बोतल बंद पानी में पाए गए प्लास्टिक के कण
- Author, डेविड शुकमैन
- पदनाम, विज्ञान संपादक
बोतल बंद पानी की कई बोतलों पर किए गए टेस्ट से पता चला है कि उनमें से अधिकतर बोतलों में प्लास्टिक के छोटे कण पाए गए हैं. इनमें पीने का पानी उपलब्ध करवाने वाली नामी कंपनियां भी शामिल हैं.
इस जांच में 9 विभिन्न देशों की 250 बोतलों पर जांच की गई है. बोतलबंद पानी की यह अपनी तरह की सबसे बड़ी जांच है.
पत्रकारिता संगठन ऑर्ब मीडिया द्वारा की गई जांच में प्रति लीटर पानी में औसतन 10 प्लास्टिक के कण पाए गए हैं और इन प्लास्टिक कणों की चौड़ाई इंसान के बालों से भी बड़ी है.
जिन-जिन कंपनियों के ब्रैंड की जांच की गई है उनका बीबीसी से कहना है कि उनके बोटलिंग प्लांट उच्चतम मानकों से संचालित होते हैं.
फ़्रेडोनिया में स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क में यह जांच की गई हैं.
इस विश्लेषण को अंजाम देने वालीं विश्वविद्यालय की रसायन शास्त्र की प्रोफ़ेसर शेरी मेसन ने बीबीसी से कहा, "हमने इसे (प्लास्टिक) हर दूसरी बोतल और हर ब्रैंड में पाया."

'परिणाम चिंताजनक हैं'
शेरी मेसन ने आगे कहा, "इसका मतलब किसी ख़ास ब्रैंड पर उंगली उठाना नहीं है. यह वास्तव में यह दिखाना है कि प्लास्टिक हर जगह है. प्लास्टिक ऐसा पदार्थ बन गया है जो हमारे समाज में व्यापक स्तर पर फैल चुका है और यह पानी में भी है. यह सभी ऐसे उत्पाद हैं जिनका इस्तेमाल हम बुनियादी स्तर पर करते हैं."
वर्तमान में अभी इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि यह प्लास्टिक के छोटे पदार्थ कितने ख़तरनाक हो सकते हैं लेकिन इसके संभावित असर को समझना विज्ञान का एक क्षेत्र है.
परिणामों पर टिप्पणी करते हुए प्रोफ़ेसर मेसन कहती हैं, "जिस तरह की संख्या हम देख रहे हैं वह भयावह नहीं है लेकिन यह चिंताजनक ज़रूर है."
विशेषज्ञों ने बीबीसी से कहा है कि विकासशील देशों में जहां नल का पानी प्रदूषित हो सकता है वहां लोगों को प्लास्टिक बोतल का पानी पीना जारी रखना चाहिए.
इस जांच के परिणामों के बाद जब बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियों से उनके ब्रांड के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे अपने उत्पाद के लिए सुरक्षा और गुणवत्ता के उच्चतम मापदंड अपनाते हैं.
इसके साथ ही कंपनियों ने जांच के लिए माइक्रोप्लास्टिक्स पर नियमों की अनुपस्थिति और स्टैंडर्ड प्रक्रियाओं की कमी का सवाल खड़ा किया है.
पिछले साल प्रोफ़ेसर मेसन ने नल के पानी के नमूनों में प्लास्टिक के कण पाए थे और दूसरे शोधकर्ताओं ने सीफ़ूड, बीयर, समुद्री नमक और यहां तक की हवा में भी इसे पाया था.
इस शोध के लिए दुनिया भर से जनसंख्या या बोतलबंद पानी पीने के आंकड़ों के आधार पर 11 विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय ब्रैंड को चुना गया है. जो इस प्रकार हैं-
प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय ब्रैंड
- एक्वाफ़ीना
- दसानी
- एवियान
- नेस्ले प्योर लाइफ़
- सेन पेलेग्रिनो
प्रमुख राष्ट्रीय ब्रैंड
- एक्वा (इंडोनेशिया)
- बिस्लेरी (भारत)
- एपुरा (मेक्सिको)
- जेरोस्टाइनर (जर्मनी)
- मिनाल्बा (ब्राज़ील)
- वाहाहा (चीन)

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मिलावट के जोखिम को ख़त्म करने के लिए दुकानों और कुरियर से आए पानी का वीडियो बनाया गया. अमरीका में कुछ पानी के पैक इंटरनेट के ज़रिए ख़रीदे गए.
