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खरी-खरी: असहमत पाठकों से रू-ब-रू | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैंने वरुण गांधी पर अपने पिछले ब्लॉग में लिखा था कि वरुण गांधी मुद्दे पर हो रही राजनीतिक उठा-पटक में मेरी कोई विशेष दिलचस्पी नहीं है. किसको फ़ायदा हो रहा, किसकों नुकसान, इस नापतोल की समीक्षा करने की मेरी कोई इच्छा नहीं है. मैं तो हैरान हूँ कि वरुण गांधी जैसा शिक्षित, सुसंस्कृत युवा इस तरह की भाषा बोल सकता है और इस तरह की सोच रख सकता है. अनेक पाठकों ने इस ब्लॉग पर विचार व्यक्त किए हैं. (लोकसभा चुनाव 2009 के दौरान संजीव श्रीवास्तव के ब्लॉग के सिलसिले का यह दूसरा अंक है. यदि आप इस पर टिप्पणी करना चाहें या विचार व्यक्त करना चाहें तो क्लिक करें) इस क़िस्से पर मेरे विचारों से असहमत दोस्तों को यह मेरा उत्तर देने का प्रयास है. जो बातें आप में से बहुत से लोगों को नागवार गुज़री है, वह हैं... 1. वरुण गांधी का क़सूर इतना ज़्यादा नहीं था जितनी उन्हें सज़ा दी गई है. अर्थात राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका) लगाया जाना ज़्यादती है. हाथी से चींटी मारने की कोशिश है. 2.वरुण गांधी पर ही आप इतनी छींटाकशी क्यों कर रहे हैं. दूसरे नेता तो इससे भी ज़्यादा कह और कर जाते हैं. 3.धर्मनिरपेक्षता का सारा ज्ञान हिंदू वरुण गांधी को ही घुट्टी बना आप क्यों पिलाना चाहते हैं. मुस्लिम कट्टरपंथियों पर तो आप सरीखे इकतरफ़ा समीक्षकों की नज़र पड़ती ही नहीं. 4. सारी गल़ती मीडिया की है. सोच से ऐतराज़ पहली बात का उत्तर- जी हाँ, मैं मानता हूँ कि राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून का लागू किया जाना कुछ ‘ओवररिएक्शन’ है. पर जैसा मैंने लिखा था कि यह बिंदु मेरे लिए बेमानी है. मुझे वरुण गांधी की सोच से ऐतराज़ था और आज भी है. सज़ा एक अलग मुद्दा है, जिसपर मैं आपसे सहमत हो सकता हूँ. दूसरे बिंदु पर भी आप सही हैं. मैंने पहले भी कहीं कहा था कि वरुण से कहीं बहुत ज़्यादा ग़लत बातें कहने और करने वाले इतनी सुर्ख़ियों में नहीं होते जितने वरुण हैं. उसका कारण भी स्पष्ट है. जैसा मैंने लिखा कि वरुण सरीखे युवा से मुझे बेहतर बर्ताव और सोच की उम्मीद थी. अगर कोई जाहिल, गंवार, आपराधिक प्रवृत्ति या 'बैकग्राउंड' का व्यक्ति वो बोलता जो वरुण ने कहा, तो शायद ही किसी का ध्यान जाता. जहाँ तक मुस्लिम कट्टरपंथ की बात है तो इस ब्लाग में मुस्लिम कट्टरपंथ के ज़िक्र की गुंजाइश थी ही नहीं. इस शंका का निवारण उम्मीद करता हूँ कि सही मौक़े पर मैं कर पाऊँगा. जहाँ तक मीडिया की ग़लती है कृपया संदेशवाहक को मत कोसिए, जिसे अंग्रेज़ी में कहा जाता है, 'डोंट शूट द मसेंजर'. पर कुछ हद तक मैं इस बात से सहमत हूँ कि अगर मीडिया इस विषय को इतना तूल नहीं देता तो शायद वरुण गांधी इस दिशा में इस तरह और इतना आगे नहीं बढ़ते. अन्य पक्ष चंद बातें और - जिस तरह की मिश्रित प्रतिक्रिया आई उसमें एक हिंदू-मुस्लिम पक्ष या 'एंगल' तो था ही, जो दुर्भाग्यपूर्ण होते हुए भी कुछ हद तक समझ में आता है. जैसा कि अपेक्षित था, किसी भी मुसलमान पाठक को वरुण गांधी की बातें सही नहीं लगीं. हिंदू सोच बंटा हुआ था. कुछ वरुण के पक्ष में थे और कुछ विरुद्ध. लेकिन एक और भी पहलू है, जिसपर मैं कुछ कहना चाहूँगा. वरुण को सही समझने वाले और मेरे विचारों पर ज़्यादा कड़ा ऐतराज़ करने वाले ज़्यादातर लोग भारत के बाहर बसे हिंदू हैं. स्वीडन, अमरीका, स्पेन और ब्रिटेन में रहने वाले इन लोगों को मेरी बातों से कहीं ज़्यादा ऐतराज़ था, बनिस्बत उनके जो जयपुर, आसनसोल या आगरा में रहते हैं. मैं इस तथ्य के ज़्यादा विश्लेषण की आवश्यकता नहीं समझता. समझदार को इशारा काफ़ी है. पर एक बात अवश्य है, इस मुद्दे और हमारे समाज एवं सोच की तमाम पेचीदगियों को ध्यान में रखते हुए मैं इस बात को ‘सैलिब्रेट’ करना चाहूँगा कि एक देश ऐसा भी है जहाँ ज़्यादा बड़ा दिल रखने वाले, भाईचारे की भावना के साथ चलने वाले और धार्मिक सहिष्णुता का सही अर्थ समझने वाले लोगों की बड़ी संख्या बसती है. |
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