़ जाएगा?
सूत्रों का क्या कहना है?
द वॉशिंगटन पोस्ट अख़बार ने दूतावास के सूत्रों के आधार पर ख़बर दी है. अख़बार ने बताया कि साल 2018 में अमरीकी विज्ञान राजनयिक कई बार चीनी शोध सुविधाओं के दौरे के लिए गए थे. अधिकारियों ने लैब में अपर्याप्त सुरक्षा के बारे में अमरीका को दो चेतावनियां भी दी थीं.
द वॉशिंगटन पोस्ट अख़बार में छपे इस कॉलम के मुताबिक़, दौरे पर गए अधिकारियों ने वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी में सुरक्षा और दूसरी कमियों को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी. उन्होंने मदद की भी मांग की थी.
यह भी दावा किया जा रहा है कि राजनयिकों ने चमगादड़ के कोरोना वायरस पर लैब की रिसर्च को लेकर भी चिंता ज़ाहिर की थी कि यह सार्स जैसी किसी नई महामारी का कारण हो सकता है.
अख़बार लिखता है कि सूत्रों के इन दावों ने अमरीकी सरकार की चर्चाओं को और हवा देने का काम किया था जिसमें कहा जा रहा था कि कोविड 19 महामारी के वायरस का स्रोत या तो वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी है या फिर वुहान का ही कोई दूसरा लैब.
इसके साथ ही, फ़ॉक्स न्यूज़ ने भी हाल के दिनों में लैब-थ्योरी को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी.
कोरोना वायरस के बारे में पहली बार बीते साल दिसंबर में पता चला था. इसके शुरुआती मामले चीन के वुहान शहर के वेट मार्केट से जुड़े हुए थे. लेकिन यहां यह स्पष्ट कर देना बेहद ज़रूरी है कि बड़े पैमाने पर इन ऑनलाइन अटकलों के अलावा किसी तरह के कोई पुख़्ता सुबूत नहीं हैं कि सार्स कोविड 2 वायरस लैब में हुई ग़लती की देन है.
प्रयोगशालाओं में किस तरह के सुरक्षा मापदंडों का पालन किया जाता है?
जिन प्रयोगशालाओं में वायरस और बैक्टीरिया के बारे में शोध और प्रयोग किये जाते हैं वहां बीएसएल स्टैंडर्ड सिस्टम का पालन किया जाता है.
BSL अर्थात बायोसेफ़्टी लेवल.
इसके चार स्तर हैं, जो अध्ययन किए जा रहे जैविक एजेंट के प्रकार और उन्हें अलग करने के लिए अपनाई जा रही सावधानियों पर निर्भर करता है.
बायोसेफ़्टी लेवल 1 सबसे निम्न है और इसका इस्तेमाल जैविक एजेंट्स के अध्ययन के लिए जानी-मानी प्रयोगशालाओं द्वारा किया जाता है. ये इंसानों के लिए कोई ख़तरा पैदा नहीं करती.
जैसे जैसे लेवल बढ़ता है सावधानी भी बढ़ती है.
मसलन अगर आप बायोसेफ़्टी लेवल 4 पर हैं तो सबसे अधिक सावधानी की ज़रूरत होती है. यह सबसे हाई लेवल है. हालांकि यह सिर्फ़ उन प्रयोगशालाओं के लिए आरक्षित है जहां उन सबसे ख़तरनाक वायरस पर काम किया जाता है जिनके वैक्सीन और उपचार मौजूद हैं. जैसे इबोला, मरबर्ग वायरस और चेचक के लिए अमरीका-रूस में स्थित सिर्फ़ दो प्रयोगशालाएं.
बीएसएल स्टैंडर्ड्स का पूरी दुनिया में पालन किया जाता है लेकिन कुछ कॉस्मेटिक विविधताओं के साथ.
