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शुक्रवार, 19 सितंबर, 2008 को 08:54 GMT तक के समाचार
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उड़ीसा-कर्नाटक पर सख़्त निर्देश जारी
उड़ीसा में हिंसा और आगज़नी
उड़ीसा में हिंसा के पीछे धर्मातंरण के विवाद को मुख्य वजह माना जा रहा है
भारत में केंद्र सरकार ने उड़ीसा और कर्नाटक की राज्य सरकारों को सख़्त निर्देश भेजे हैं कि वहाँ ईसाइयों के ख़िलाफ़ हो रहे हमलों पर तत्काल रोका जाए.

केंद्र सरकार ने कहा है कि ईसाइयों के ख़िलाफ़ हो रहे हमलों से सरकार चिंतित है और वह इन राज्यों में स्थिति पर नज़र रखे हुए है.

केंद्रीय गृह सचिव मधुकर गुप्ता ने कहा है कि सरकार कर्नाटक और उड़ीसा सरकार को चेतावनी भेजी जा रही है और वहाँ से क़ानून व्यवस्था पर रिपार्ट मंगवाई गई है.

इस मामले के राजनीतिक तूल पकड़ने के आसार हैं क्योंकि इन दोनों राज्यों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार है जबकि केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार है.

उड़ीसा में 23 अगस्त के बाद से लगातार ईसाइयों और गिरजाघरों पर हमले हो रहे हैं और वहाँ इस दौरान कम से कम 18 लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों लोग बेघर हुए हैं.

इसी तरह कर्नाटक में पिछले एक हफ़्ते से गिरजाघरों पर हमलों का सिलसिला शुरु हुआ है.

वैसे तो क़ानून-व्यवस्था राज्य सरकार का मसला होता है लेकिन संविधान की अनुच्छेद 355 के तहत केंद्र सरकार को यह अधिकार मिलता है कि "केंद्र आपातस्थिति में राज्य में किसी भी बाहरी हमले या किसी भी तरह की अंदरूनी बाधा को दूर करने के लिए कार्रवाई करे".

चेतावनी

गृह सचिव मधुकर गुप्ता का कहना है कि इन राज्यों को चेतावनी भेजी जा रही है कि वे क़ानून व्यवस्था की स्थिति में सुधार करें.

 कंधमाल में शुरू से ही मेरी सरकार ने क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए हरसंभव कोशिश की है. लेकिन हमें केंद्र से प्रत्यर्पित सहयोग नहीं मिल रहा. आवश्यक सुरक्षा बल मुहैया करने में केंद्र सरकार काफ़ी आनाकानी कर रही है. आज भी स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए राज्य सरकार के पास पर्याप्त सुरक्षा बल नहीं हैं
नवीन पटनायक, मुख्यमंत्री, उड़ीसा

इस बीच केंद्र सरकार ने वहाँ की स्थिति पर रिपोर्ट मंगवाई है.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने पत्रकारों से बातचीत में संकेत दिया है कि सरकार अनुच्छेद 355 के तहत कार्रवाई करने का मन बना रही है.

केंद्र सरकार की इस कार्रवाई को भी अनुच्छेद 355 लागू करने की तैयारी के रुप में देखा जा रहा है लेकिन जब गृह सचिव से पूछा गया कि क्या केंद्र सरकार अनुच्छेद 355 का सहारा लेने की तरफ़ बढ़ रही है तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

उड़ीसा में अनुच्छेद 355 लागू करने की कोशिश की ख़बरों पर मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.

भुवनेश्वर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान नवीन पटनायक ने कहा, "ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और राजनीति से प्रेरित है. देश के कई राज्यों में गड़बड़ी है लेकिन केंद्र ने ऐसे दो राज्यों को ही क्यों निशाना बनाया है जहाँ कांग्रेस सत्ता में नहीं है."

मुख्यमंत्री ने कहा- कंधमाल में शुरू से ही मेरी सरकार ने क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए हरसंभव कोशिश की है. लेकिन हमें केंद्र से प्रत्यर्पित सहयोग नहीं मिल रहा. आवश्यक सुरक्षा बल मुहैया करने में केंद्र सरकार काफ़ी आनाकानी कर रही है. आज भी स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए राज्य सरकार के पास पर्याप्त सुरक्षा बल नहीं हैं.

राज्य में सत्ताधारी गठबंधन में शामिल भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मुद्दे पर केंद्र सरकार औऱ कांग्रेस पार्टी की आलोचना की है.

प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सुरेश पुजारी ने कहा है कि कांग्रेस ने हमेशा ग़ैर कांग्रेसी सरकारों को गिराने की कोशिश की है.

दूसरी ओर राज्य कांग्रेस ने केंद्र की कोशिश का स्वागत किया है. राज्य कांग्रेस अध्यक्ष जयदेव जेना ने कहा है कि राज्य सरकार स्थिति संभालने में पूरी तरह नाकाम रही है और इसलिए यहाँ केंद्र का हस्तक्षेप ज़रूरी हो गया है.

वहीं कर्नाटक में पिछले मई में ही एनडीए के मुख्य घटक दल भाजपा की सरकार बनी है. यह दक्षिण भारत में भाजपा की पहली सरकार है.

विवाद

संविधान के तीन अनुच्छेदों को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विवाद रहा है.

इनमें से एक अनुच्छेद 352 है. यह अनुच्छेद केंद्र सरकार को अधिकार देती है कि वह अगर उचित माने तो किसी भी राज्य में आपातकाल की घोषणा कर दे.

उड़ीसा में तैनात सुरक्षाकर्मी
उड़ीसा सरकार के आश्वासनों के बावजूद वहाँ हिंसा रुक नहीं रही है

अनुच्छेद 355 केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह राज्य में क़ानून व्यवस्था की स्थिति संभालने के लिए हस्तक्षेप करे.

और अनुच्छेद 356 कहता है कि यदि किसी राज्य की सरकार स्थिति को संभालने में अक्षम दिखती है तो उस राज्य सरकार को केंद्र सरकार बर्खास्त कर दे और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू कर दे.

इन तीनों अनुच्छेदों को लागू करने के लिए ज़रूरी है कि केंद्र सरकार के पास इनमें से किसी को भी लागू करने का पर्याप्त आधार हो.

सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 में केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर चले 'एसआर बोम्मई विरुद्ध केंद्र सरकार' मामले में फ़ैसला दिया था कि जब तक केंद्र सरकार धारा 355 के सभी प्रावधानों का पूरी तरह से उपयोग न कर ले, उसे धारा 356 लागू करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए.

केंद्र-राज्य संबंधों की समीक्षा को लेकर गठिन सरकारिया आयोग ने भी इसी तरह के सुझाव दिए थे.

कई राजनीतिक दल, ख़ासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) इन दोनों धाराओं, 355 और 356 के उपयोग के ख़िलाफ़ रही हैं.

ये दोनों पार्टियाँ चाहती हैं कि इन धाराओं को ख़त्म कर दिया जाए.

जबकि सबसे अधिक बार धारा 356 की मार झेलने वाली भारतीय जनता पार्टी ने पिछले साल ही माँग की थी कि नंदीग्राम में हुई हिंसा के बाद पश्चिम बंगाल में अनुच्छेद 355 लागू कर दिया जाए.

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