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शुक्रवार, 05 जून, 2009 को 21:26 GMT तक के समाचार
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'दो-चार दिन में ख़ालिस्तान की घोषणा हो जाती'

लेफ़्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बरार
लेफ़्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बरार ने अपनी किताब में बताया है कि उन्हें अचानक ऑपरेशन का नेतृत्व करने के लिए बुलाया गया था
ऑपरेशन ब्लूस्टार का नेतृत्व करने वाले लेफ़्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बरार (उस समय मेजर जनरल) का कहना है कि जब वो 25 साल पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्हें इस बात का अफ़सोस होता कि सेना को अपने देश वासियों पर गोलियाँ चलानी पड़ी, लेकिन जो हालात थे उसमें कुछ भी ग़लत नहीं हुआ.

वो कहते हैं कि फ़ौजी हिंदू, मुसलमान या सिख नहीं होते बल्कि देश के रक्षक होते हैं. उन्हें वर्दी की लाज रखनी होती है. पेश है उनसे विस्तृत बातचीत के अंश.

जनरल बराड़ आपने अपनी किताब में ज़िक्र किया है कि इस ऑपरेशन के बारे में आपको पता नहीं था. आप मनीला जाने वाले थे. फिर कैसे पता चला कि इस ऑपरेशन का नेतृत्व आपको करना है और इसके लिए अमृतसर पहुँचना है. उस समय आप कहाँ थे.

मैं मेरठ में था और 90 इनफ़ैंट्री डिविज़न को कमांड कर रहा था. तीस मई की शाम फ़ोन आया कि मुझे एक जून को चंडीमंदिर एक मीटिंग के लिए पहुँचना है जबकि उसी शाम हमारा कार्यक्रम फ़िलीपींस की राजधानी मनीला जाने का था. टिकटें बूक हो चुकी थीं. लेकिन इस कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा...

मैं सड़क मार्ग से दिल्ली पहुँचा और फिर जहाज़ से चंडीगढ़ गया. सीधा वेस्टर्न कमांड पहुँचा. जब वहाँ पहुँचा तो मुझे बताया गया है कि हमें अमृतसर जल्दी से जल्दी जाना है. मुझे ब्रीफ़ींग के दौरान बताया गया कि हालात बहुत ख़राब हैं. जरनैल सिंह भिंडरांवाले ने पूरे स्वर्ण मंदर पर क़ब्ज़ा कर लिया है और पंजाब में क़ानून व्यवस्था चरमरा गई है. पुलिस और राज्य मशीनरी काम नहीं कर रही है. इन हालात को जल्दी से जल्दी ठीक करने हैं, नहीं तो पंजाब भारत के हाथ से निकल जाएगा.

 मुझे बताया गया था कि हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि अगले दो-चार दिन में ख़ालिस्तान की घोषणा हो जाएगी. जिसके बाद पंजाब पुलिस ख़ालिस्तान में मिल जाएगी. फिर दिल्ली और हरियाणा में जो सिख हैं वो फ़ौरन पंजाब की ओर बढ़ेंगे और हिंदू पंजाब से बाहर निकलेंगे. 1947 की तरह दंगे हो सकता है. पाकिस्तान भी सीमा पार कर सकता है
जनरल बराड़

इस ब्रीफ़ीग के बाद मैं अमृतसर पहुँचा. उस समय मुझे कुछ भी पता नहीं था कि स्वर्ण मंदिर में क्या हो रहा है और क्या नहीं हो रहा है. इसी स्थिति में मैंने अपनी रणनीति की शुरुआत की.

आपको ब्रीफ़ में ऑपरेशन के क्या उद्देश दिए गए थे?

मुझे बताया गया था कि हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि अगले दो-चार दिन में ख़ालिस्तान की घोषणा हो जाएगी. जिसके बाद पंजाब पुलिस ख़ालिस्तान में मिल जाएगी. फिर दिल्ली और हरियाणा में जो सिख हैं वो फ़ौरन पंजाब की ओर बढ़ेंगे और हिंदू पंजाब से बाहर निकलेंगे. 1947 की तरह दंगे हो सकता है. पाकिस्तान भी सीमा पार कर सकता है, यानी पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने की घटना भारत में दोहराई जा सकती है.