पानी में प्लास्टिक का पता लगाने के लिए एक ख़ास रंग का इस्तेमाल किया गया जिसे नाइल रेड कहा जाता है.
ये तकनीक हाल ही में ब्रितानी वैज्ञानिकों ने तैयार की है. इस तकनीक से वैज्ञानिक समुद्र के पानी में प्लास्टिक की मात्रा मापते हैं.
इससे पहले के अध्ययनों से पता चला था कि पानी में मौजूद प्लास्टिक इस रंग यानी नाइल रेड से चिपक जाता है और प्रकाश की एक निश्चित वेवलेंथ (तरंग) पर वे कण दिखने लगते हैं.
प्रोफ़ेसर मेसन ने रंग (डाई) से चिपकने वाले कणों को फिल्टर किया और उन्हें अलग-अलग कर गिनना शुरू किया, ये कण 100 माइक्रॉन से बड़े थे, मोटे तौर पर देखा जाए तो इनका व्यास (डायमीटर) इंसान के बालों जितना था.
इन बड़े कणों को इंफ्रारेड स्पेकट्रोस्कोपी के जरिए जांचा परखा गया और तब ये बात सुनिश्चित हुई कि ये प्लास्टिक कण हैं बाद में इनके पॉलीमर के बारे में भी जानकारी जुटाई गई.
अधिकतर कण 100 माइक्रॉन से छोटे पाए गए. इनकी मात्रा को मापने के लिए उसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया जिससे रात के आसमान में तारों की संख्या पता की जाती है.
इन कणों के बारे में प्रोफ़ेसर मेसन ने कहा कि 'इन्हें प्लास्टिक माना जा सकता है.'
ऐसा इसलिए क्योंकि नाइल रेड में प्लास्टिक के अलावा अन्य पदार्थ भी चिपक सकते हैं लेकिन पानी की बोतल में उनके होने की उम्मीद न के बराबर है.
बीबीसी ने इस अध्ययन के बारे में विशेषज्ञों से राय मांगी है. ईस्ट एंगेलिया विश्वविद्याल के डॉक्टर एंड्रयू मायेस नाइल रेड तकनीक के विशेषज्ञ हैं. उन्हें लगता है कि ये एक उच्चस्तरीय विश्लेषण हैं.
माइकल वॉकर ब्रितानी सरकार से जुड़े हैं. वे फ़ूड स्टैंडर्ड असोसिएशन के भी संस्थापक सदस्य हैं. उनका कहना है कि यह जांच बेहतर तरीके से की गई है और जांच के लिए नाइल रेड का प्रयोग भी सही है.

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बोतलों में कहां से आया प्लास्टिक?
दोनों ही जानकारों का कहना है कि 100 माइक्रॉन से छोटे पदार्थों को प्लास्टिक नहीं माना गया है. लेकिन पीने के पानी की बोतल में किसी दूसरे तरह के छोटे पदार्थ की मौजूदगी संभव नहीं है, इसलिए ऐसा माना जा सकता है कि शायद ये कण प्लास्टिक हों.
एक अहम सवाल ये है कि पानी की बोतल में प्लास्टिक आया कहां से?
बोतल के ढक्कन में पॉलिप्रॉपिलीन का इस्तेमाल होता है. ऐसा संभव है कि ढक्कन खोलते वक्त इसकी कुछ मात्रा बोतल में गिर जाए.
ये परखने के लिए कि कहीं जांच के दौरान ही तो पानी में प्लास्टिक नहीं मिल गया, इसके लिए प्रोफ़ेसर मेसन ने कांच के बर्तन साफ़ करने के लिए प्यूरिफ़ाइड पानी का इस्तेमाल किया. इसके बाद नाइल रेड में मिलाए जाने वाले एसेटॉन की भी गहन जांच की गई.
