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शनिवार, 31 जनवरी, 2009 को 06:49 GMT तक के समाचार
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नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश
नवीन चावला
नवीन चावला की नियुक्ति के बाद से ही भाजपा इस पर आपत्ति करती रही है
चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद एक अभूतपूर्व मोड़ पर पहुँच गया है और मुख्यचुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने सरकार से चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश की है.

मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह सिफ़ारिश भारतीय जनता पार्टी की शिकायत पर कार्रवाई करते हुए की है जिसमें आरोप लगाए गए थे कि नवीन चावला 'पक्षपाती' हैं क्योंकि वे कांग्रेस के क़रीबी हैं.

एन गोपालस्वामी ने यह सिफ़ारिश ऐसे समय पर की है जब उनका कार्यकाल ख़त्म होने वाला है और वे 20 अप्रैल को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं.

दूसरी ओर आम चुनाव सिर पर हैं और एक चुनाव आयुक्त संकेत दे चुके हैं कि अप्रैल-मई में लोकसभा के चुनाव होंगे.

एक अहम तथ्य यह भी है कि गोपालस्वामी की सेवानिवृत्ति के बाद वरिष्ठता के आधार पर नवीन चावला के ही मुख्य चुनाव आयुक्त बनने की संभावना है.

भाजपा महासचिव अरुण जेटली ने कहा है कि चुनाव आयोग को निष्पक्ष होना चाहिए और नवीन चावला का पिछला रिकॉर्ड बताता है कि वे राजनीतिक रुप से निष्पक्ष नहीं हैं, इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफ़ारिश के बाद उन्हें हटाया जाना चाहिए.

लेकिन कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने नवीन चावला का बचाव करते हुए कहा है कि भाजपा इस मामले का राजनीतिकरण कर रही है और किसी भी राजनीतिक दल को चुनाव आयोग के मामले में दखल नहीं देना चाहिए.

मतभेद

मुख्य चुनाव आयुक्त ने कहा, "मैंने अपना काम किया. रिपोर्ट दे दी गई है."

उन्होंने राष्ट्रपति को भेजी गई इस रिपोर्ट के विवरण देने से इनकार किया है और कहा है कि यह गोपनीय दस्तावेज है.

चुनाव आयुक्त
वरिष्ठता के अनुसार गोपालस्वामी के बाद नवीन चावला ही मुख्य चुनाव आयुक्त हो सकते हैं

उन्होंने कहा कि उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि राष्ट्रपति ने यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री को भेजी है या नहीं.

लेकिन यह साफ़ है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने यह कार्रवाई भाजपा की शिकायत की जाँच करने के बाद की है जिसमें आरोप लगाया गया था नवीन चावला कांग्रेस के क़रीबी हैं और वे अपने निर्णयों में 'पक्षपाती' होते हैं.

चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की बात अक्सर आती रही है.

पिछले साल कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तारीख़ों को लेकर और फिर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मामले को लेकर नवीन चावला और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच मतभेद की ख़बरें आई थीं.

हालांकि इस सिफ़ारिश की ख़बरें आने के बाद चुनाव आयुक्त नवीन चावला ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है.

लेकिन उन्होंने कहा है कि आम चुनाव नज़दीक हैं और हमें संयुक्त रुप से उसकी तैयारी करनी चाहिए.

इस टिप्पणी का अर्थ लगाया जा रहा है कि वे स्वयं अपना पद नहीं छोड़ने जा रहे हैं.

शिकायत

वर्ष 2006 में भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दलों के दो सौ से अधिक सांसदों ने नवीन चावला के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति के पास एक लिखित शिकायत की थी.

भाजपा ने कहा था कि नवीन चावला अपने परिवार के नाम से स्वयंसेवी संगठन चलाते हैं और इस संगठन के लिए कई कांग्रेस सांसदों ने सांसद निधि से पैसे दिए हैं.

भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस सांसदों की निधि से पैसा लेने के बाद नवीन चावला निष्पक्ष नहीं हो सकते, इसलिए उन्हें चुनाव आयुक्त के पद से हटाया जाना चाहिए.