ऐसे में सेना के लिए बहुत कठिन काम था. दंगे, ख़ालिस्तान की संभावित घोषणा और पाकिस्तानी सेना का सीमा के अंदर प्रवेश को रोकना.

हालाँकि इन सब हालात को देखते हुए उस समय की प्रधानमंत्री ने कोशिश की कि किसी तरह का समझौता हो जाए. लेकिन जब कोई समझौता नहीं हो पाया तो उन्होंने फ़ैसला किया कि अब कार्रवाई की जाए और स्वर्ण मंदिर को भिंडरावाले के हाथ से निकाला जाए.

लेफ़्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बराड़
जनरल बराड़ का कहना है कि ऑपरेशन में काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा

बहुत नाज़ुक मामला था लेकिन मुझे ब्रीफ़ दी गई थी कि ऑपरेशन में कम से कम लोग हताहत होने चाहिए. स्वर्ण मंदिर का भी कम से कम नुक़सान हो.

ये बताएं कि पाँच जून का ही दिन क्यों चुना गया. इसके बारे में पहले से तय था या यह निर्णय आपने लिया.

ऐसी कोई बात नहीं थी. योजना बनाने और सेना को पहुँचने में दिन लग जाता है. सैनिकों को मेरठ, जालंधर और दिल्ली से आना था, फिर उन्हें तैनात करना था. ये पता लगाना था कि आतंकवादी कहाँ-कहाँ पर हैं. उनके पास क्या हथियार हैं. योजना बनाने में वक़्त तो लगता है.

क्या आपको कुछ ख़ुफ़ीया जानकारी मिल पा रही थी कि मंदिर परिसर में किस तरह की तैयारी थी. कुछ अंदाज़ा था?

नहीं पहले से कोई जानकरी नहीं थी. जब वहाँ पहुँचा तो स्थिति से परिचित हुआ. पुलिस वाले नज़र नहीं आ रहे थे. बहुत ही कम संख्या में थे. हम लोगों ने तैयारी शुरू की और एक सिख अफ़सर को सादे कपड़े में श्रद्धालु के रुप में अंदर भेजा और वो जो देख सकते थे उसकी जानकारी दी. साथ ही स्वर्ण मंदिर के बाहर के मकानों की छतों से दूरबीन की मदद से स्थिति का आंकलन किया.

क्या आपने ऑपरेशन के पहले सैनिकों को प्रेरित करने और मिशन के बारे में बताने के लिए बात की.

देखिए हम लोग पाँच जून की रात को अंदर गए है. इसलिए पाँच की सुबह मैंने सैनिकों को ऑपरेशन के बारे में बताया. उससे पहले नहीं बताया गया, क्योंकि अगर इसकी ख़बर बाहर चली जाती तो ये ऑपरेशन अपने अंजाम को नहीं पहुंच सकता था. पूरे पंजाब में ये बात फैल जाती की सेना अंदर जाने वाली है. इसलिए जितनी देर से जानकारी दे सकते थे दी.

पाँच जून की सुबह साढ़े चार बजे हर एक बटालियन के पास जाकर करीब आधे घंटे तक उनके जवानों से बात की. उन्हें बताया कि हालात कितने ख़राब हो गए हैं. हमें अंदर जाना ही है और ये नहीं सोचना चाहिए कि हम किसी पवित्र स्थल पर जाकर उसको बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि हम उसकी सफ़ाई करने जा रहे हैं.

हमें ये नहीं सोचना है कि हम सिख, हिंदू, मुसलमान, ईसाई या पारसी हैं. बल्कि हमकों इस देश के बचाव के लिए कार्रवाई करनी है.

उनको समझाया कि पंजाब अलग हो सकता है और इसे देश का विभाजन हो सकता है. मैंने कहा कि जब हमने एक बार वर्दी पहन ली है और क़सम खा ली है तो देश की रक्षा करनी है. हमें जो हुक़्म मिला है हमें उसका पालन करना है.

मैंने पूछा कि यदि कोई जवान सोचता है कि उसे अंदर नहीं जाना है तो वो कह दें, उसे इस कार्रवाई में शामिल नहीं किया जाएगा और उसके ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं होगा.

किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन चौथे बटालियन में एक सिख खड़ा हुआ. मैंने उनसे कहा कि अगर आपको अंदर नहीं जाना तो आप भाग लेने से मुक्त हैं और आपके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होगी.

लेकिन उस सिख अधिकारी ने कहा है कि 'आप मुझे ग़लत समझ रहे हैं. मैं सबसे पहली टुकड़ी में अंदर जाना चाहता हूँ. आप मुझे सबसे पहले भेजें ताकि मैं भिंडरांवाले से निपट लूँ. मैंने निर्देश दिया कि उनकी पलटन सबसे आगे और पहले जाएगी और ऐसा ही हुआ.

उस शुरुआती हमले में मशीनगन की फ़ायरिंग से उसकी दोनों टांगे टूट गई. ख़ून बह रहा था फिर भी वो रेंगते हुए आगे बढ़ता रहा. बाहर एंबुलेंस खड़ी थी और उसे ज़बर्दस्ती पकड़ कर वापस लाया गया. उनकी बहादुरी के लिए उन्हें अशोक चक्र दिया गया. वे राष्ट्रपति भवन व्हील चैयर से आए और उन्होंने सम्मान ग्रहण किया.

ऑपरेशन कितने बजे शुरू हुआ. कब सेना की पहली टुकड़ी भेजी गई.

हम ऑपरेशन शाम को सात बजे शुरू करना चाहते थे. इसलिए हमने पाँच बजे से ही लाउडस्पीकर से यह एलान करना शुरू कर दिया कि जो लोग निकलना चाहते हैं वो बाहर निकल जाए. क्योंकि हम चाहते थे कि जो मासूम लोग हैं उन्हें कोई नुक़सान न पहुँचे. लेकिन कोई नहीं आया, फिर हमने सात बजे एलान किया लेकिन कोई नहीं आया. तब हमने ऑपरेशन का समय बढ़ाकर आठ बजे कर दिया. फिर नौ बजे भी एलान किया. उस समय आठ से दस बुज़ुर्ग लोग बाहर निकले. उनका कहना था कि दूसरे लोग आना चाहते हैं लेकिन आने नहीं दिया जा रहा है.

तब हम लोगों ने सोचा कि अगर और इंतज़ार किया तो रात निकल जाएगी और जब दिन चढ़ेगा तो यह बात पंजाब के कोने-कोने में पहुँच जाएगी. तब लाखों सिख अपनी बंदूक़ें और तलवारें लेकर यहाँ चले आएंगे. सुबह तक ऑपरेशन ख़त्म नहीं हुआ तो सेना के लिए मुश्किल पैदा हो जाएगी. इसलिए साढ़े नौ बजे के क़रीब ऑपरेशन की शुरुआत हुई.

किस समय आपको लगा कि चीज़े योजनाबद्ध नहीं चल रही हैं और सेना को मुश्किल का समाना करना पड़ रहा है.

मोर्चा
सेना ने स्वर्ण मंदिर के आसपास की इमारतों पर मोर्चा बनाए हुए थे

पहले 45 मिनट में उनकी ताक़त, हथियार और योजना के बारे में पता लग गया कि उनकी तैयारी काफ़ी अच्छी है. ऐसे में ये ऑपरेशन इतना आसान नहीं होगा.

हम लोगों की कोशिश थी कि कमांडो अकाल तख़्त की ओर जाएँ. इसके लिए सन ग्रेनेड फेंके गए. जिससे आदमी मरता नहीं है लेकिन आंखों में आंसू आ जाते हैं ताकि उतनी ही देर में कमांडो अंदर चले जाएं. लेकिन हर दरवाज़े और खिड़की पर सैंडबैग लगे हुए थे, इसलिए इसका कोई असर ही नहीं पड़ रहा था. बल्कि ये सनग्रेनेड हमारे ही जवानों के ऊपर आ रहे थे. फिर ज़रूरत के हिसाब से समय-समय पर रणनीति में बदलाव किया जाता रहा.

क्या तीन मीनारों को उड़ाने का फ़ैसला आपका था? उसके पीछे क्या रणनीति थी.

