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शेख हसीना: संघर्ष भरा राजनीतिक सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इसमें कोई शक नहीं कि राजनीति शेख हसीना के ख़ून में है. उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान को बांग्लादेश का राष्ट्रपिता कहा जाता है लेकिन ये उपाधि उनके परिवार के ख़ून से सनी है. शेख हसीना के पिता, उनकी मां और तीन भाई 1975 के तख्तापलट में मारे गए थे. उस हादसे के बाद खुद शेख हसीना भी राजनीति के भँवर में फंस गईं. 80 के दशक में बांग्लादेश में जनरल इरशाद के सैनिक शासन के ख़िलाफ़ जो मुहिम छिड़ी, उसके दौरान वे कई बार जेल गईं. जनरल इरशाद के जाने के बाद आवामी लीग की इस नेता को एक और प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ कड़वी और लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी और वो थीं बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की ख़ालिदा ज़िया. उतार चढ़ाव 1996 में शेख हसीना ने चुनाव जीता और कई वर्षो तक देश का शासन चलाया. उसके बाद उन्हें विपक्ष में भी बैठना पड़ा.
उन पर एक बार जान लेवा हमला भी हुआ जिसमें वे बाल बाल बच गईं लेकिन उस हमले में 20 से भी ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी. एक बार फिर बांग्लादेश राजनीति के गहरे भँवर में फंस गया और देश की बागडोर सेना-समर्थित सरकार ने संभाल ली. इस सरकार ने शेख हसीना पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और उनका ज्यादातर वक्त हिरासत में ही गुज़रा. इस बीच वे अपने इलाज के लिए अमरीका भी गईं और ये अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि वे जेल से बचने के लिए शायद वापस लौट कर ही ना आएं. दो साल के सैनिक शासन समेत अब सात साल बाद हुए इन संसदीय चुनावों में भारी संख्या में मतदान हुआ. अवामी लीग की ये जीत देश की दोनों पार्टियों के बीच ज़ोर आजमाइश का नतीजा है. इससे पहले 2001 में हुए चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने बड़ी जीत हासिल की थी. इस उथल पुथल के बावजूद शेख हसीना ने चुनावों में शानदार जीत हासिल की है. और अब बांग्लादेश की बागडोर राजनीति की इस मंजी हुई योद्धा के हाथ में एक बार फिर आ गई है. |
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