इनमें प्लास्टिक की कुछ मात्रा पाई गई, लेकिन ये माना गया कि ये हवा से आई है. प्लास्टिक की इस मात्रा को अंतिम नतीजों से घटा दिया गया.
शोधकर्ता जांच के बाद आए नतीजों की विविधता से हैरान थे. टेस्ट की गई 259 बोतलों में से 17 में प्लास्टिक के कोई सबूत नहीं पाए गए. लेकिन बाकी सब में प्लास्टिक के कण पाए गए. अलग-अलग ब्रैंड के बीच भी प्लास्टिक की मात्रा में फ़र्क पाया गया.
कुछ बोतलों में हज़ारों कण पाए गए. इनमें में से अधिकतर काफ़ी छोटे और 'शायद प्लास्टिक' थे.

हमने बोतलबंद पानी बेचने वाली कंपनियों से संपर्क किया. अधिकतर ने हमारे सवालों के जवाब दिए.
नेस्ले ने हमें बताया कि उन्होंने ख़ुद भी दो साल पहले माइक्रोप्लास्टिक मापना शुरू कर दिया था और उन्हें 'ट्रेस लेवल से अधिक' प्लास्टिक नहीं मिला है.
कंपनी के प्रवक्ता ने कहा कि प्रोफ़ेसर मेसन के अध्ययन में कुछ प्रमुख चीज़ें शामिल नहीं थीं. लेकिन उन्होंने ऑर्ब मीडिया को दोनों तरीकों की तुलना करने का न्यौता दिया.
जेरोस्टाइनर ने भी कहा कि उसने कई सालों तक पानी में माइक्रोप्लास्टिक्स की जांच की और उसे फ़ार्मा कंपनियों के लिए तय कणों की सीमा से नीचे के परिणाम मिले. उन्होंने कहा कि वह यह समझ नहीं पाए कि प्रोफ़ेसर मेसन का अध्ययन निष्कर्षों पर कैसे पहुंच गया.
साथ ही कंपनी ने कहा कि उसके मापदंड उद्योग के तय मापदंडों से काफ़ी अधिक हैं लेकिन माइक्रोपार्टिकल हर जगह हैं तो हवा या पैकेजिंग पदार्थों के कारण बोटलिंग में यह आ गया हो इसको भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है.
कोका-कोला ने कहा कि उद्योग में उसके सबसे सख़्त गुणवत्ता मानक हैं और वह 'कई स्तर की फ़िल्टर प्रक्रिया' का पालन करता है. लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि माइक्रोप्लास्टिक "सर्वव्यापी दिखता है और उच्च मापदंड अपनाने वाले उत्पादों में भी यह मिनटों के अंदर पाया जा सकता है."
डनोन ने कहा कि वो इस अध्ययन पर टिप्पणी नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें इसकी जांच की कार्यप्रणाली के बारे में पता नहीं है. लेकिन ये भी कहा कि उनकी बोतलों की फ़ूड ग्रेड पैकेजिंग की जाती है.
कंपनी का कहना था कि माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा के बारे में कोई क़ानून या उन्हें टेस्ट करने के तरीके के बारे में कोई वैज्ञानिक सहमति नहीं है. उन्होंने एक जर्मन अध्ययन का भी हवाला दिया जिसमें पानी की बोतल में प्लास्टिक पाया गया था लेकिन उसकी मात्रा उतनी अधिक नहीं थी.
पेप्सीको ने कहा कि एक्वाफ़ीना एक गहन गुणवत्ता नियंत्रण से गुज़रता है, जिसमें फ़िल्टर के अलावा अन्य खाद्य सुरक्षा मैकेनिज़्म का प्रयोग किया जाता है जिससे एक सुरक्षित उत्पाद तैयार होता है.
कंपनी ने माइक्रोप्लास्टिक विज्ञान को एक नया क्षेत्र बताया जो अभी अपने शुरुआती दौर में है और जिसमें और अधिक वैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता है. इसमें अन्य वैज्ञानिकों द्वारा रिव्यू रिसर्च की ज़रूरत है.
- ओआरबी मीडिया की पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें www.OrbMedia.org
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