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सोमवार, 30 मार्च, 2009 को 10:09 GMT तक के समाचार
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लाहौर हमला: प्रत्यक्षदर्शी की ज़ुबानी
एएफ़पी/ गेटी
पाकिस्तान के लाहौर शहर में पुलिस अकादमी पर हुए हमले में कम से कम 40 लोग मारे गए हैं.

पुलिस प्रशिक्षण केंद्र के पास एक निर्माण कंपनी चलाने वाले आमिर शज़ाद हमले के समय घटनास्थल पर ही थे. बतौर प्रत्यक्षदर्शी उन्होंने हमले की जानकारी बीबीसी को दी.

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मैने एक सफ़ेद वैन देखी और उसमें से चार-पाँच आदमी बड़े बड़े झोले लिए निकल रहे थे. वैन वहाँ से तुरंत चली गई.

ये लोग प्रशिक्षण केंद्र के मेन गेट से नहीं आए बल्कि उन्होंने दीवार फ़ाँदी और अपने झोले में से हथियार निकाले. उसके बाद मैने गोलीबारी और धमाके की आवाज़ें सुनीं.

मैं मुख्य गेट के सामने ही था. मैं वहाँ रुक गया और देखने लगा. फिर मुझे एहसास हुआ कि हालात गंभीर है और कुछ मिनट बाद ही मैने पुलिस को फ़ोन किया. उधर से जवाब आया, हमें पता है, हमें पता है.

मैने पुलिस को वैन के बारे में भी बताया. मैं वैन का पीछा नहीं कर सका. वैसे तो मैं बाइक पर था लेकिन जब ये घटना घटी तो मैं पैदल ही था.

मैं उस समय ग्रैंड ट्रंक रोड पर था जो मेरी कंपनी की कन्स्ट्रकशन साइट की ओर जाती है. पुलिस प्रशिक्षण केंद्र के परिसर के अंदर क्या हुआ वो मैने नहीं देखा.

मैने देखा कि हमलावरों ने क्या पहना हुआ था. वे लोग सलवार कमीज़ पहने हुए थे. लेकिन एक ने नीले रंग का ट्रैक सूट पहना हुआ था. वे हम लोगों की तरह ही दिखते थे. उनका हेयरस्टाइल किसी भी युवा व्यक्ति जैसा था. वे युवा थे और स्वस्थ दिख रहे थे. मुझे लगा कि वे पंजाबी थे.

वे परिसर में कमांडो स्टाइल में घुसे. मैं वहाँ एक-दो घंटे तक था, इसिलए मैने काफ़ी कुछ सुना. माहौल ख़तरनाक था. लेकिन उस समय हमारी ओर गोलीबारी नहीं हो रही थी. अकादमी के बाहर बहुत सारे लोग बेखौफ़ खड़े थे.
इसलिए मुझे भी डर नहीं लग रहा था.

मैने सिर्फ़ वही देखा जो मुख्य गेट से दिखाई दे रहा था. मुझे लगता है कि हमला तीनों तरफ़ से हुआ.

मैं इस इमारत की अच्छी तरह जानता हूँ. पीछे से अंदर आना बहुत आसान है. कुछ ख़ास सुरक्षा इंतज़ाम नहीं है- मुख्य गेट पर चार-पाँच पुलिसकर्मी ही हैं. लेकिन एक तरफ़ कुछ घर हैं और पीछे की ओर गाँव हैं. हमलावर किसी दूसरी तरफ़ से भी आ सकते थे. मैने तो एक ही दिशा से घुसते हुए देखा.

सुरक्षाकर्मी आए तो लेकिन बहुत देर से. पुलिस और भी आधे घंटे बाद आई. पुलिसवाले जब तक आए तो बहुत देर हो चुकी थी. मैं वहाँ सुबह सात बजकर 20 मिनट पर था और तभी गोलीबारी शुरु हो गई थी. सात से आठ बजे के बीच वहाँ परेड होती है.

बहुत ही भयावह दृश्य था. किसी हॉलीवुड फ़िल्म की तरह था- मैने तीन चार धमाके सुने.

गोलीबारी के बाद प्रशिक्षण पा रहे कए कैडेट वहाँ से तुरंत चले गए. मैं वहाँ से चला गया और इलाक़े में कर्फ़्यू लगा दिया गया.

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