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मंगलवार, 12 अगस्त, 2008 को 15:34 GMT तक के समाचार
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जेल में बंद भारतीयों की रिहाई की अपील

पाकिस्तान की जेल में कैद भारतीयों के परिजन
परिजनों का कहना है कि लोग ग़लती से सरहद पार चल गए थे
राजस्थान के दो सीमावर्ती ज़िलों बाड़मेर और जैसलमेर के नौ लोग वर्षों से पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं.

भारत जैसे अपने ही नागरिकों को भूल गया है लेकिन इन गिरफ़्तार लोगों के परिजनों ने जयपुर आकर दोनों देशों से इनकी रिहाई की गुहार की है.

हाथों में तख़्तियाँ उठाए इन लोगों का कहना था कि ये लोग मवेशी चराते समय ग़लती से सरहद पार चले गए थे.

पाकिस्तान की जेलों में बंद इन लोगों की रिहाई के लिए अभियान चला रहे बाड़मेर के 'थार जागरूक नागरिक मंच' के अनुसार इनमें से चार की सज़ा पूरी हो चुकी है. लेकिन रिहाई इसलिए अटक गई क्योंकि भारत ने इन लोगों की शिनाख़्त नहीं की.

बाड़मेर की राजिबाई ने जब अपना दर्द बयां किया तो उनका दामन आँसुओं से भीग गया. उनका गाँव भारत पाक सरहद से महज़ एक किलोमीटर दूर है.

 उन्हें आठ वर्ष हो गए. जेल में सज़ा पूरी हो गई है. मेरे घर मे मदद करने वाला कोई नहीं है. अब मैं अट्ठारह वर्ष की हुई हूँ."
सफ़ियन, एक परिजन

उनके पति बिंजाराम वर्ष 1999 में मवेशी चराते समय ग़लती से सरहद लाँघ गए थे. तब से वहाँ जेल में हैं. पाकिस्तान की जेलों बंद इन लोगों में दलित, भील, आदिवासी या फिर सिंधी मुसलमान हैं.

कोई दो दशक से बंद है तो कोई 10 वर्षों से पाकिस्तान की जेलों में वक़्त काट रहा है. इन वर्षों में ख़त आया, ख़बर आई लेकिन वो न आए जिनके लिए आँखें तरस गई.

इन परिजनों ने उन ख़तों की भी नुमाइश की जो हाल के वर्षों में इन भारतीयों ने जेल से भेजे है.

नम आँखें

परिजनों ने जेल से भारतीयों के लिखे पत्र भी दिखाए

सरहद के एक गाँव की सफ़ियन महज़ उस वक्त दस साल की थी जब उसका कोजाख़ान से निकाह हुआ. वर्ष 2000 में कोजाख़ान मवेशी चराते ग़लती से सीमा लाँघ गया.

सफ़ियन कहती है, "उन्हें आठ वर्ष हो गए. जेल में सज़ा पूरी हो गई है. मेरे घर मे मदद करने वाला कोई नहीं है. अब मैं अट्ठारह वर्ष की हुई हूँ."

ये कहते हुए सफ़ियन की आँखें नम हो गई.

सायला की उम्र 80 वर्ष की है. उसका बेटा मेरु इसी तरह वर्ष 1999 में सरहद लाँघ गया, फिर उसके जेल में होने की ख़बर आई. वह कहती हैं, "मेरी आख़िरी साँस बेटे को देखने के लिए ही अटकी है. रात दिन उसकी ही बाट जोह रही है."

ये परिजन गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया से भी मिले. कटारिया ने कहा कि ये केंद्र से जुड़ा मुद्दा है और वे केंद्र को चिट्ठी लिखेंगे क्योंकि इस पर उनका अधिकार नहीं है.

 यह बहुत ही गंभीर मामला है. हम दोनों ही देशों में आवाज़ उठाएँगे. दरअसल भारत को अपने नागरिकों की शिनाख़्त करनी चाहिए. वरना ये निर्दोष लोग यूँ ही पिसते रहेंगे
कविता श्रीवास्तव, मानवाधिकार कार्यकर्ता

मानवाधिकार कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं, "यह बहुत ही गंभीर मामला है. हम दोनों ही देशों में आवाज़ उठाएँगे. दरअसल भारत को अपने नागरिकों की शिनाख़्त करनी चाहिए. वरना ये निर्दोष लोग यूँ ही पिसते रहेंगे."

बाड़मेर के सामाजिक कार्यकर्ता भुवनेश जैन कहते हैं, "ये तमाम लोग बहुत ग़रीब हैं. जयपुर पहुँचे इन परिजनों में किसी को अपने पति की तलाश है तो कोई अपने पिता की रिहाई के लिए गुहार कर रहा था."

दोनों देशों के रिश्तों में तल्ख़ी टूटी, दोस्ती का हाथ बढ़ा और रेल के लिए रास्ता खुला. लेकिन इसमें कोई रास्ता ऐसा नहीं था जो सरहद का सितम उठा रहे इन लोगों की रिहाई करा सके.

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