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विकास और भ्रष्टाचार है मुख्य मुद्दा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विकास को मुख्य मुद्दा बना रही है, वहीं विपक्षी कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुद्दे को उछाल रही है. हालाँकि राज्य के अलग-अलग इलाक़ों में स्थानीय मुद्दे भी हावी हैं और जिन इलाक़ों में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का थोड़ा बहुत असर है वहाँ जातीय समीकरण चुनावी मुद्दों पर हावी हो सकते हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने कार्यकाल में विकास के लिए उठाए गए क़दमों को प्रमुखता से प्रचारित कर रहे हैं. उनका दावा है कि उनकी सरकार में बिजली उत्पादन छह हज़ार मेगावाट से ज़्यादा हो गया और 40 हज़ार किलोमीटर नई सड़कें बनाई गईं. लेकिन उनकी सरकार में भ्रष्टाचार के जो मामले आए उसे कांग्रेस हवा दे रही है और स्वच्छ प्रशासन देने का दावा कर मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है. भ्रष्टाचार बनाम विकास भ्रष्टाचार के आरोपों में शिवराज सिंह चौहान को कुछ मंत्रियों को पद से हटाना तक पड़ गया और विपक्ष ने डंपर घोटाले में ख़ुद मुख्यमंत्री की संलिप्तता का आरोप लगाया.
भोपाल स्थित बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली का कहना है कि भाजपा शायद इसीलिए चुनाव प्रचार में सिर्फ़ विकास को तवज्ज़ो दे रही है. वहीं कांग्रेस ने भ्रष्टाचार को मुद्दा तो बनाया है लेकिन मतदाताओं को इससे प्रभावित करने में विफल साबित होती दिखाई दे रही है. मतदाताओं को रिझाने के लिए दोनों मुख्य दलों ने लोकलुभावन वादे किए हैं. भाजपा ने ग़रीबों को जहाँ दो रूपए किलो गेहूं देने की घोषणा की है, तो कांग्रेस ने एक क़दम आगे बढ़ाते हुए एक रूपए प्रति किलो चावल देने की घोषणा की है. मतदाताओं का कहना है कि शिवराज सरकार में सड़कें तो बनी हैं और बिजली उत्पादन भी बढ़ा है लेकिन सैंकड़ों गाँवों तक बिजली अभी भी नहीं पहुँच पाई है. इस बीच कांग्रेस पार्टी ने किसानों के पुराने बिजली बिल माफ़ करने की घोषणा की है. इन सबके बावजूद ये स्पष्ट है कि इस चुनाव में सत्ता विरोधी लहर जैसी कोई चीज दिखाई नहीं दे रही है और शिवराज सिंह की व्यक्तिगत छवि भी कमोबेश अच्छी है. हालाँकि मौजूदा विधायकों के बारे में ये राय कतई नहीं है. इस स्थिति में वैसे मतदाताओं की संख्या बड़ी है जो अनिर्णय की स्थिति में हैं. ये अंतिम दो दिनों में किसी भी ओर झुक सकते हैं. मालवा की स्थिति मालवा क्षेत्र में 65 विधानसभा सीटें हैं. यहाँ पिछली बार की तरह इस बार भी पानी, बिजली, सड़क और महाँगाई के मुद्दा को उठाने की कोशिश हो रही है.
