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बैंक सेवा से चरमपंथ तक... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अकाल फ़ेडरेशन के कंवर सिंह धामी की कहानी उस ख़ालिस्तान समर्थक की है जो बैक कर्मचारी से चरमपंथी बना और आज भी अपनी अलग राष्ट्र की विचारधारा कायम रखते हुए एक समाजसेवक हैं. ग़ौरतलब है कि चरमपंथी लहर की शुरुआत में चरमपंथी नेता जरनैल सिंह भिंडरांवाले के साथ कई बातों पर सहमत होते हुए भी, कंवर सिंह धामी उन गिने चुने सिख नेताओं में से थे जिन्होंने कुछ बातों पर संत जरनैल सिंह का खुलकर विरोध भी किया. उनका सफ़र वर्ष 1972 से 1982 तक बैंक की नौकरी से शुरु हुआ और उन्होंने अपनी भावनाओं से विवश होकर और समाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में काम करने की लालसा लिए बैंक की नौकरी छोड़ दी. वर्ष 1983 में उन्होंने अकाल फ़ेडरेशन का गठन किया. ये ऐसा समय था जब सिख राजनीति में नरम दल माने जाने वाले शिरोमणि अकाली दल ने सिखों की पंजाब संबंधित माँगों को मनवाने के लिए अहिंसक धर्मयुद्ध मोर्चे के दौरान गिरफ़्तारियाँ देने शुरु किया हुआ था. 'भिंडरांवाले का भी विरोध किया' ये ऐसा समय था जब 1978 के अकाली-निरंकारी कांड में 13 सिखों के मारे जाने के बाद सिख युवक परेशान थे और धीरे-धीरे कट्टरपंथी नेता संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले के नेतृत्व में संगठित हो रहे थे. इसी के साथ उदारवादी माना जाने वाला शिरोमणि अकाली दल सिख राजनीति में हाशिए पर खिसकता जा रहा था. वे कहते हैं कि उस समय वे अमृतसर में हरिमंदिर साहब परिसर में संत जरनैल सिंह के साथ रहे लेकिन जिन मुद्दों पर वे असहमत थे, उनके बारे में उन्होंने अपनी आपत्ति खुलकर ज़ाहिर की. उन्होंने बताया, "हम संत जरनैल सिंह को अपना नेता ज़रूर मानते थे पर शायद मैं पहला ऐसा व्यक्ति था, बब्बर ख़ालसा संगठन के अलावा, जिसने सैद्धांतिक मतभेदों के कारण संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले के ख़िलाफ़ भी बयान दिए. ऐसा तब हुआ जब उन्होंने एक बार कहा था गणित के हिसाब से एक सिख को 32 हिंदुओं के साथ मुक़ाबला करना होगा. मैंने इसकी प्रेस में निंदा की थी." जून 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद वे भूमिगत रहे और उन्होंने कुछ समय पाकिस्तान में बिताया. उनका कहना है, "हाँ, मैं पड़ोसी देश में भी रहा लेकिन वहाँ भी मैंने विचारधारा और सिद्धांत नहीं छोड़े. मैं साफ़ कह सकता हूँ कि वहाँ मेरी उधर मौजूद लोगों के साथ सहमति भी नहीं बनी." ऑपरेशन ब्लूस्टार के 25 साल बाद बीबीसी ने उनसे पूछा कि उन्होंने उन वर्षों में हथियार उठाए थे, क्या उन्हें इस बात का कोई अफ़सोस है? कंवर सिंह धामी का कहना था, "मेरी आत्मा की आवाज़ यही कहती है कि मैंने कोई बुरा काम नहीं किया. मैंने पूर्व में हथियार उठाए थे मुझे कोई पश्चाताप नहीं है, जो किया वो मेरे गुरु ने करवाया. पूर्व पुलिस प्रमुख केपीएस गिल ने एक बार मेरा पूरा रिकॉर्ड देखकर कहा था कि इस व्यक्ति ने न तो कोई कत्ल किया, न करवाया, लेकिन फिर भी ये चरमपंथी है. मैं वो चरमपंथी हूँ जिसने न कभी हत्या की और न करवाई." उनका कहना था, "बेशक एक सिख प्रधानमंत्री आज ये कह रहा है कि 1984 की पुरानी घटनाओं को भूल जाओ, लेकिन ये संभव नहीं है. मैंने न्यायलय में भी ख़ालिस्तान की वकालत की थी. ख़ालिस्तान पर बोलने और लिखने के लिए मुझे जेल की सज़ा सुनाई गई थी और मैं 1994 से 1998 तक जेल में रहा." धामी का कहना था, "हमें इंतज़ार करना चाहिए. इस समय सभी लोग बड़ी संजीदगी के साथ चुप बैठे हैं. मैं स्पष्ट हूँ कि हम अलग देश तो चाहते हैं लेकिन ख़ून-ख़राबे के साथ नहीं, वह अच्छा नहीं होगा. हम किसी से ख़ून-ख़राबा करने के बाद ऐसा नहीं चाहते. धामी का मानना है, "मैने जो भी किया उस पर अफ़सोस नहीं है. जो हालात पहले थे, जो हमारे मुद्दे थे, वो अब भी वहीं हैं. मैंने जो कर्म किया है वह मेरे धर्म के मुताबिक था. हम लोग संजीदगी से चुप बैठे हैं. मैं स्पष्ट हूँ कि हम अलग देश तो चाहते हैं लेकिन ख़ून-ख़राबे के साथ नहीं, वह अच्छा नहीं होगा." चरमपंथ के बारे में पूछे जाने पर धामी का कहना था, "चरमपंथ केवल प्रेशर-ग्रुप यानी दबाव बनाने के लिए होना चाहिए. ये उसी वक्त होना चाहिए जब और कोई विकल्प न हो और क़ानून के रखवाले ही क़ानून का उल्लंघन करने लग जाएँ और कोई सुनवाई न हो. चरमपंथ से अलग देश नहीं मिलते. श्रीलंका में एलटीटीई की ताज़ा मिसाल हमारे सामने है." समाजसेवा की ओर उनका कहना था कि उनकी रिहाई के बाद उनके पिता और बच्चों की इच्छा थी कि वे सामाजिक क्षेत्र में लोगों की भलाई के लिए काम करें. इससे पहले भी वे बैंक की सर्विस के दौरान अमृतसर की राहत संस्था पिंगलवाड़ा के संस्थापक भगत पूरन सिंह के साथ कुछ काम करते रहे थे. उन्होंने मोहाली में गुरु आसरा ट्रस्ट कायम की जहाँ पर हिंसा से प्रभावित अनाथ हुए बच्चों, विध्वाओं और बीमार लोगों की सेवा की जाती है. ये संस्था पिछले कई वर्षों से सक्रिय है और लगभग एक हज़ार बच्चों के पालन-पोषण के बाद उन्हें अपने पैरों पर खड़ा किया जा चुका है. वहाँ केवल सिख धर्म की ही नहीं बल्कि कुछ हिंदू बच्चियाँ और बेसहारा महिलाओं को भी शरण दी गई है और कुछ का इलाज चल रहा है. |
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