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गुरुवार, 05 फ़रवरी, 2009 को 08:07 GMT तक के समाचार
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श्रीलंका का युद्धविराम पर चर्चा से इनकार
सेना
गोथाभाया राजपक्षे ने कहा हथियार डालने के मुद्दे पर बातचीत का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता
श्रीलंका की सरकार ने अमरीका, ब्रिटेन और कनाडा के उस अनुरोध को ख़ारिज कर दिया है जिसके तहत श्रीलंका से तमिल विद्रोहियों के साथ युद्धविराम की शर्तों पर बातचीत करने के लिए कहा गया था.

तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई को देश के उत्तरी भाग से खदेड़ देने के बाद दोनों पक्षों के बीच एक छोटे से इलाक़े में संघर्ष चल रहा है.

श्रीलंका के रक्षा सचिव गोथाभाया राजपक्षे ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया कि 'हथियार डालने के मुद्दे पर बातचीत का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है.'

इस बीच भारत के गृह मंत्री पी चिदंबरम ने श्रीलंका सरकार और एलटीटीई विद्रोहियों से अपील की है कि वो बातचीत का रास्ता अपनाएं.

उन्होंने सरकार से संघर्ष का रास्ता छोड़ने और एलटीटीई से हथियार डालने की अपील करते हुए कहा कि दोनों पक्षों को संघर्ष ख़त्म करना चाहिए.

उनका कहना था, '' दोनों पक्ष एक साथ काम करें. एटीटीई हथियार डाले और सरकार संघर्ष का रास्ता छोड़े. दो हाथों से ही ताली बजती है. ''

'पिछली बार आत्मघाती हमले हुए'

श्रीलंका सरकार से पहले भी कई देश संघर्ष रोकने की अपील कर चुके हैं लेकिन उन्होंने इन मांगों को ख़ारिज़ कर दिय है.

गोथाभाया राजपक्षे का कहना था, "जब सरकार ने पिछले हफ़्ते 48 घंटे के युद्धविराम की घोषणा की थी तब विद्रोहियों ने उस अवधि का इस्तेमाल तीन ट्रकों में विस्फोटक भर कर सेना के निकट आत्मघाती हमले करने के लिए किया था."

 जब सरकार ने पिछले हफ़्ते 48 घंटे के युद्धविराम की घोषणा की थी तब विद्रोहियों ने उस अवधि का इस्तेमाल तीन ट्रकों में विस्फोटक भर कर सेना के निकट आत्मघाती हमले करने के लिए किया था
श्रीलंका के रक्षा सचिव

गोथाभाया राजपक्षे ने स्पष्ट किया, "विद्रोहियों को पहले बिना शर्त आत्मसमर्पण करना चाहिए और हथियार त्याग देने चाहिए."

उन्होंने एलटीटीई के शीर्ष नेतृत्व को किसी तरह की आम माफ़ी दिए जाने की सभी संभावनाओं को ख़ारिज किया.

लेकिन रक्षा सचिव गोथाभाया राजपक्षे कि एलटीटीई के आम लड़ाकों को माफ़ी दी जाएगी, दोबारा प्रशिक्षण दिया जाएगा और उन्हें समाज की मुख्यधारा में शामिल किया जाएगा.

कई विदेशी सरकारों और राहत संस्थाओं ने श्रीलंका में हिंसा को रोकने के लिए बार-बार अपील की है और ये भी कहा है कि अनेक आम नागरिक इस हिंसा का शिकार बन रहे हैं.

उनका कहना है कि युद्धविराम के बाद युद्ध क्षेत्र से घायल लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुँचाने का काम किया जा सकता है जो उस इलाक़े में फँसे हुए हैं.

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