मोटी महिलाओं में देर से पता चलता है स्तन कैंसर

मोटापा और कैंसर

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    • Author, केटी सिल्वर
    • पदनाम, हेल्थ रिपोर्टर, बीबीसी न्यूज़

अधिक वज़न वाली महिलाओं में स्तन कैंसर की गांठों का पता वक्त पर नहीं चल पाता. ऐसे मामलों में जब गांठ बहुत बड़ी हो जाती है तब पता चल पाता है. ये बात स्वीडन के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में पता चली है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि मोटी महिलाओं के स्तन कैंसर का पता लगाने के लिए कम समय के अंतराल में जांच (मैमोग्राम) कराते रहना चाहिए. ताकि सही समय पर गांठों का पता लगाकर इलाज किया जा सके.

हालांकि विषेशज्ञों ने कहा है कि इस अध्ययन की पुष्टि के लिए और सबूत चाहिेए.

ब्रिटेन में 50 से 70 साल की उम्र वाली महिलाओं को हर तीन महीने में स्क्रीनिंग के लिए बुलाया जाता है. उदाहरण के लिए ये ऐसी महिलाएं होती हैं जिनके परिवार में स्तन कैंसर का इतिहास रहा हो.

ज्यादा वज़न के कारण महिलाओं को स्तन कैंसर का ख़तरा रहता है, लेकिन फ़िलहाल इस आधार पर स्क्रीनिंग अंतराल को तय नहीं किया जाता.

स्तन कैंसर

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मोटापे से ख़तरा

द करोलिंकसा इंस्टीट्यूट के इस अध्ययन में उन 2,012 महिलाओं को शामिल किया गया जिन्हें 2001 से 2008 के बीच स्तन कैंसर हुआ था.

ये महिलाएं हर 18 महीने से दो साल के बीच मैमोग्राम कराती थीं. स्वीडन में इतने अंतराल को मानक माना जाता है.

शोधकर्ताओं ने इलाज के दौरान गांठ का आकार और महिला के बॉडी मास इंडेक्स (मोटापे का पैमाना) का अध्ययन किया.

टीम ने पाया कि ज़्यादा वज़न वाली महिलाओं में मैमोग्राम जांच के समय गांठ का पता चला.

अध्ययन की अगुवाई कर रहे फ़्रेड्रिक स्ट्रैंड ने बीबीसी को बताया कि ऐसा शायद इसलिए हुआ क्योंकि मोटी महिलाओं के स्तन ज्यादा बड़े थे, इसलिए गांठ का पता लगाना मुश्किल था. या फिर उनमें गांठ तेज़ी से विकसित हुई.

बड़ी हो चुकी गांठों का पूर्वानुमान लगाना आसान नहीं होता.

स्तन कैंसर

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कम दिनों के अंतराल में जांच

डॉ. स्ट्रांग कहते हैं, "अध्ययन का नतीजा ये बताता है कि जब डॉक्टर मरीज़ को स्तन कैंसर के बारे में बताता है तो उस समय बॉडी मास इंडेक्स का ज़रूर ध्यान रखना चाहिेए."

उनके मुताबिक, अध्ययन ये भी बताता है कि अधिक बॉडी मास इंडेक्स की महिलाओं को थोड़े-थोड़े अंतराल पर स्क्रीनिंग कराना चाहिेए.

लेकिन ब्रिटेन की कैंसर रिसर्चर सोफ़िया लॉज़ कहती हैं, "ये अध्ययन स्क्रीनिंग अंतराल के बारे में पर्याप्त तथ्य मुहैया नहीं कराता है."

वो कहती हैं कि स्क्रीनिंग के नुकसान और फ़ायदे दोनों हैं.

उनका कहना है कि कम उम्र में कैंसर की पहचान किए जाने में ये तकनीक मददगार है, लेकिन इसे कराने वाली ऐसी महिलाएं भी मिलीं जिनके परिवार में कोई हिस्ट्री न होने के बावजूद उनमें ये बीमारी पाई गई.

वो कहती हैं कि स्क्रीनिंग के अंतराल को इस तरह से तय किया जाता है कि नुकसान की तुलना में लाभ अधिक हो.

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