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नैनो का सपना नयनों में ही रह गया | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पश्चिम बंगाल में हुगली जिले के सिंगुर से टाटा मोटर्स की औपचारिक विदाई के बाद 'नैनो' का सपना अब इलाके के लोगों में नयनों में ही रह गया है. इस संयंत्र से नैनो तो नहीं निकली, बल्कि यह पूरी परियोजना ही बंगाल से निकल गई है. टाटा के बंगाल को टा-टा करने से बेशुमार सपने टूट गए हैं. इनमें मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्ट्चार्य का औद्योगिकीकरण का सपना है तो इस संयंत्र में रोजगार पाने और इससे इलाके का कायाकल्प होने का स्थानीय लोगों का सपना भी टूटा है. दुर्गापूजा के ठीक पहले सिंगुर परियोजना समेटने के टाटा के एलान से लोगों को सदमा लगा है. नैनो परियोजना के लिए जमीन देने वाले निताई मंडल कहते हैं, "इस परियोजना ने इलाके के लोगों में रोज़गार और समृद्धि की उम्मीदें जगाई थी. इलाके के कई युवक इसमें काम कर रहे थे. अब तो हम न तो घऱ के रहे और न ही घाट के". एक अन्य किसान निर्मल दास कहते हैं, "टाटा समूह को और कुछ दिनों तक इंतजार करना चाहिए था". दास बताते हैं, "परियोजना शुरू होने के पहले जो जमीन दस हजार रुपए कठ्ठे बिक रही थी, उसकी कीमत अब दो लाख रुपए तक पहुंच गई है".
वे कहते हैं, "टाटा के जाने के बाद अब सिंगुर त्रिशंकु की हालत में पहुंच जाएगा. दूसरा कोई औद्योगिक समूह निकट भविष्य में इधर का रुख नहीं करेगा". इस परियोजना के शुरू होने से पहले सुब्रत राय इलाके में खेत मजदूर के तौर पर काम करते थे. लेकिन परियोजना का काम शुरू होने के बाद उसमें मोटरचालित वैन चला कर वे रोजाना 120 रुपए तक कमा रहे थे. दरअसल, सिंगुर में नैनो की सड़क फिलहाल बंद हो जाने की वजह से इलाके के लोग त्रिशंकु की हालत में पहुंच गए हैं. बदला था जीवनस्तर टाटा मोटर्स की इस परियोजना में सैकड़ों स्थानीय लोगों को रोजगार तो मिला ही था, इसके लिए अपनी ज़मीन के बदले किसानों को जितने पैसे मिले, उसने उनका जीवनस्तर बदल दिया था. टाटा के इलाके में आने के बाद यहां बैंकों की कई नई शाखाएँ और मोटरसाइकिलों और कारों के शो रूम खुल गए थे. लोगों की आंखों में समृद्धि और बेहतर भविष्य के सपने जगे थे. लेकिन अब यह सपने असमय ही टूट गए हैं. परियोजना स्थल पर चाय और खाने-पीने के सामानों की कई दुकानें खुल गई थी. इनमें से एक दीपाली दास समेत कई महिलाओं ने इलाके में छोटे-मोटे होटल खोल लिए थे. मज़दूर वहीं खाना खाते थे. इससे उनलोगों को अच्छी-खासी कमाई हो जाती थी. दीपाली कहती हैं, "इस परियोजना ने जिंदगी में एक नई ललक पैदा कर दी थी. लेकिन अब सपनों पर पानी फिर गया है. आगे क्या होगा, पता नहीं". इन लोगों का कहना है कि परियोजना पूरी होने के बाद इलाके में विकास की प्रक्रिया और तेज़ हो जाती. लेकिन टाटा की ओर से सिंगुर को टा-टा कहने के बाद इलाके के हजारों लोगों के सामने एक अनिश्चचित भविष्य मुंह बाए खड़ा हो गया है. टाटा ने इलाक़े के जिन युवकों को नौकरी पर रखा था, उनकी नौकरी बहाल रखने का भरोसा तो दिया है. लेकिन इस संयंत्र के सहारे रोजी-रोटी कमा रहे बाकी लोगों को इस सदमे से उबरने में लंबा अरसा लगेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें सिंगुर में अब 'नैनो' के समर्थन में धरना13 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस सिंगुर मुद्दा: पुनर्वास पैकेज सार्वजनिक14 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस अधूरी रही सिंगुर मुद्दे पर बातचीत06 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस सिगुंर में टाटा प्लांट के गार्डों पर हमला23 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस सिंगुर पर सोनिया से मिलेंगी ममता29 सितंबर, 2008 | भारत और पड़ोस टाटा ने संयंत्र हटाने का फ़ैसला किया03 अक्तूबर, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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