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बारूदी सुरंगों से आज़ादी का सपना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के तेरवा डेगेर में बारूदी सुरंगों ने वहाँ आबाद लोगों के जीवन को इस क़दर मुश्किल में डाल किया कि लोग हर वक़्त यही दुआ मांगते हैं कि उनके पैर सलामत रहें. ईद के त्योहार से पहले तीन बच्चों की माँ राशिदा बी की ये ही दुआ थी कि उनका पैर किसी बारुदी सुरंग धमाको की नज़र न हो जाए. तेरवा डेगेर एक पहाड़ी गाँव है और नियंत्रण रेखा के पास स्थित है. यहाँ एक पैर होना भी बहुमूल्य संपत्ति माना जाता है. क्योंकि इस गाँव में आबाद 50 परिवारों में से लगभग सभी परिवारों के किसी न किसी सदस्य ने अपना पैर ज़रूर खोया दिया है. घर के पास सुरंग राशिदा बी एक अल्युमिनियम के तार को दिखाती हैं जो एक बारूदी सुरंग को जाता है. ये बारूदी सुरंग उनके के घर के सामने तीन फ़ीट नीचे बिछाई गई है. लेकिन इसके साथ दुख की बात ये भी है कि राशिदा बी का घर पाकिस्तान आउट पोस्ट से भी क़रीब है. जो उनके घर से दिखता है. वो कहती हैं, "हम उस आउट पोस्ट को चूहा-1 कहते हैं, हमें भारतीय सेना ने कह रखा है कि हमारा घर फ़ायरिगं की रेंज में आता है. " राशिदा अपने को किस्मत वाली समझती हैं क्योंकि उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने अपना पैर नहीं खोया है, लेकिन वो अपने बच्चों को लेकर फ़िक्रमंद हैं. वो कहती हैं, "मुझे बुरे सपने आते है कि कहीं मेरे बच्चों के साथ कुछ हो न जाए." लेकिन 21 वर्षीय मोहम्मद शब्बीर, राशिदा बी की तरह ख़ुशक़िस्मत नहीं हैं. उन्होंने मई महीने में अपना बायां पैर उस वक़्त खो दिया थी जब वो हल जोत रहे थे. इसी तरह क़रीब के गाँव के 76 वर्षीय मोहम्मद बेन जब अपने गाय को पकड़ की कोशिश कर रहे थे तो उनका पैर बारूदी सुरंग पर पड़ गया और इस तरह उन्होंने अपना पैर खो दिया. बाप-बेटे ने पैर खोया एक साल बाद उनका पैर बदला गया लेकिन उनके 27 वर्षीय बेटे मोहम्मद हनीफ़ का पैर भी बारूदी सुरंगों की नज़र हो गया.
भारत प्रशासित कश्मीर में सेना के प्रवक्ता कर्नल एके माथूर इस बात से सहमत हैं कि कुछ बारूदी सुरंगो की वजह से आम लोगों के रहने की जगह पर जोखिम है. एक स्थानीय कवि मोहम्मद फ़रीद बारूदी सुरंगों के स्थान बदलते रहने की वजह से 'बर्फ़ बम' कहते हैं. क्योंकि बर्फबारी के बाद बर्फ़ की प्रवृत्ति जगह बदलने की होती है. उनका एक शेर है, कम पैर अधिक मुआवज़ा, और उतनी ही जवान पत्नी मिलेगी. लेकिन ज़रीना बी का मामला भिन्न है. उनके पास इतना पैसा नहीं है कि वो अपने टूटे लकड़ी के पैर को बदल सकें. विशेषज्ञों की राय है कि कश्मीर में और ख़ासकर दूर दराज़ के गाँव में कितनी बारूदी सुरंगें होंगी इसके बारे में कम ही जानकारी है. जम्मू-कश्मीर मानवाधिकार आयोग के कार्यवाहक प्रमुख हबीबुल्लाब भट्ट कहते हैं, " पूरी तरह से ये नहीं मालूम है कि ये समस्या कितनी बड़ी है लेकिन बहुत जल्द इस पर कार्रवाई होगी." राज्य के सामाजिक कल्याण मंत्री अब्दुल ग़नी वकील का कहना है कि पीड़ितों को मुनासिब मुआवज़ा दिया गया है. |
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