ऐसा इसलिए किया गया कि उन मीनारों पर सैंडबैग लगाकर आतंकवादी मशीनगन के साथ बैठे थे. जब तक उसको नहीं उड़ाया जाता जवानों का अंदर जाना मुमकिन नहीं था, क्योंकि उन मीनारों से सीधे फ़ायरिंग हो रही थी.

क्या पैराटूपर्स को भी वहाँ गिराया गया था और आप कितनी दूरी पर थे. किस तरह की ख़बरें आ रही थी शुरू में. आपने लेफ़्टिनेंट कर्नल इसरार ख़ान को भेजा था. उनकी तरफ़ से आप को क्या फ़ीडबैक मिला.

नहीं पैराटूपर को नहीं गिराया गया था. मैं परिसर से पचास गज की दूरी पर था. इसरार ख़ान ने बताया कि अंदर से काफ़ी गोलीबारी हो रही है. मशीनगन और ग्रेनेड फेंके जा रहे हैं.

हम लोग अकाल तख़्त की पहली मंज़िल पर जाना चाहते थे लेकिन इसरार का कहना था कि पहले परिक्रमा को साफ़ किया जाए फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ा जाए.

शुरु में आपकी योजना थी कि चरमपंथियों के बाहरी सुरक्षा कवच को कमज़ोर किया जाए और फिर भिंडरांवाले को हथियार डालने पर मजबूर किया जा सके. वो रणनीति क्यों सफल नहीं हो पाई.

हमारे पास समय बहुत कम था इसलिए हम उनके बाहरी सुरक्षा को हटा नहीं सके और हमें चारों ओर से जाना पड़ा. एक जगह से कामयाबी नहीं मिली तो दूसरी जगह से मिल जाए और जो भी विकल्प थे तमाम का इस्तेमाल किया जाए.

टैंकों को भेजने का निर्णय कब लिया गया. क्या ये आपकी योजना में पहले ही से था?

नहीं! बिल्कुल योजना में नहीं था. ये निर्णय बाद में लिया गया जब हम लोगों को लगा कि जवान अकाल तख़्त के क़रीब नहीं पहुँच पा रहे हैं तो उसके अंदर कैसे जा सकते हैं.

और देर होती तो सुबह हो जाने का डर था. अगर सुबह हो जाती तो लोगों के आने से सेना के लिए परेशानी बढ़ जाती. टैंकों का प्रयोग इसलिए किया गया कि उसके ज़िनोन या हैलोजन लाइट के ज़रिए कुछ समय के लिए आतंकवादियों को रोशनी से चौंधिया कर सेना प्रवेश कर सके. लेकिन ये लाइट फ़्यूज हो गई, फिर दूसरा टैंक लाया गया. लेकिन कामयाबी नहीं मिली, जबकि सुबह भी हो रही थी.

अकाल तख़्त की ओर से बुरी तरह से फ़ायरिंग हो रही था. तब जाकर ये आदेश दिया गया है कि टैंक के ज़रिए अकाल तख़्त के ऊपर वाले हिस्से पर फ़ायरिंग की जाए. ताकि जब ऊपर से कुछ पत्थर वग़ैरह गिरेंगे तो लोग डर जाएं.

हमें ऑपरेशन पूरा होने का आभास तब हुआ जब लोग सफ़ेद झंडे के साथ बाहर निकले. तब पता चला कि भिंडरावाले की मौत हो गई है. इसके बाद सिख लड़ाकों का मनोबल गिर गया. फिर वो लड़ने के लिए तैयार नहीं थे. कई ने भागने की कोशिश की. कई लोगों ने सरोवर के अंदर छलांग मारी और वे भी फ़ायरिंग की चपेट में आ गए.

जरनैल सिंह भिंडरांवाले
संत जरनैल सिंह के साथ उनके कई सशस्त्र सहयोगी स्वर्ण मंदिर परिसर में थे

ऐसी भी बात कही जाती है कि टैंक भेजने से पहले ऐपीसी (सैनिकों को ले जाने वाली बख्तरबंद गाड़ी) भेजने की कोशिश की गई थी जिसे रॉकेट लॉंचर से उड़ा दिया गया.

