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अपने काम का लोहा मनवाया लिंगदोह ने | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के चर्चित मुख्य चुनाव आयुक्तों में से एक जेम्स माइकल लिंगदोह रिटायर हो गए. राजनेताओं के ख़िलाफ़ कमर कस कर निष्पक्ष और बेदाग़ चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग में जिस कड़े तेवर की शुरुआत टीएन शेषन ने की, उसे लिंगदोह ने और मज़बूत किया. लेकिन अपनी एक ख़ास शैली में. शायद ही कभी किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के ख़िलाफ़ राजनीतिक मोर्चे से इतनी आग उगली गई होगी. इतनी कि उसके धर्म तक को निशाना बनाया गया लेकिन लिंगदोह ने बिना कुछ ख़ास प्रतिकार किए अपने काम में कोई कोताही नहीं बरती. गुजरात में दंगों की त्रासदी के बाद जिस तरह चुनावी रोटियाँ सेंकने का खेल शुरू हुआ उसके ख़िलाफ़ लिंगदोह का खुला प्रतिरोध राजनेताओं की हाय-हाय के बावजूद उन्हें डिगा नहीं पाया. गुजरात में वही हुआ जो लिंगदोह चाहते थे. चुनाव का नतीजा जो भी हो लिंगदोह ने यह दिखा दिया कि चुनावी प्रक्रिया में सत्ता का खेल आड़े नहीं आ सकता. जम्मू-कश्मीर में सफल चुनाव कराना भी लिंगदोह की एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी. अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने जम्मू-कश्मीर में सफल चुनाव करा कर लिंगदोह ने भारतीय लोकतंत्र का लोहा मनवा लिया. लिंगदोह के कार्यकाल में जितने भी चुनाव हुए, उनमें हिंसा तो कम हुई ही निष्पक्ष चुनाव के भी मानदंड स्थापित हुए. चुनाव पूर्व हर इलाक़ों का ख़ुद दौरा कर और वहाँ की नौकरशाही से लेकर राजनेताओं को सबक सिखाने की उनकी शांत मगर दृढ़ कोशिश ने भारतीय लोकतंत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित किया. गुजरात लेकिन दुर्भाग्य यह कि लिंगदोह अपने अच्छे कार्यों की बजाय विवादों के कारण ज़्यादा चर्चित रहे. जून 2001 में मुख्य चुनाव आयुक्त का पद भार संभालने वाले लिंगदोह राजनेताओं के ख़िलाफ़ अपने अभियान के कारण आलोचनाओं का शिकार बने.
लेकिन गुजरात में दंगों के बाद राज्य सरकार की चुनाव कराने की घोषणा और चुनाव आयोग से हुए टकराव के कारण लिंगदोह ज़्यादा चर्चित हुए. गुजरात में दंगों के बाद चुनाव के लायक स्थितियों का जायजा लेने के लिए वहाँ गए लिंगदोह ने जिस तरह सार्वजनिक रूप से नौकरशाहों को डाँट पिलाई वह चर्चा का विषय बन गया. इसके बाद तो नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता तो उन पर पिल ही पड़े. गुजरात में चुनाव देर से कराने के फ़ैसले को मोदी ने लिंगदोह के धर्म से जोड़ कर विवाद को एक नया मोड़ दे दिया. मोदी का कहना था कि लिंगदोह ने यह फ़ैसला ईसाई होने के कारण किया. मोदी ने कई सार्वजनिक सभाओं में लिंगदोह और सोनिया गाँधी के ईसाई होने को भी ज़ोर-शोर से उछाला. लेकिन लिंगदोह ने इसका प्रतिकार किए बिना चुनाव आयोग के कामकाज में जुटे रहे. राज्य और केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के तमाम विरोध के बावजूद दिसंबर 2002 में ही गुजरात में चुनाव हो पाए. भले ही भारतीय जनता पार्टी ने चुनावों में जीत हासिल की, लेकिन लिंगदोह ने स्वस्थ परंपरा का निर्वाह कर लोकतंत्र के प्रति ज़िम्मेदारी का निर्वाह कर अपनी ईमानदार भूमिका निभाई. कश्मीर चुनाव इसके अलावा 2002 में ही जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव भारत सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपना पक्ष रखने का एक बड़ा अवसर था. सरकार के इस काम को बखूबी अंज़ाम दिया मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और उनकी टीम ने.
