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2020 में कैसी होगी भारत की टेक्नॉलॉजी?
- Author, स्मृति परशीरा
- पदनाम, टेक्नॉलिजी पॉलिसी रिसर्चर, बीबीसी हिंदी के लिए
साल 2019 में भारत में 65 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपभोक्ता था जिसका चलते यह दुनिया में दूसरा सबसे अधिक इंटरनेट इस्तेमाल किए जाने वाला देश था. 2020 में यह संख्या और अधिक बढ़ने की संभावना है.
भारतीय तकनीकी क्षेत्र की नीतियों और विकास का महत्वपूर्ण असर दुनिया की डिज़िटल आबादी के एक बड़े हिस्से पर पड़ेगा.
भारत में इंटरनेट का इस्तेमाल मुख्य रूप से इसके वायरलेस टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर (टीएसपीएस) द्वारा किया जाता है. ऐसे में सबसे पहले टीएसपीएस के बाज़ार ढांचे में संबंधित बदलाव देखने को मिलेगा.
मुकेश अंबानी की रिलायंस समूह की दूरसंचार शाखा रिलायंस जियो के पास आज इंटरनेट सेवा बाज़ार की लगभग 50 प्रतिशत हिस्सेदारी है. उसने 2016 में अपनी सेवाएं शुरू की थी.
इस बीच, भारती एयरटेल और वोडाफोन-आइडिया जैसे पुराने बड़े खिलाड़ी भारी क़र्ज़, सरकार का बकाया और नियामक नीतियों के तहत दौर में बने रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वोडाफोन ने हाल ही में घोषणा की है कि अगर सरकार द्वारा राहत पैकेज नहीं दिया जाता है तो कंपनी जल्द ही दिवालिया हो सकती है.
भारतीय दूरसंचार उपभोक्ताओं के लिए इसका क्या मतलब है?
पहला यह कि इंटरनेट सेवाओं की क़ीमतें बाज़ार में सीधे प्रतिस्पर्धी दबावों से जुड़ी हुई हैं. जैसे ही बाज़ार कई लोगों के हाथों में जाता है, टैरिफ़ बढ़ाने की उनकी क्षमता बढ़ जाती है. यह पहले ही शुरू हो गया है.
रिलायंस जियो, एयरटेल और वोडाफ़ोन-आइडिया में से सभी ने पिछले महीने अपने टैरिफ़ में 40 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की है. इसका मतलब है कि उपभोक्ताओं को या तो एक ही सेवा के लिए अधिक भुगतान करना होगा या उन्हें इंटरनेट इस्तेमाल में कटौती करनी होगी.
दूसरी चिंता यह है कि जैसे-जैसे प्रतिस्पर्धा कम होती जा रही है, सेवाओं की गुणवत्ता बेहतर करने के लिए प्रोत्साहन और रेखांकित क्षेत्रों में विस्तार भी कम होता जा रहा है. इससे भारत में मौजूदा डिज़िटल डिवाइड समाप्त हो सकता है.
इन बाज़ार संबंधी कारकों के अलावा, सरकार की नीतियों के कारण भी इंटरनेट तक पहुंच बाधित हो सकती है.
सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंट्रे के इंटरनेट शटडाउन ट्रैकर के अनुसार, भारत ने जनवरी 2012 से अब तक कुल 379 इंटरनेट शटडाउन हुआ है, जिनमें से 106 सिर्फ़ पिछले एक साल में हुए. इसमें कश्मीर में दुनिया का सबसे लंबा शटडाउन शामिल है जहां अगस्त 2019 से मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं.
ऐसे देशों के लिए जो इस तरह के मज़बूत डिजिटल आकांक्षाओं का दावा करते हैं, इंटरनेट शटडाउन एक चिंताजनक प्रवृत्ति है. एक बात और है कि 2020 में इसके जारी रहने की संभावना है.
जहां एक ओर हम डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नेंस और ई-कॉमर्स की ओर बढ़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर प्रशासन को कई कारणों से शटडाउन का सहारा लेना पड़ रहा है.
ऐसा ग़लत सूचना, हिंसा, असंतोष और विरोध प्रदर्शन की आशंका के कारण हो सकता है लेकिन यह सब उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए समग्र लागतों की परवाह किए बिना किया जा रहा है.
संचार माध्यमों पर पाबंदियों से लोगों की आवाजाही, सूचनाएं और व्यापार बुरी तरह प्रभावित होते हैं. इतना ही नहीं, पाबंदी की वजह से टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र की बड़ी कंपनियों को भारी नुक़सान भी होता है.
सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार एक घंटे तक इंटरनेट बंद होने से टेलीकॉम सेक्टर के कारोबार को लगभग दो करोड़ 45 लाख रुपए का नुक़सान होता है.
भारत में जिस तरह बार-बार लंबे वक़्त तक इंटरनेट सुविधाएं बंद की जाती हैं, उससे यह नुक़सान और ज़्य़ादा बढ़ जाता है. इंटनरेट पर रोक से आर्थिक सेवाएं, ई-कॉमर्स और पर्यटन उद्योग भी सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं.
डिज़िटल गवर्नेंस को आम जनता तक पहुंचाने के अलावा भी नीतियों से जुड़ी कई सरकारी योजनाओं पर अब भी काम हो रहा है. इन योजनाओं में नए दिशा-निर्देशों और नियमों का आना भी प्रस्तावित है. उम्मीद जताई जा रही है कि नए नियमों का ऐलान इस महीने तक हो जाएगा.
इसके तहत वॉट्सऐप, फ़ेसबुक और गूगल को उनके कंटेंट की निगरानी के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा. इसके अलावा इंटरनेट यूज़र्स की निजता के मद्देनज़र भी कुछ नए नियमों के आने की उम्मीद है.
इन नियमों का नाता सीधे तौर पर 'पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2019' (पीडीपी बिल) से है. यह विधेयक लोगों के निजी डेटा को सुरक्षित बनाने के लिए नया फ़्रेमवर्क बनाने पर ज़ोर देता है. साथ ही निजी जानकारियां लीक होने पर मुआवज़े की सिफ़ारिश भी करता है.
अगर यह विधेयक क़ानून बन जाता है तो लोगों के निजी डेटा की जानकारी रखने वाली कंपनियों को नए क़ानून के तहत अपने काम करने के तरीकों और नियमों में ज़रूरी बदलाव करने होंगे.
पीडीपी बिल संसद के पिछले सत्र में लोकसभा में पेश किया गया था और अब इसे ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी के पास भेज दिया गया है.
पीडीपी बिल की तरह ही गोपालकृष्ण समिति भी हर तरह के डेटा को सुरक्षित बनाने के लिए नए नियम बनाने पर काम कर रही है. यह समिति शहर के प्रदूषण, ट्रैफ़िक पैटर्न और संक्रामक बीमारियों से जुड़े डेटा संग्रह पर काम कर रही है.
यानी कुल मिलाकर देखें तो तकनीक से जुड़ी नीतियों के मामले में 2020 काफ़ी अलग और रोचक होगा.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
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