सांसदों की लिखित शिकायत के बाद राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने इस मामले में सरकार की राय माँगी थी और सरकार ने इस मामले को एटॉर्नी जनरल मिलन बैनर्जी को भेज दिया था.

राजीव प्रताप रूडी
भाजपा ने गोपालस्वामी की रिपोर्ट पर कड़े क़दम उठाने की मांग की है

लेकिन एटॉर्नी जनरल ने अपनी रिपोर्ट में नवीन चावला को क्लीन चिट दे दी थी. जिसे भाजपा ने असंवैधानिक बताया था.

उसके बाद भाजपा की ओर से राज्यसभा में पार्टी के नेता जसवंत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी.

इस याचिका पर अदालत ने सिंह को सलाह दी थी की वह सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त को एक ज्ञापन सौंपे.

अदालत की इस सलाह के बाद पिछले साल यानी वर्ष 2008 में भाजपा नेता अरुण जेटली के नेतृत्व में विपक्ष के 180 सांसदों के हस्ताक्षर से एक ज्ञापन मुख्य चुनाव आयुक्त को सौंपा गया था.

ज्ञापन सौंपने के बाद जेटली ने कहा था, "नवीन चावला का आचरण, चुनाव आयुक्त बनने के पहले और बनने के बाद राजनीतिक रूप से निष्पक्ष नहीं है."

अब जब मुख्य चुनाव आयुक्त की रिपोर्ट की बात सार्वजनिक हो गई है, भाजपा ने कहा है कि 'चुनाव आयोग की विश्वसनीयता दाँव पर है' और सरकार को इस पर 'कड़ा क़दम' उठाना चाहिए.

भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी ने कहा है, "चुनाव आयोग में एक विवाद खड़ा हो गया है. यदि कोई कड़ा क़दम नहीं उठाया गया तो आयोग की निष्पक्षता पर शक पैदा हो जाएगा जो लोकतंत्र और संविधान दोनों के लिए ख़तरनाक है."

जबकि भाजपा महासचिव अरुण जेटली ने कहा है कि संविधान में प्रावधान है कि मुख्य चुनाव आयुक्त किसी भी चुनाव आयुक्त को हटाने की सिफ़ारिश कर सकता है.

उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संविधान के इस प्रावधान की व्याख्या करते हुए भी यही कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त को ऐसा अधिकार होगा.

विश्वसनीयता का सवाल

सुपरिचित क़ानूनविद फ़ाली एस नरिमन भी मानते हैं कि इस विवाद से चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं.

 जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद ही हटा सकती है उसी तरह दो और चुनाव आयुक्तों को भी हटाने की सिफ़ारिश करने का अधिकार मुख्य चुनाव आयोग को नहीं संसद को होना चाहिए
फ़ाली एस नरिमन

टेलीविज़न चैनल एनडीटीवी से बात करते हुए नरिमन ने कहा कि यह विवाद ऐसे समय में खड़ा हुआ है जब भारत के चुनाव आयोग की विश्वसनीयता और निष्पक्षता की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है.

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त की सेनानिवृत्ति और आगामी लोकसभा चुनाव का ज़िक्र करते हुए इस विवाद के समय को लेकर भी सवाल खड़े किए.

उनका कहना था कि सरकार को गोपालस्वामी की इस सिफ़ारिश पर कोई न कोई कार्रवाई तो करनी होगी लेकिन इस प्रक्रिया ने चुनाव आयोग के ढाँचे में सुधार की ज़रुरत को रेखांकित किया है.

नरिमन ने कहा, "जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त को संसद ही हटा सकती है उसी तरह दो और चुनाव आयुक्तों को भी हटाने की सिफ़ारिश करने का अधिकार मुख्य चुनाव आयोग को नहीं संसद को होना चाहिए."

हालांकि उन्होंने माना कि नवीन चावला की भूमिका आपातकाल और उसके बाद विवादास्पद रही है लेकिन उनका कहना था कि उस बात को काफ़ी समय बीत चुका है.

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