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सोमवार, 25 अगस्त, 2008 को 14:29 GMT तक के समाचार
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गठबंधन ही नहीं भरोसा भी टूटा

नवाज़ शरीफ़
नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पहले गठबंधन सरकार में शामिल थी
पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पार्टी ने सत्ताधारी गठबंधन से अपने को अलग करने की घोषणा कर दी है.

इस फ़ैसले का पाकिस्तान पर कई मायनों में असर पड़ेगा. पीपीपी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के बीच जो कुछ हुआ है उससे लोगों का विश्वास टूटा है.

पाकिस्तान के अंदर 18 फ़रवरी के चुनाव के बाद ऐसा माहौल बना था कि सब मिलजुल कर काम करें. पाकिस्तान के लोगों ने भी इस बात का समर्थन किया था.

चुनाव के समय दोनों राजनीतिक दल –पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) उस समय विरोधी दल थे. लोगों ने इन पार्टियों को वोट इसलिए डाला था क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि वो साथ मिलकर चलेंगी और देश को संभालें.

लेकिन अब लोग ये समझने लगेंगे कि देश के हालात कितने भी ख़राब हों लेकिन राजनीतिक पार्टियों को सिर्फ़ अपनी राजनीति में दिलचस्पी है और उन्हें देश की परवाह नहीं.

ज़रदारी के सामने चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम का एक पहलू ये भी है एक दल बार-बार समझौते करके, लिखित भी और मौखिक भी, पीछे हट जाता है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि आने वाले दिनों में देश की कौन सी ऐसी पार्टी होगी जो पीपीपी पर भरोसा करेगी.

जहाँ तक बात पीपीपी नेता आसिफ़ अली ज़रदारी के राष्ट्रपति बनने की है तो इसमें कोई ख़ास रुकावट नज़र नहीं आती.

अगर मुस्लिम लीग (नवाज़) और मुस्लिम लीग (क्यू) आसिफ़ अली ज़रदारी का समर्थन न भी करें तो भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए उनके पास ज़रूरी वोट हैं.

राष्ट्रपति चुनाव के लिए इलेक्टोरल कॉलेज में नेशनल एसेंबली, सीनेट और चारो प्रांतों की एसेंबलियाँ शामिल हैं और ज़रदारी को समर्थन मिल जाएगा.

ज़रदारी को 352 वोट चाहिए जबकि उनके पास 400 से ज़्यादा वोट हैं. इसलिए राष्ट्रपति बनने में तो आसिफ़ अली ज़रदारी को मुश्किल नहीं होगी.

अब तक तो वे पीछे रहकर राजनीति कर रहे थे लेकिन एक बार ज़रदारी ने राष्ट्रपति का ताकतवर पद संभाल लिया तो सारी की सारी ज़िम्मेदारी उन पर आ जाएगी.

अगर वो मामलों के सही तरीके से न संभाल पाए तो लोगों के अंदर जो ग़ुस्सा पैदा होगा उसका निशाना भी आसिफ़ अली ज़रदारी ही बनेंगे.

इस घटनाक्रम का भारत-पाकिस्तान मामलों पर भी असर पड़ेगा. पाकिस्तान में सत्तारूढ़ गठबंधन टूटने के बाद अगर भारत और पाकिस्तान के बीच कोई मामले तय होने हैं तो शायद ये काम थोड़ा आसान रहेगा.

वो इसलिए क्योंकि अब पाकिस्तान में सारे राजनीतिक फ़ैसले करने का हक़ किसी गठबंधन के पास नहीं है बल्कि सिर्फ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के पास होगा.

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