लेकिन भाजपा बढ़ती महँगाई के लिए सीधे तौर पर केंद्र की यूपीए सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रही है और इस पर कांग्रेस बचाव की मुद्रा में है. लेकिन मालवा में बाग़ी और निर्दलीय उम्मीदवारों ने पेंच फँसा दी है. स्थानीय पत्रकार अवनीश जैन कहते हैं, "65 में से लगभग बीस सीटों पर बाग़ियों के कारण भाजपा और कांग्रेस दोनों साँसत में हैं. इसी के कारण उज्जैन संभाग के छह ज़िलों के 29 विधानसभा क्षेत्रों में से 13 पर त्रिकोणीय मुक़ाबला है." बसपा और उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी के असर के बारे में वो कहते हैं, "बसपा को जो भी वोट मिलेंगे उससे ज़्यादा नुकसान कांग्रेस को ही होगा. उसी तरह उमा भारती भाजपा मतदाताओं में सेंध लगा सकती हैं." कई सीटों पर बसपा और भारतीय जनशक्ति पार्टी ने कांग्रेस और भाजपा के बाग़ियों को उम्मीदवार बनाया है. ऐसी ही एक दिलचस्प सीट खंडवा ज़िले में मंधाता की है जहाँ पिता-पुत्र आमने-सामने हैं. यहाँ भाजपा ने लोकेंद्र सिंह तोमर को उम्मीदवार बनाया है तो बसपा ने उन्हीं के पिता राणा रघुराज सिंह तोमर को टिकट थमाई है. बसपा की आज़माइश ग्वालियर-चंबल संभाग की 34 सीटों में से कई पर बसपा के उम्मीदवार कांग्रेस-भाजपा को टक्कर देने की स्थिति में हैं.
पिछले चुनाव में भाजपा ने 34 में से 21 सीटों पर सफलता पाई थी लेकिन इस बार इसे दोहराना आसान नहीं होगा. यहाँ के पिछड़े इलाक़ों में महँगाई की मार को भाजपा मुख्य मुद्दा बना रही है और इसके लिए सीधे-सीधे कांग्रेस को ज़िम्मेदार ठहरा रही है. सिंधिया राजपरिवार का कोई सदस्य इस बार चुनाव मैदान में नहीं है. स्थानीय पत्रकार अजय मिश्रा कहते हैं, "राजपरिवार से जुड़े सदस्य जब प्रचार के लिए निकलते हैं तो भीड़ ज़रूरत जुटती है लेकिन मतदान पर इसका असर नहीं पड़ता." पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे और राज्य के जल संसाधन मंत्री अनूप मिश्रा भाजपा के टिकट पर ग्वालियर पूर्व से चुनाव मैदान में उतरे हैं. अजय मिश्रा का कहना है कि इस इलाक़े में जातीय समीकरणों की भी अहम भूमिका हो सकती है. ग्वालियर दक्षिण सीट से बसपा ने माधवराव सिंधिया के दोस्त रहे बालेंदु शुक्ल को टिकट दी है और भाजपा ने नारायण कुशवाहा को. यहाँ कांग्रेस ने युवा नेता रश्मि पवार को उतारा है जो एनएसयूआई से जुड़ी रही हैं. इस सीट पर बसपा दलित और ब्राह्मण वोटरों को रिझा सकती है. इसी तरह ग्वालियर ग्रामीण सीट पर बसपा के मदन कुशवाहा की स्थिति अच्छी मानी जा रही है. विधायकों के ख़िलाफ़ रोष शाहडोल, मंडला, बालाघाट और शिवनी जैसे आदिवासी जनसंख्या वाले ज़िलों में गोंडवाना गणतंत्र पार्टी इस बार भी चुनावी मैदान में ज़ोर शोर से उतरी है. शाहडोल अब अलग संभाग बन गया है. पिछले चुनाव के समय जबलपुर संभाग की 45 सीटों में से 36 भाजापा ने जीती थीं और पाँच कांग्रेस के खाते में गई थी. तीन सीटों पर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी ने परचम लहराया था. इस इलाक़े में इस चुनाव में मतदाताओं की चुप्पी से सभी दल परेशान हैं. स्थानीय राजू घोलप कहते हैं, "किसी पार्टी के पक्ष में कोई लहर नहीं है. मतदाता चुप हैं. यहाँ तक कि राहुल गांधी और हेमा मालिनी की सभाओं में भी उतने लोग नहीं जुटे जितनी की उम्मीद की जा रही थी." उनका कहना है कि इस इलाक़े में मौजूदा विधायकों को अपनी सीटें बचाने के लिए कड़ी मेहतन करनी होगी क्योंकि जनता उनसे खुश नहीं है. |
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