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क्यों एक छात्र चला चरमपंथ की ओर... | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पच्चीस साल पहले की बात है जब छह जून 1984 को सिखों के सबसे पावन स्थल दरबार साहिब यानि हरिमंदिर साहिब पर सेना का हमला हुआ. उस समय मैं ख़ालसा कॉलेज में 12वीं का छात्र था. इन हमलों को मैंने काफ़ी नज़दीक से अनुभव किया है...जब टैंक हमारी गलियों से गुज़रे, हमें ख़ौफ़ज़दा करते हु्ए आगे बढ़े और फिर हम गोलाबारी से सहम गए....अकाल तख़्त और हरिमंदिर साहिब पर गोले फ़ेंके गए और हम कभी छतों से तो कभी ख़िड़कियों से देखते रह गए... उस समय बहुत बुरा लग रहा था, घृणा आ रही थी सत्ता से... उस मुल्क और सरकार से जिसके साथ 1947 में हमने ख़ुद को जोड़ा था. तब दर्द और बढ़ा गया जब ये सोच दिमाग में आई कि आज़ादी की लड़ाई जिस जनता के साथ लड़ी थी वो ही देश 30-40 साल के बाद इतना बेगाना हो गया कि उसने सिख क़ौम के मुक़दस स्थल हरिमंदिर साहब पर टैंकों, तोपों और गोलियों से हमला कर दिया. हम आम नागिरक थे, इसलिए उन परिस्थितियों में कुछ नहीं कर सकते थे. उम्र भी बहुत छोटी थी, लेकिन दिल में ख़ासा रोष था. बदले की भावना जब दरबार साहिब पर हमला ख़त्म हुआ और हमें हरिमंदिर साहिब में जाने की अनुमति मिली तो मैंने देखा कि अकाल तख़्त टूटा हुआ था. जगह-जगह पर गोलियों के निशान थे. इन सारी बातों से मन को एक गहरा ज़ख्म मिला. फिर आहिस्ता-आहिस्ता जो रोष, ग़ुस्सा था, वो बदले की भावना में तब्दील होना शुरु हुआ. चूँकि हम नौजवान थे, ख़ून गर्म था तो हमें लगा कि भारत सरकार ने हम लोगों के साथ ज़्यादती की है. ऐसी सूरत में ये महसूस हुआ कि नौजवानों का घर में रहना धिक्कार है. उस माहौल में मैंने और कुछ और साथियों ने घर छोड़ने का फ़ैसला किया. इस घटना से हर सिख प्रभावित था. मैंने अपनी कॉलोनी में देखा कि औरेतें रो रही थी और कह रही थी कि 'नौजवानो कुछ करो.' छात्र इससे बहुत ही प्रभावित थे. अनेक सिखों के मन में ये बात घर करने लगी कि भारत से जो रिश्ता था अब ख़त्म हो गया. 'बब्बर ख़ालसा से जुड़े' इस रोष को प्रकट करने के लिए हम तीन-चार छात्र बब्बर ख़ालसा में शामिल हो गए. हमारा मक़सद था कि भारत ने जो हमारे साथ किया है उसका बदला लिया जाए. पहले हम इस आंदोलन में शामिल हुए, फिर धीरे-धीरे मुद्दों की समझ आई, ख़ालिस्तान की माँग उठी और हम लोग सोचने लगे कि जब हमारा रिश्ता भारत से नहीं रहा तो फिर आगे क्या करना है? तय हुआ कि एक अलग सिख राष्ट्र की स्थापना होनी चाहिए. इन गतिविधियों के दौरान 1984 से 96 तक लगभग 12 साल भूमिगत रहा. बीच में 1986 में थोड़े से समय के लिए जेला जाना पड़ा था. 'पछतावा नहीं' इस दौरान काफ़ी ख़ून बहा, हिंसा हुई... सरकार की ओर से जैसे दमन बढ़ा वैसे ही हमारी तरफ़ से भी जवाबी कार्रवाई उतनी ही भीषण थी. लेकिन आज 25 साल पीछे मुड़कर देखते हैं तो मुझे इसका कोई पछतावा नहीं है. हमने जो किया वो धार्मिक ज़िम्मेदारी समझते हुए किया. मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपने जीवन का कुछ समय अपने धर्म की सेवा में लगाया. फिर 1996 में गिरफ़्तारी हुई और जब मैं 1997 में जेल से बाहर आया तो समय बहुत बीत चुका था और परिस्थिति भी बहुत बदल चुकी थी. लोगों का ग़ुस्सा अंदर ही अंदर दब चुका था. अत्याचार काफ़ी हो चुका था. उस समय हमने सोचा कि जिस मक़सद के लिए हमने इतनी क़ुर्बानियाँ दीं, इतने ज़ुल्म सहे... उसको आगे लेकर चला जाए, लेकिन बदले हुए हालात में हमने अपने अभियान का तौर-तरीक़ा बदल लिया. हम लोकतांत्रिक तरीक़े से राजनीति में शामिल हुए और वहाँ अपनी जगह बनाई. इस समय हमारा मक़सद अपनी क़ौम के हितों की रक्षा करना और उनकी चुनौतियों से जुझना है. हम आज अपने उसी निशाने के साथ चल रहे हैं. आज भी हमारा मानना है कि सिखों से जो वादे किए गए थे वो पूरे नहीं हुए हैं. जो मुद्दे पहले उठे थे वो आज भी वैसे ही बने हुए हैं. 1947 में सिखों ने हिंदुओं और मुसलमानों के साथ आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी. हिंदुओं और मुसलमानों ने अपना-अपना देश बना लिया. जबकि हम एक ग़ुलामी के बाद दूसरी ग़ुलामी में आ गए. जहाँ तक सिख समस्या और उनके मुद्दों का का ममला है तो बात बड़ी सीधी सी है. स्वतंत्रता की रोशनी का हम भी लाभ उठाना चाहते हैं. हम चाहते हैं कि हम अपनी क़िस्मत के मालिक ख़ुद बने. हमारी तक़दीर और भविष्य का फ़ैसला कोई और कहीं और बैठकर न करे. आप इस आंदोलन को कोई भी नाम दे दें...सिख राष्ट्र, ख़ालिस्तान या ख़ालसा राज या कोई और नाम रख लें, हम अपनी क़िस्मत के मालिक ख़ुद बनना चाहते हैं.... |
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