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शनिवार, 04 अप्रैल, 2009 को 01:49 GMT तक के समाचार
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खरी खरीः चरम पर है राजनीतिक अवसरवाद

चुनाव
चुनाव के मौसम में कई मोर्चे बन और बिगड़ रहे हैं

पच्चीस साल की अपनी पत्रकारिता में मैंने कई चुनाव देखे और रिपोर्ट किए हैं.

भारतीय चुनाव किसी जलसे या पर्व से कम नहीं होते और अगर आप किसी भी राजनीतिक रिपोर्टर से पूछिए तो वह बता देगा कि राजनीतिक ख़ासकर चुनावी रिपोर्टिंग का भी एक अनूठा, जैसे सिर चढ़कर बोलने वाला नशा और आनंद है.

पर यह चुनाव कुछ अलग है. शायद अभी चुनावी बुखार अपने परवान पर नहीं है. या फिर मैं ही चुनावी रिपोर्टिंग कर-करके कुछ सिनिकल या कम उत्साहित हो गया हूं.

पर अपने को जल्दी बोर हो जाने वाले आदमी की तरह मैं अभी कतई नहीं देखता.

(लोकसभा चुनाव 2009 के दौरान संजीव श्रीवास्तव की ओर से लिखे जा रहे ब्लॉगों पर यदि आप टिप्पणी करना चाहें या विचार व्यक्त करना चाहें तो नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें)

जिन चीज़ों में मज़ा है, जिनका शौक है, और मैं ऐसा मानना चाहूंगा कि राजनीतिक रिपोर्टिंग और गपशप उन चीज़ों में शामिल हैं, उनमें मेरा अभी भी जैसे बालपन का उत्साह मौजूद है.

फिर ऐसा क्या है कि इन चुनावों में न सिर्फ दिलचस्पी ही कुछ कम पैदा हो रही है बल्कि एक अजब सी नकारात्मक अनुभूति भी इस चुनावी प्रक्रिया के सिलसिले में हो रही है.

 चुनाव सत्ता पाने की कवायद है यह तो हम सब आरंभ से ही जानते थे पर इस कवायद को कुछ अच्छे लोगों ने और ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने सत्ता पाने का नंगा और सिद्धांतहीन खेल बनने से रोका हुआ था

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ मज़ा ही नहीं आ रहा है... कुछ अच्छा भी नहीं लग रहा है.

कारण कल उस समय बिजली की तरह जैसे स्पष्ट हुआ जब एक जानी मानी महिला सांसद ने बातों बातों में कहा कि "दीज़ इलेक्शंस सिगनल दि डैथ ऑफ़ आइडियोलॉजी" या इन चुनावों ने सिद्धांतों को जैसे दफ़्न किए जाने का संदेश दिया है.

रीढ़ खोती राजनीति

बिल्कुल सही. चुनाव सत्ता पाने की कवायद है यह तो हम सब आरंभ से ही जानते थे पर इस कवायद को कुछ अच्छे लोगों ने और ज़्यादातर राजनीतिक दलों ने सत्ता पाने का नंगा और सिद्धांतहीन खेल बनने से रोका हुआ था.

या कम से कम वह सिद्धांतों का एक ऐसा आवरण तो अपनी महात्वाकांक्षाओं पर डालने में कामयाब होते थे कि उनकी सत्तालोलुपता छुप जाती थी. जैसे यशपाल की कहानी 'पर्दा' में चौधरी पीरबख़्श अपने घर की ग़रीबी और आबरू को पर्दे से छिपाकर रखता है.

पर अब तो खुला खेल फ़र्रुखाबादी है. हर दूसरा राजनीतिज्ञ और संयोजक आपको बिना पलक झपकाए यह कहता मिल जाएगा कि जनाब असली खेल तो 16 मई को चुनावों के बाद शुरू होगा. तब देखिएगा कि कौन किसके हाथ जाएगा. अभी हो रही घोषणाओं और गठबंधनों का कोई मतलब नहीं है.

मतलब यह कि इस समय हर राजनीतिक दल की कोशिश बस एक है कि वह ज़्यादा सांसदों के साथ 16 मई को नज़र आए और फिर जहाँ उसे 'बेस्ट डील' मिले, वहीं अपने तामझाम के साथ डेरा डाल दे. यानी सिद्धांत, पहले से तय गठबंधन, पुरानी दोस्ती इत्यादि सब बातें गईं तेल लेने.

 अब तो खुला खेल फ़र्रुखाबादी है. हर दूसरा राजनीतिज्ञ और संयोजक आपको बिना पलक झपकाए यह कहता मिल जाएगा कि जनाब असली खेल तो 16 मई को चुनावों के बाद शुरू होगा. तब देखिएगा कि कौन किसके हाथ जाएगा. अभी हो रही घोषणाओं और गठबंधनों का कोई मतलब नहीं है

कल लोग कह सकते हैं कि पत्रकारों को तो सिर्फ़ राजनेताओं की खिंचाई करने में मज़ा आता है. तो उन्हें बानगी स्वरूप पेश कीजिए इन चुनावों के दौरान जानी मानी पार्टियों और उनके नेताओं के पाला बदलने की फ़ेहरिस्त.

