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'लगा मानों दुनिया ख़त्म हो गई' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अचानक दहला देने वाली आवाज़ सुनाई दी और ज़लज़ला महसूस हुआ. मैं नीचे गिरा और मुझे चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा दिखाई दे रहा था. ऐसा लगा मानों दुनिया ख़त्म होने वाली है. ये कहना है कि मोहम्मद सुल्तान का जो मैरिएट होटल के कर्मचारी हैं और विस्फोट के समय होटल की लॉबी में मौजूद थे. वो कहते हैं, "होटल के तालाब का पानी दूर-दूर तक फैला था और मरी हुई मछलियाँ दूर-दूर तक देखी जा सकती है. पेड़ की टहनियाँ टूट-टूट कर सैंकड़ों मीटर दूर जा गिरीं." सुल्तान जैसे कई और प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि विस्फोट से तीस फुट गहरा गड्ढा बन गया. होटल के पास स्थित भवन में नौकरी करने वाले हसन खालिद ने बताया कि वो धमाके के समय ऑफिस में ही थे. उनका कहना है, "धमाका इतना ज़ोरदार था कि मैं अपनी सीट से उछल गया. मेरी बिल्डिंग की सारी खिड़कियाँ टूट गईं और कुछ सेकेंडों के लिए लगा कि हवाई हमला हुआ है. मैं बाहर भागा तो देखा कि मैरिएट होटल आग के गोले में तब्दील हो चुका है." वो कहते हैं, "मैं अचेत हो रहा था. मुझे सिर्फ़ इतना याद है कि मेरे सुरक्षा गार्ड ने मुझे उठा कर कार में बिठाया और गाड़ी आगे बढ़ गई. किस्मत से मेरे ऑफिस के सारे स्टाफ सुरक्षित हैं." ज़लज़ला होटल के पास रहने वाली महरीन ख़ान बताती हैं कि धमाके के समय आस-पास के लोग रोज़ा खोलने वाले थे. इसके बाद जीवन का सबसे भयानक मंज़र सामने था. वो बताती हैं, "कमरे, दीवारें, फर्श बुरी तरह हिलने लगीं. मुझे अक्तूबर 2005 का भूकंप याद आया. लेकिन तभी तेज़ आवाज़ ने दहला कर रख दिया." डाइरम एंथनी रात के खाने के लिए मैरिएट होटल ही जा रहे थे. वो कहते हैं, "होटल के गेट पर पहुँचने में दो सेकेंड बचे होंगे कि भीषण विस्फोट हुआ और रात के अंधेरे में दिन का उजाला दिखाई देने लगा." वो कहते हैं, "मैंने हवा में गोता लगाते हुए बड़ा पेड़ अपनी गाड़ी के ऊपर आते हुए देखा. जब मैंने गाड़ी का दरवाज़ा खोला तो सामने खून में सना हाथ पड़ा था." |
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