जी ऐसी कोशिश की गई थी क्योंकि हम लोगों को नहीं मालूम था कि उनके पास रॉकेट लॉंचर भी है. ऐपीसी के ज़रिए कमांडो भेजने की कोशिश की गई थी.

टैंक भेजने का निर्णय आप लोगों ने लिया या ये फ़ैसला दिल्ली ने लिया.

ये कहना मेरे लिए मुश्किल है, लेकिन हमें इसका हुक्म जनरल सबरजीत सिंह ढिल्लों ने दिया और कहा कि टैंक भेजा जाए. उन्होंने ज़रूर दिल्ली से अनुमति ली होगी.

आपको यह कब अंदाज़ा हुआ कि भिंडरांवाले नहीं रहे और उनके सैन्य कमांडर जनरल सुभेग सिंह की मृत्यू हो गई. इस सिलसिले में पहला संकेत आपको कब मिला.

जब कुछ लोग सफ़ेद झंडा लेकर निकले और फिर फ़ायरिंग भी बंद हो गई तो लगा कि कुछ हुआ है और फिर उनके मारे जाने की पुष्टि हुई.

इस ऑपरेशन के बाद आप परिसर में कब घुसे और आपने क्या देखा.

जब ख़बर आई की भिंडरांवाले मारे गए तो हम घुसे. छह जून को सुबह लगभग दस बजे.

आपके अनुसार कितने लोग इस ऑपरेशन में मारे गए होंगे.

पूरे आंकडे तो फ़िलहाल मेरे पास नहीं हैं लेकिन सेना के सौ जवान और तीन सौ सिख विद्रोही मारे गए थे.

 अफ़सोस होता है कि आख़िर हमें ऐसा ऑपरेशन क्यों करना पड़ा? जब अपने लोगों पर हमला करना पड़ा? लेकिन ऐसे समय क्या किया जा सकता है जब अपने ही देश के लोग आतकंवादी बन जाएँ और पाकिस्तान से हाथ मिला लें
जनरल बराड़

पच्चीस साल बाद आप इस ऑपरेशन को किस तरह देखते हैं. कोई पछतावा, कोई दूसरा तरीक़ा अपनाया होता तो परिणाम बेहतर होते.

ये तो मैंने कई दफ़ा सोचा है कि कोई और तरीक़ा हो सकता था या नहीं. लेकिन उस समय के जो हालात थे और जो समय की कमी थी. उसको ज़ेहन में रखते हुए कोई और तरीक़ा नहीं हो सकता था.

लेकिन जब हम 25 साल पहले को देखते हैं तो अफ़सोस होता है कि आख़िर हमें ऐसा ऑपरेशन क्यों करना पड़ा? जब अपने लोगों पर हमला करना पड़ा? लेकिन ऐसे समय क्या किया जा सकता है जब अपने ही देश के लोग आतकंवादी बन जाएँ और पाकिस्तान से हाथ मिला लें.

मन में सिर्फ़ इस बात से शांति है कि हमने स्वर्ण मंदिर को गंदगी से साफ़ कर दिया.

जनरल बरार आप ख़ुद सिख है इसके बावजूद आपने इस ऑपरेशन का नेतृत्व किया. किसी समय पर आपको कुछ सोचने पर मजबूर होना पड़ा.

देखिय मैं तो यह जानता हूँ कि जब एक बार वर्दी पहन ली और क़सम खा ली है कि इस देश की रक्षा करेंगे और इस देश को टूटने नहीं देंगे तो फिर हम नहीं सोचते कि सिख हैं या हिंदू. मुझे अफ़सोस है कि इस घटना के बाद मेरे कई अपनों ने मुझसे रिश्ता तोड़ लिया.

मेरे मामा जो इंग्लैंड में रहते थे, उन्होंने मुझसे नाता तोड़ लिया और सारी उम्र बात नहीं की. जब वे मृत्यु के बहुत क़रीब थे तब ही उन्होंने मुझसे बात की. लेकिन ऐसा तो होता ही है, वे भी समझ गए होंगे की अपनी ज़िम्मेदारी निभाना मेरा मजबूरी थी.

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