बदले बदले सरकार...

किस अंदाज़ में लालू-पासवान की जोड़ी ने बिहार में कांग्रेस को धता बताया. मंत्रिमंडल में फिर भी बरक़रार रहे और जिस दिन चौथा मोर्चा बनाने लखनऊ पहुँचे, उस दिन चौथे मोर्चे को तो छोड़िए, तीसरे मोर्चे को भी धता बता डाला.

आपने देखा होगा कि किस प्रकार लालू और पासवान ने शुक्रवार को लखनऊ में यूपीए और मनमोहन ही अगले प्रधानमंत्री होंगे के नारे का लगातार जाप किया. कल यही नेता फिर कोई नया राग अलाप सकते हैं.

कांग्रेस भी कुछ कम नहीं है. उन्होंने लालू जी को उनका सही स्थान दिखाने के लिए उनके साले साधु यादव को अपनी पार्टी से टिकट दे दिया. झारखंड में एकतरफा घोषणा कर दी अपने उम्मीदवारों की.

समाजवादी पार्टी की पहले जिस तरह उन्होंने अपनी सरकार बचाने के लिए समर्थन लिया और फिर धता बताया, ऐसे भी उदाहरण कम ही मिलेंगे.

शरद पवार को ही देखिए, खुद भी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, मनमोहन सिंह के नाम की दुहाई देते भी नहीं थकते. महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन करते हैं. तीसरे मोर्चे के साथ फ़्लर्ट करना भी बंद नहीं करते.

सबको मालूम है कि वो चुनाव के बाद कहीं भी हो सकते हैं और कोई प्रधानमंत्री बना दे तो फिर तो सचमुच कहीं भी जा सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं.

 शरद पवार को ही देखिए, खुद भी प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, मनमोहन सिंह के नाम की दुहाई देते भी नहीं थकते. महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ गठबंधन करते हैं. तीसरे मोर्चे के साथ फ़्लर्ट करना भी बंद नहीं करते

लेकिन मैं पवार साहब पर ही इतना मेहरबान क्यों हो रहा हूं. क्योंकि वो अपनी इच्छाओं और महात्वाकांक्षाओं के मामले में कई अन्य नेताओं से ज़्यादा पारदर्शी हैं. इस बात पर तो उनका अभिनंदन होना चाहिए, न कि इतनी आलोचना.

आखिर मुलायम, लालू, देवेगौड़ा, मायावती, जयललिता, नायडु और अब तो मार्क्सवादी भी शायद वही चाहते हैं. फिर पवार साहब को ही क्यों सिंगल आउट किया जाए.

पानी, तेरा रंग कैसा...?

गठबंधन जोड़ीदारों की बात करें तो लोगों ने रिश्ते और पार्टियाँ ऐसे बदली हैं कि हम और आप कपड़े भी क्या बदलते होंगे.

नवीन पटनायक के बीजू जनतादल ने भाजपा का 11 बरसों का साथ छोड़ने पर कोई सैद्धांतिक सफ़ाई देने की भी ज़रूरत नहीं समझी.

 आडवाणी जी की कुंडली पर जैसे पीएचडी कर चुके लालू प्रसाद भी हर स्थिति में उनका विरोध करेंगे, इसकी संभावना तो है पर हालात देश के ऐसे हैं कि इसकी भी गारंटी कोई नहीं ले सकता है

उनके एक नेता ने तो यहाँ तक कह डाला कि पार्टी ने यह फैसला अपनी जीत की संभावनाओं या 'विनेबिलिटी फ़ैक्टर' को ध्यान में रखते हुए लिया.

अभी भी कोई माई का लाल यह बात दावे के साथ नहीं कह सकता कि चुनाव बाद बीजू जनतादल किधर जाएगा. आवश्यकता पड़ने पर वह वापस एनडीए में भी जा सकते हैं.

उधर पीएमके और रामडॉस को ही देखिए. आखिरी दिन तक सत्ता का सुख लिया. केंद्र में मंत्री रहे, फिर एक मौके पर पाला बदल दूसरी तरफ हो गए.

चलिए यह भी सही पर जाते जाते यह भी कह गए कि आवश्यकता पड़ी यानी कि इस थाली में ज़्यादा घी नज़र आया तो चुनाव बाद फिर यूपीए में आ सकते हैं. अब इसे भी मौकापरस्ती नहीं कहेंगे तो फिर किसे कहेंगे.

इन चुनावों के बाद कुछ भी हो सकता है. शिवसेना शरद पवार का समर्थन कर सकती है, नितीश कुमार कांग्रेस के साथ जा सकते हैं और आडवाणी जी की कुंडली पर जैसे पीएचडी कर चुके लालू प्रसाद भी हर स्थिति में उनका विरोध करेंगे, इसकी संभावना तो है पर हालात देश के ऐसे हैं कि इसकी भी गारंटी कोई नहीं ले सकता है.

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