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इराक़ में 'यौमे आशूरा' पर धमाके, 182 की मौत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
इराक़ में शियाओं के पावन महीने मोहर्रम के दसवें दिन यानी 'यौमे आशूरा' पर करबला और बग़दाद में कई विस्फोट हुए हैं जिनमें 182 लोग मारे गए हैं. करबला में 112 और बग़दाद में 70 लोगों के मारे जाने की ख़बर है. बग़दाद में अमरीकी सैनिक सेना का कहना है कि इन घटनाओं में 430 लोग घायल भी हुए हैं. अमरीकी सैनिक प्रवक्ता ने कहा है कि बग़दाद में विस्फोट तीन आत्मघाती हमलावरों ने किए जबकि एक अन्य हमलावर गिरफ़्तार कर लिया गया. करबला में विस्फोट एक आत्मघाती हमलावर और रिमोट से चलने वाले विस्फोटकों से किए गए. करबला में छह लोगों को गिरफ़्तार किया गया है. इस बीच इराक़ी नेताओं ने देश में एकता बनाए रखने की अपील की है. शियाओं के एक बड़े नेता आयतुल्ला अली अल सिस्तानी ने अमरीका पर आरोप लगाया है कि वह ऐसे हमले रोकने में नाकाम रहा है जिससे असुरक्षा बढ़ती जा रही है. दूसरी तरफ़ अमरीका ने कहा है कि ऐसे हमलों के बावजूद इराक़ में जून तक सत्ता इराक़ी लोगों को ही सौंप दी जाएगी. राष्ट्रपति कार्यालय व्हाइट हाउस के एक प्रवक्ता ने कहा कि अमरीका तब तक इराक़ में रहेगा जब तक कि वहाँ हालात सामान्य नहीं हो जाते. एक के बाद एक करबला में एक के बाद एक छह विस्फोट तब हुए जब हज़ारों की संख्या में शिया अनुयायी इमाम हुसैन के मज़ार पर जाने के लिए यहाँ आए थे. उधर बग़दाद में शिया समुदाय के शहर के सबसे प्रमुख स्थल, कज़िमिया मस्जिद पर रॉकेटों से हमला हुआ.
हमले के वक़्त मस्जिद में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जमा थे. इराक़ में अंतरिम सरकार के सदस्यों ने तमाम मतभेदों को एक तरफ़ रखकर इन हमलों की निंदा की है. उन्होंने इराक़ में तीन दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की है. अशूरा करबला में शिया समुदाय के हज़ारों लोग अशूरा मनाने के लिए इकट्ठा हुए. इस दिन पैंगंबर मोहम्मद के नाती इमाम हुसैन की शहादत हुई थी और इसे यौमे आशूरा के नाम से मनाया जाता है. इमाम हुसैन सन् 680 में करबला में ही शहीद हुए थे. पिछले 30 साल में पहली बार शिया आबादी यहाँ बिना किसी भय के इस तरह खुलकर अशूरा मनाने के लिए आए. पाबंदी इराक़ के पूर्व शासक सद्दाम हुसैन के शासन के दौरान अशूरा मनाने पर कड़ी पाबंदियाँ लगी हुई थीं.
सद्दाम हुसैन के राज में शियाओं पर स्वयं को पीटने और शरीर को काटने जैसी प्रथाओं पर रोक थी. बीबीसी संवाददाता हेबा सालेह का कहना है कि सद्दाम हुसैन को इस बात का डर था कि कहीं शियाओं के इस तरह एकत्र होने से विद्रोह की चिंगारी न भड़क उठे. सद्दाम हुसैन के समय यहाँ शिया बहुल देश ईरान से शिया अनुयायी भी नहीं आ सकते थे. ऐसी भी ख़बरें थीं कि इस वर्ष करबला में इराक़ के पड़ोसी ईरान से शिया समुदाय के बहुत सारे लोग ग़ैर क़ानूनी तौर पर आए. |
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