लिंगदोह ने एक के बाद एक कई दौरे किए और ज़बरदस्त चुनाव व्यवस्था कराई. चुनाव की पूर्व संध्या पर जम्मू-कश्मीर के लोगों को संबोधित करते हुए लिंगदोह ने कहा था, "मैं आप लोगों से बिना डरे मतदान करने का आह्वान करता हूँ. लेकिन अगर आप वोट देना नहीं चाहते तो आप पर ऐसा करने के लिए दबाव नहीं डाला जाएगा." और जम्मू-कश्मीर में न सिर्फ़ अपेक्षाकृत शांत चुनाव हुए बल्कि लोगों की हिस्सेदारी भी बढ़ी. साथ ही कई अलगाववादी तबकों ने भी चुनाव में हिस्सा लिया.लिंगदोह की खूब प्रशंसा हुई. गुजरात और कश्मीर चुनाव में उनके काम को मान्यता देते हुए उन्हें रैमसे मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया. पिछले साल नवंबर दिसंबर में हुए चुनाव में भी लिंगदोह ने राजनेताओं और नौकरशाहों पर लगाम लगाई. काँग्रेस शासित दो राज्यों छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश पर उनकी ख़ास नज़र रही क्योंकि वहाँ सरकारी तंत्र के दुरुपयोग की कई शिकायतें मिली. लिंगदोह ने दोनों राज्यों का दौरा किया और छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री अजित जोगी को तो चेतावनी भी दे डाली. काँग्रेस के कई शीर्ष नेताओं सहित अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भी सरकारी तंत्र के दुरुपयोग के लिए नोटिस जारी किया गया. और इन चुनावों की निष्पक्षता किसी से छिपी भी नहीं. लेकिन बीबीसी के कार्यक्रम हार्डटॉक में राजनेताओं के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करके लिंगदोह ने एक बार फिर राजनेताओं की आलोचना झेली. लिंगदोह ने राजनेताओं को ऐसा कैंसर बताया जिनका इलाज संभव नहीं. इसके बाद संवैधानिक पद पर रहते हुए उनकी टिप्पणी को ग़लत बताया गया. लेकिन जैसा कि इस पर टिप्पणी करते हुए लिंगदोह ने कहा, "आप किसी सरकार के लिए काम नहीं करते. दरअसल आप नियम और क़ानून के दायरे में रहते हुए अपनी भूमिका निभाते हैं." करियर खासी जनजाति से संबंध रखने वाले भारत के पूर्वोत्तर राज्य मेघालय के जेएम लिंगदोह की शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में ही हुई. लिंगदोह सिर्फ़ 22 वर्ष की उम्र में ही भारतीय प्रशासनिक सेवा में आ गए थे. 1997 में एचडी देवेगौड़ा की सरकार ने लिंगदोह को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया और 2001 में उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त का पदभार सौंपा गया. लिंगदोह को क़रीब से जानने वाले लोग मानते हैं कि वे अपने करियर में कई बार सत्ता से टक्कर ले चुके हैं और यही उनके काम करने की शैली है. रैमसे मैग्सेसे सम्मान समिति ने उन्हें पुरस्कार के लिए चुनते वक़्त कहा था, "लिंगदोह ने लोकतंत्र की जड़े मज़बूत की. साथ ही वे भारत में धर्मनिरपेक्षता बचाए रखने की दिशा में बड़ी उम्मीद हैं." गुजरात दौरे पर गए लिंगदोह से मिलने आए लोगों का अपने दुखड़े के साथ उनसे मिलना यही साबित करता है कि लोगों को एक सच्चे प्रतिनिधि की ज़रूरत है चाहे वो राजनेता हो या फिर नौकरशाह. इससे शायद ही किसी को इनकार होगा कि लिंगदोह के रूप में लोगों को एक सच्चा प्रतिनिधि मिला. |
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