किंग्स कॉलेज लंदन की एक बायोसिक्योरिटी विशेषज्ञ डॉ. फिलिप्पा लेंटज़ोस का कहना है कि अगर रूस का उदाहरण लिया जाए तो उन्होंने अपनी उच्चतम नियंत्रित प्रयोगशााला को 1 और निम्नतम को 4 के तौर पर लेबल किया है. ऐसे में यह मानक के बिल्कुल विपरीत है लेकिन मूल प्रक्रिया और ढांचे की अवधारणा समान है.
हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी विभिन्न स्तरों के लिए मैनुअल बना रखे हैं लेकिन ये बाध्यकारी नहीं.
डॉ. लेंटज़ोस के अनुसार, इन प्रयोगशालाओं को इस तरह से विकसित किया गया है कि यह सुरक्षित रूप से कार्य करने की जगह हों. ना केवल यहां काम करने वालों के लिए बल्कि पर्यावरण के लिहाज़ से भी सुरक्षित.
लेकिन वो आगे कहती हैं, "अगर आप अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ किसी परियोजना पर काम करना चाहते हैं तो उनकी मांग होती है कि प्रयोगशालाएं कुछ तय मानकों पर खरी उतरती हों. या फिर अगर आपके पास बाज़ार में बेचने के लिए कोई उत्पाद है या आपकी ओर से कोई सेवा प्रदान की जा रही है मसलन टेस्ट या दूसरी कोई सेवा तो आपको अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरना होता है."
इसके साथ ही वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ़ वायरोलॉजी को अमरीका से फंड मिला था. अमरीकी अनुसंधान संस्थानों से सहायता भी. दूतावास के सूत्रों ने और अधिक आर्थिक सहायता देने की पेशकश भी की थी.
किस प्रकार की सुरक्षा चूक की बात की जा रही है?
इस सवाल का एक संक्षिप्त जवाब है कि वॉशिंगटन पोस्ट में दी गई जाकारी से हमें यह पता नहीं चलता है. लेकिन अगर सामान्य तौर पर कहें तो ऐसे कई स्तर हैं जिन पर सुरक्षा चूक हो सकती है.
डॉ. लेंटज़ोस इसमें जोड़ते हुए कहती हैं कि जिनके पास लैब की पहुंच है, वैज्ञानिक और तकनीकी सेवा से जुड़े लोग, प्रशिक्षण, रिकॉर्ड रखने की प्रक्रिया आदि के दौरान भी चूक होने की गुंजाइश होती है.
लेकिन राजनयिक सूत्रों की ये चिंता कितनी असामान्य थी?
दुर्घटनाएं होती हैं.
साल 2014 में वॉशिंगटन के पास एक अनुसंधान केंद्र में कार्डबोर्ड बॉक्स में चेचक के वैक्सीन की शीशियां मिली थीं. इसके साथ ही साल 2015 में अमरीकी सेना ने भूलवश देश की नौ प्रयोगशालाओं और दक्षिण कोरिया में एक सैन्य अड्डे को मृत बीजाणुओं के बजाय लाइव एंथ्रेक्स के नमूने भेज दिए थे.
बीएसएल स्केल के निचले पायदान के लैब में सेफ़्टी स्टैंडर्ड यानी सुरक्षा मानक काफ़ी अलग-अलग हैं और बहुत सारी छोटी-मोटी सुरक्षा चूक तो कभी ख़बरें भी नहीं बनतीं. लेकिन बहुत कम ऐसे लैब हैं जिन्हें बीएसएल-4 का लेबल हासिल है.
विकिपीडिया में दुनिया भर में ऐसे 50 लैब की लिस्ट है जिनमें डब्ल्यूआईवी एक है. लेकिन ये सूची कोई आधिकारिक सूची नहीं है. इन लैबों को बहुत उच्च स्तरी मानकों का ध्यान रखते हुए बनाना पड़ता है क्योंकि इन लैबों को बहुत ही ख़तरनाक पैथोजेन से डील करना पड़ता है.
इसके नतीजे में उनक सेफ़्टी रिकॉर्ड आम तौर पर अच्छा होता है. इसलिए इनमें से किसी में भी उनकी प्रक्रिया पर अगर कोई चिंता जताई जाती है तो ये बहुत ही महत्वपूर्ण होगा.
