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राजमहल आम लोगों के लिए खोला गया... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में रियासतों के विलय के बाद उपेक्षित हुए किलों-महलों की पूछ बढ़ गई है और पूर्व राजाओं-महाराजों के रुतबे में भी वृद्धि हुई है. महलों में उत्सवों की धूम है और वहाँ लोगों की आमद में इज़ाफ़ा हुआ है हालाँकि समाजशास्त्री इसे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं मानते. जयपुर के पूर्व राज परिवार ने 12 अक्तूबर को अपने पुरखों के दरबार हॉल को पूर्व राजा भवानी सिंह के 77वें जन्मदिन पर लोगों के लिए खोल दिया. यहाँ आख़िरी दरबार तीस मार्च, 1949 को लगा था. शाही वाद्यों की स्वागत धुन के बीच भवानी सिंह ने दरबार हॉल में कदम रखा था तो पुराने सामंत, श्रीमंत और जागीरदार वहाँ मौजूद थे. सदियों पुराने चंद्र महल में दरबार को ऐसे सजाया गया था जैसे पुराने राजसी दिन लौट आए हों. इतिहास की झलक पूर्व महारानी पद्मिनी कहती हैं, "लोग इतिहास को जानना चाहते हैं, हमने इसे फिर से संजोने की कोशिश की है. हालाँकि मैंने ख़ुद भी वो दौर इस तरह नहीं देखा क्योंकि मैं शादी के बाद 1966 में यहाँ आई थी. हम यहाँ उस गुज़रे दौर की झलक देखने की चेष्टा कर रहे हैं."
राजस्थान की पुरानी रियासतों में शस्त्र पूजा और राजकुमारों के जन्मदिन के उत्सवों के आयोजन अब और भी धूम धाम से होने लगे हैं. इन्हे देखने यहाँ सैलानी तो आते हैं तो आम-ओ-ख़ास भी आने लगे हैं. राजगुरु सुबोध चंद्र इन पूर्व शाही परिवारों के निकट रहे हैं. वे कहते हैं, "शस्त्र पूजा के अलावा राजकुमारों के जन्मदिन, होली दीवाली और सभी पारम्परिक उत्सव रीति रिवाज़ों के साथ मनाए जाते हैं." हाल के वर्षों में लोगों का ऐसे आयोजनों में आना जाना बढ़ा है. माहौल में आए इस बदलाव पर किशनगढ़ के पूर्व महाराजा ब्रिजराज सिंह कहते हैं, "ये अच्छी बात है कि विरासत को महत्व मिलने लगा है. किले और महल फिर से गुलज़ार हो रहे हैं. इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है?" दुर्गादास बोरास ख़ुद जागीरदार रहे हैं. वे कहते हैं, "विलय के बाद कठिन समय था, जब पूर्व रियासतों को मुकदमों से जूझना पड़ा था. फिर बीच में एक दौर वामपंथ के उभार का भी आया. इसी दौरान पर्यटन व्यवसाय के विस्तार ने बड़ी मदद की, अब लगभग सभी पूर्व राजपरिवार और जागीरदार अपने दम पर खड़े हैं." इमारतों का संरक्षण जयपुर की राजकुमारी दिया कहती हैं, "इन प्रयासों से पुरातत्व महत्व की इमारतों का संरक्षण हो सकेगा. पुराने दौर की झलक मैंने नहीं देखी. कुछ किस्से ज़रूर सुने हैं." दिया नहीं मानतीं कि सामंतवाद फिर से उभर रहा है. वो कहती हैं कि अब सामंतवाद का रूप बदल गया है. अब वो कई रूपों में मौजूद है.
राजस्थान विश्वविद्यालय के डॉक्टर राजीव गुप्ता इस परिदृश्य को चिंता के साथ देखते हैं. वो कहते हैं, "पहले राजाओं के प्रतीक टीवी सीरियलों में प्रचलित हुए, उनके परिधान, पगडियां और हथियार महिमामंडित हुए. ये लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. इसे धर्म और जाति के प्रमुखों का समर्थन भी हासिल है और आम आदमी बेबस है." आज़ादी के 60 साल बाद इन महलों का वैभव लौटा है लेकिन आम आदमी से ये रंग और महफ़िल अब भी कुछ दूर है. |
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