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बर्मा में लोकतंत्र समर्थकों को कड़ी सज़ा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्मा की एक अदालत ने पिछले वर्ष सैन्य सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने के मामले में लोकतंत्र समर्थक 14 लोगों को 65 वर्ष तक की जेल की सज़ा सुनाई है. ये लोग '88 जेनरेशन' के नाम से बने एक छात्र संघ के सदस्य हैं. इन्हें ग़ैरक़ानूनी ढंग से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का इस्तेमाल करने और ग़ैर क़ानूनी संगठन बनाने का दोषी क़रार दिया गया है. इस संघ के अन्य 20 लोगों के ख़िलाफ़ विभिन्न आरोपों के तहत अभी भी मुक़दमे चल रहे हैं जिनमें इन्हें 150 वर्षों तक की सज़ा हो सकती है. इस वर्ष सैन्य अधिकारियों ने सैकड़ों विरोधियों को गिरफ़्तार किया था. रंगून की एक जेल में बंद कमरे में हुई एक सुनवाई के दौरान यह सज़ा सुनाई गई है. कम से कम ऐसे 30 लोकतंत्र समर्थक ऐसे हैं जिन्हें मंगलवार को सजा़ सुनाई गई. इनमें बौद्ध भिक्षु और श्रम अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता भी शामिल हैं. ज़्यादातर लोगों की सज़ा की अवधि छह महीने से लेकर 24 वर्षो तक है. पिछले वर्ष सैन्य शासन के खिलाफ़ हज़ारों लोग सड़को पर उतर आए थे, बाद में जिसका सरकार ने बलप्रयोग कर दमन कर दिया था. |
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