क्या पहले किसी लैब से इस तरह के वायरस लीक होने के दावे थे?
हां... जैसे ही कोविड 19 के बारे में पता चला इस तरह की बहुत सी अटकलें लगाई गईं. हालांकि इनमें से ज़्यादातर ख़बरे कहां से आईं उसका पता नहीं चला.
जनवरी में एक ऑनलाइन थ्योरी बहुत प्रचलित हुई. इस थ्योरी में कहा गया कि वायरस किसी लैब में बायोवेपन (जैविक हथियार) के रूप में तैयार किया जा सकता था.
हालांकि वैज्ञानिक शुरू से ही इस थ्योरी को नकारते रहे हैं. ज़्यादातर वैज्ञानिक और अभी तक हुए अध्ययन से इसी बात के संकेत मिल रहे हैं कि कोरोना वायरस मुख्य तौर पर जानवरों से ही इंसानों में आया है, उनमें भी इस चमगादड़ को लेकर ज़्यादा आशंकाएं हैं कि वायरस का मूल स्रोत चमगादड़ ही है.
हालांकि वायरस को मौलिक वैज्ञानिक अनुसंधान के उद्देश्यों के लिए भी तैयार किया जा सकता है. उदाहरण के लिए कोई वायरस भविष्य में कैसे म्यूटेट होगा ये जानने के लिए ऐसा किया जा सकता है.
लेकिन मार्च में प्रकाशित एक अमरीकी अध्ययन में इस तरह का कोई भी संकेत नहीं पाया गया है.
स्क्रिप्स रिसर्च के सह लेखक क्रिस्टियन एंडर्सन कहते हैं कि कोरोना वायरस का जो ज्ञात जीनोम डेटा मौजूद है उससे तुलना करने के बाद हम यह स्पष्ट तौर पर कह सकते हैं कि सार्स कोविड 2 पूरी तरह से नेचुरल तरीके से जन्मा है.
एक और आरोप है जो इस बात को लेकर चिंता ज़ाहिर करता है कि यह नेचुरल वायरस ग़लती से प्रयोगशाला से बाहर आ गया. संक्रामक रोगों पर शोध करने वाले कम से कम दो शोध संस्थानों में वुहान सीफूड मार्केट की निकटता ने इस आशंका को और हवा दी.
डब्ल्यूआईवी ने चमगादड़ों के कोरोना वायरस पर शोध किया था. यह पूरी तरह से वैध था और यहां हुआ शोध कई अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुआ था.
डॉ. लेंटज़ोस का कहना है कि वायरस कहां से आया यह अभी बता पाना थोड़ा मुश्किल है. इसे लेकर कई तरह के विचार हैं. लेकिन मौजूदा समय में इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं कि सार्स कोविड 2 वुहान में स्थित किसी शोध संस्थान से आया है.
गुरुवार को चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान ने इस मसले पर एक न्यूज़ कॉन्फ्रेंस में जवाब भी दिया. उन्होंने पत्रकारों से कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अधिकारियों ने "कई बार ये कहा है कि इस बात के कोई सबूत नहीं है कि कोविड 19 या सार्स कोविड 2 प्रयोगशाला में तैयार किया गया है."
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर और उनके प्रशासन पर कोरोना वायरस संक्रमण को रोकने के लिए उठाए गए क़दमों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. इस बीच एक सवाल के जवाब में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि अमरीका सरकार लैब-थ्योरी की जांच कर रही है.
हालांकि इस वायरस के शुरू होने के साथ ही चीन पर शुरू से आरोप लगते रहे हैं कि उन्होंने कोरोना वायरस संक्रमण के शुरुआती चरण में पार्दर्शिता नहीं रखी.
अमरीका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो भी कह चुके हैं कि चीन को पारदर्शी तरीक़े से सामने आने की ज़रूरत है.
एक ओर जहां अमरीका और चीन के बीच ज़ुबानी जंग जारी है वहीं वैज्ञानिक इसके मूल कारण का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं.
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