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जयपुर में तवायफ़ों का ताज़िया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन की याद में मोहर्रम के मौक़े पर जयपुर में निकाले गए ताज़ियों में तवायफ़ों का ताज़िया ख़ास आकर्षण का केंद्र बना. परंपरा के मुताबिक इन तवायफ़ों ने दस दिन तक नाच गानों की महफ़िलें नहीं सजाईं और इमाम हुसैन की याद में आंसू बहाती रहीं. तपते रेगिस्तान में सत्य और सिद्धांतों के लिए शहीद हुए हुसैन की याद में तवायफ़ें जयपुर में ताज़िए के साथ नंगे पैर चलती हैं और शहादत को श्रद्धासुमन अर्पित करती हैं. मोहर्रम महीने की दस तारीख़ को यौम ए आशूरा होता है जिस दिन ताज़िये निकाले जाते हैं और उससे पहले दस दिन तक तवायफ़ें कोई शृंगार नहीं करतीं और पूरा वक़्त मातम में गुज़ारती हैं. पुराने जयपुर का चांदपुल बाज़ार इन तवायफ़ों का पारंपरिक और पुश्तैनी ठिकाना है जहां शाम ढलते ही नाच गानों की महफ़िलें सजने लगती हैं लेकिन मोहर्रम महीने में मातम की इस घड़ी में वहां हर कोई ग़म में डूबा नज़र आता है. संगीत के सुर और संगीत की आवाज़ ख़ामोश रहती है और तवायफ़ें अपनी महफ़िल में मर्सिया (दुखभरे गीत) पढ़कर शहीदों की याद में आंसू बहाने लगती हैं. एक तवायफ़ निगार इमाम हुसैन को याद कर भावुक हो उठती है. निगार कहती है, "हम उनकी याद में अपना काम बंद कर देते हैं न कोई नाच गाना, शृंगार और काजल टीके भी नहीं करते हैं."
यह कहते हुए उमरदराज़ निगार का गला भर जाता है. वो कहती है, "हुसैन ने हमारे लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी थी. वे ज़िंदा होते तो हम उनके साथ होते." इस दौरान तवायफ़ें रेडियो टीवी से भी पूरी तरह परहेज़ करती हैं. चाँद पुल की रेशमा कहती हैं, "हम इस दौरान हम अपना धंधा छोड़ देते हैं और पूरा वक़्त इबादत में गुज़ारते हैं. हमें कोई लाखों रुपए नज़र करे तो भी हम इस दौरान अपना काम धंधा नहीं करते." रेशमा बताती हैं कि तवायफ़ों के ताज़िए को अक़ीदतमंद भी इज्ज़त से देखते हैं. वो कहती हैं, "लोग इस ताज़िए के नीचे से गुज़र कर मन्नत माँगते हैं. श्रद्धालु वहां सेहरे चढ़ाकर दुआ मांगते हैं." बांस, अभ्रक और क़ीमती सामान से बने इस ताज़िए के बारे में चाँद पुल के अब्दुल सईद कहते हैं, "शहर में तीन सौ से अधिक ताज़िए निकले हैं लेकिन तवायफ़ों के ताज़िए की अपनी अहमियत है." उनके मुताबिक ये परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है. कलात्मक और सजे-धजे ताज़िए सड़कों पर निकले तो मातमी धुनों ने ग़मग़ीन कर दिया. हर साँस इमाम हुसैन के नाम थी. आँखें नम और आवाज़ ग़म में डूबी थी. अक़ीदतमंदों की इस भीड़ में तवायफ़ें नंगे पैर चल रही थीं. उन्हें यक़ीन था कि ख़ुदा उनकी दुआ ज़रुर क़बूल करेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें आशूरा का महत्व और इतिहास18 फ़रवरी, 2005 | पहला पन्ना गोरखपुर में दंगा, एक की मौत27 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस आशूरा जुलूस पर हमला, 30 की मौत09 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस पाकिस्तान में शियाओं के जुलूस पर हमला02 मार्च, 2004 | भारत और पड़ोस इराक़ में 'यौमे आशूरा' पर धमाके, 182 की मौत 02 मार्च, 2004 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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