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सोमवार, 02 फ़रवरी, 2009 को 06:54 GMT तक के समाचार
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'राजनीतिक आका न बनें गोपालस्वामी'
हंसराज भारद्वाज
क़ानून मंत्री के रवैए से साफ है कि गोपालस्वामी की सिफ़ारिश पर कार्रवाई नहीं होगी
केंद्रीय क़ानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश की आलोचना की है और कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को 'राजनीतिक आकाओं' की तरह काम नहीं करना चाहिए.

भारद्वाज ने सोमवार को दिल्ली में संवाददाताओं से कहा, ''मुख्य चुनाव आयुक्त के इस रवैये पर हमें खेद है. उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था. चुनाव आयोग अच्छा काम कर रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसका आदर किया जाता है. यह विवाद दुर्भाग्यपूर्ण है.''

भारद्वाज इस मामले से काफ़ी नाराज़ दिख रहे थे. उन्होंने कहा,'' गोपालस्वामी को चुनाव आयुक्त की तरह अपना काम करना चाहिए. राजनीतिक आकाओं की तरह नहीं.''

उन्होंने कहा कि इस संबंध में उन्हें एक फ़ाइल मिली है और वो इसे देख रहे है.

 गोपालस्वामी को चुनाव आयुक्त की तरह अपना काम करना चाहिए. राजनीतिक आकाओं की तरह नहीं
हंसराज भारद्वाज

यह पूछे जाने पर कि क्या वो गोपालस्वामी की सिफ़ारिश पर कार्रवाई करेंगे तो उनका कहना था, ''हम जब कभी इस संबंध में कोई फ़ैसला करेंगे आपको सूचित किया जाएगा.''

भारद्वाज का कहना था कि चुनाव आयुक्तों की भूमिका चुनाव करवाने की है न कि हिसाब बराबर करने की.

उल्लेखनीय है कि मुख्य चुनाव आयुक्त गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को पत्र लिख कर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश की थी.

मतभेद

गोपालस्वामी ने इसके बाद विभिन्न अख़बारों को दिए साक्षात्कार में साफ़ किया कि नवीन चावला के साथ चुनाव तारीखों पर उनके मतभेद रहे हैं और ये मतभेद कर्नाटक चुनावों और सोनिया गांधी को चुनाव आयोग की नोटिस जैसे मामलों पर काफ़ी गहरे रहे हैं.

इतना ही नहीं कुछ महीनों पहले भारतीय जनता पार्टी ने नवीन चावला पर कांग्रेस पार्टी का साथ देने का आरोप लगाया था और कहा था कि उन्हें बर्ख़ास्त किया जाए.

गोपालस्वामी के हाल में लिखे गए पत्र पर राजनीतिक हलकों में कड़ी प्रतिक्रिया हो रही है.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा है कि गोपालस्वामी की ऐसी सिफ़ारिश चुनाव आयोग जैसे संस्थान को नुकसान ही पहुंचा सकती है. उधर भारतीय जनता पार्टी नेता लालकृष्ण आडवाणी का कहना था कि राष्ट्रपति को यह सिफ़ारिश स्वीकार करनी चाहिए.

हालांकि अब क़ानून मंत्री के बयान से साफ़ हो गया है कि कैबिनेट इस सिफ़ारिश को मंज़ूर नहीं करने वाली है.

संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को ऐसी सिफ़ारिश करने का अधिकार है और राष्ट्रपति चाहें तो इसे मान सकते हैं लेकिन परंपरा के तहत राष्ट्रपति किसी भी ऐसी सिफ़ारिश को मानने से पहले उसे कैबिनेट को भेजते हैं.

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