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करबला का इतिहास | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
करबला इराक़ के मध्य में स्थित एक ऐतिहासिक और पवित्र शहर है. ये शहर बग़दाद से 55 मील या 88 किलोमीटर दक्षिण पश्चिम में स्थित है. बेबीलोनियाई सभ्यता के अनुसार करबला का शाब्दिक अर्थ होता है - ईश्वर का पवित्र स्थान. करबला का इस्लाम धर्म में एक अलग महत्व है और इस्लाम में शिया और सुन्नी संप्रदाय के बीच विवाद में भी करबला का एक अलग स्थान है. करबला की लड़ाई करबला में 680 ईस्वी में शिया और सुन्नी संप्रदायों के बीच एक लड़ाई हुई थी जिसे 'करबला की लड़ाई' कहा जाता है. ये लड़ाई पैगंबर मोहम्मद के नवासे (नाती) हुसैन और तब मुसलमानों के प्रमुख खलीफ़ा उम्मय्या वंश के यज़ीद के समर्थकों के बीच हुई थी. उम्मय्या वंश के लोगों ने पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद राजनीतिक सत्ता हासिल करने की कोशिश की. इसी वंश के मुवैय्या ने ख़लीफ़ा अली को धोखे से मारकर राजनीतिक सत्ता हासिल कर ली और फिर अपने बेटे यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी बना दिया. यज़ीद ने अपने पिता मुवैय्या की मौत के बाद ख़ुद को ख़लीफ़ा घोषित कर दिया और वे चाहते थे कि हुसैन उनकी ख़िलाफ़त को स्वीकार करें. मगर हुसैन ने इसे इस्लाम के सिद्धांत के विपरीत बताते हुए यज़ीद का नेतृत्व स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके बाद करबला की लड़ाई हुई. इस लड़ाई में हुसैन और उनके भाई अब्बास को मार डाला गया था. इमाम हुसैन अली के बेटे थे और अली की शादी पैग़ंबर मोहम्मद की बेटी फ़ातिमा से हुई थी. पवित्र स्थल करबला में इमाम हुसैन का मज़ार है जो शियाओं का एक पवित्र धर्मस्थल है. लड़ाई में दोनों भाइयों के अलावा उनके 72 अनुयायियों को भी मार डाला गया. शिया मुसलमानों के लिए मक्का के बाद करबला सबसे पवित्र स्थल है. इमाम हुसैन की शहादत को याद करने के लिए दुनिया भर के शिया अनुयायी हर साल मुहर्रम के महीने में करबला जाते हैं. करबला में इमाम हुसैन के मज़ार के अलावा हज़रत अब्बास का भी मज़ार है. |
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