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सीपीएम का गणित गड़बड़ा गया? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत की लोकसभा में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के विश्वासमत के दौरान विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने वामदलों के सामने एक सवाल बार-बार रखा - क्या भारत अमरिका असैन्य परमाणु समझौता इतना बड़ा मुद्दा था कि उस पर वामदल सरकार गिराने को तैयार हो गए? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने भाषण में, जिसे उन्हें लोकसभा में पढ़ने नहीं दिया गया, वामपंथी दलों पर चुटकी लेते हुए कहा है कि सीपीएम के वर्तमान नेता (यानि प्रकाश कारत) का गणित गड़बड़ा गया है. ये दो सवाल हैं जिनका जवाब सीपीएम को देश को नहीं तो अपने ज़मीनी कार्यकर्ता को तो देना होगा. ये मानना बिल्कुल ग़लत होगा कि इन दोनों सवालों पर सीपीएम ने पार्टी के भीतर चर्चा किए बिना, सरकार से समर्थन वापसी और फिर उसे गिराने का प्रयास करने का फ़ैसला लिया. सीपीएम की केंद्रीय समिति ने महासचिव को ये क़दम उठाने का पूरा अधिकार दिया था और तकनीकी रुप से देखें तो प्रकाश कारत को इन सवालों के जवाब देने की कोई आवश्यकता नही है. क्या ये सरकार गिराने वाला मुद्दा था? पर ये सवाल उनसे पूछे ज़रुर जाएंगे ये वो जानते हैं. तो क्या भारत-अमरिका परमाणु समझौता इतना बड़ा मुद्दा था कि इस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेकर सरकार को गिराने की कोशिश की जाए? वामदलों ने यूपीए सरकार को साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत समर्थन दिया था और चार साल तक ये दल सरकार को साझा न्यूनतम कार्यक्रम से ना भटकने की नसीहत देते रहे. सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद वामदलों ने सरकार को उसकी कई आर्थिक नीतियों को ठंडे बस्ते मे रखने के लिए मजबूर किया. पेंशन बिल, बैंकिग क्षेत्र मे सुधार, सार्वजनिक क्षेत्र की नवरत्न कंपनियों मे विनिवेश, हवाई अड्डों का निजीकरण जैसे मुद्दों पर पूरे समय इन दलों ने सरकार पर लगाम लगा कर रखी. और यहीं ये सवाल प्रासंगिक हो जाता है, कि क्या परमाणु क़रार इतना बड़ा मुद्दा था कि इस मुद्दे पर वामदल सरकार गिराने की कोशीश करें. दबाव हटा विश्वासमत हासिल करने से पहले सरकार की तरफ़ से अख़बारों में जो ख़बरें आईं, उनमें संदेश साफ़ था कि वामदलों का दबाव हटते ही सरकार आर्थिक सुधारों को पूरे ज़ोर शोर से लागू करेगी. और अब वो दबाव हट गया है - हालत ये है कि वामदल ना एटमी क़रार रोक पाए और ना सरकार ही गिरा पाए. पिछले चार साल अपने वर्ग हितों की रक्षा के लिए जिन मुद्दों पर वो सरकार को रोके हुए थे, उन मुद्दों पर अब वो संसद मार्ग पर प्रदर्शन मात्र से ज़्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं.
लेकिन क्या परमाणु क़रार को रोकने की कोशिश करना वामदलों की ग़लती थी – वामदलों के सैद्धांतिक नज़रिए से बिल्कुल नहीं – और इस मुद्दे पर सरकार को वामदलों ने कभी अंधेरे मे भी नही रखा. इसलिए सरकार की तरफ़ से उन पर धोखे का आरोप भी सही नही होगा. किसका गणित सही था? लेकिन यहीं पर दूसरा सवाल उठता है, जो बात प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने कही – क्या सीपीएम के महासचिव प्रकाश कारत का गणित गड़बड़ा गया? जब सरकार ने अचानक वामदलों की चेतावनी को नज़रअंदाज़ कर परमाणु क़रार पर आगे बढने की मंशा साफ़ कर दी, क्या उस समय वामदलों ने ये आकलन किया कि सरकार को रोकने के लिए वो कितना आगे जा सकते हैं. निश्चित ही किया होगा. पर अगर इस आकलन के बाद वो इस फ़ैसले पर पहुँचे कि वो सरकार को गिरा सकते हैं, तो ये निश्चित तौर पर उनकी भूल थी. तीसरा ध्रुव खड़ा करने के प्रयास
समाजवादी पार्टी हो या फिर यूपीए के घटक राष्ट्रवादी कांग्रेस और डीमके जैसी पार्टियाँ - सभी ने वामदलों को पर्याप्त संकेत दिए कि वे वामदलों को मित्र मानते हैं, पर सरकार गिराने मे उनके साथ नहीं हैं. और उसके बाद वामदल भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़े हुए नज़र आए. संसद में बहस के दौरान सत्ताधारी पक्ष की तरफ़ से वामदलों पर इस मुद्दे पर ख़ूब हमला भी हुआ. उधर सरकार ने समर्थन खोने की परिस्थिति का जोखिम उठाया लेकिन पूरा गणित बैठा कर. तो क्या वामदल राष्ट्रीय राजनीति के हाशिए पर आ गए हैं? राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी मानती हैं,"इन दोनों ही सवालों पर सीपीएम के अंदर बहस होगी, पर ये कहना ग़लत होगा कि वामदल अलग- थलग पड़ गए हैं. वामदलों ने बसपा की मायावती, यूएनपीए और कुछ क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर एक मंच बनाया है जिसमें ज़बरदस्त संभावनाएं हैं." हालाँकि वो ये मानती हैं कि अभी ये कहना मुश्किल है कि ये मोर्चा कितनी दूर तक साथ जा सकता है क्योंकि इस मोर्चे मे बड़े अंतरविरोध भी हैं. कुल मिलाकर वामदलों ने भारतीय राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए और आगे की राजनीति में तीसरा ध्रुव खड़ा करने को लेकर अहम क़दम उठाया है. लेकिन अभी उसे शायद ख़ुद ही नही पता कि उसके नए हमसफ़र कितनी दूर उसके साथ जाएँगे. |
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