|
भारत के प्रस्ताव पर तारीख़ तय | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के असैनिक परमाणु संस्थानों की सुरक्षा योजना पर विचार करने के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के अधिकारी अगले महीने बैठक करेंगे. भारत और अमरीका के बीच होने वाले परमाणु क़रार को मंज़ूरी मिलने के लिए आईएईए से हरी झंडी मिलना ज़रूरी है. अमरीका के साथ परमाणु क़रार पर आगे बढ़ने के लिए भारत को आईएईए के साथ सुरक्षा समझौते पर दस्तख़त करने होंगे. आईएईए के साथ समझौते के बाद भारत के असैन्य परमाणु संस्थानों में संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों को आने की अनुमति होगी. अगर आईएईए भारत के साथ क़रार कर लेता है तो अमरीका के साथ होने वाले परमाणु क़रार के मामले में भारत एक क़दम और आगे बढ़ जाएगा. इसके बाद भारत को दुनिया के 45 देशों के न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) से मंज़ूरी लेनी होगी. दरअसल एनएसजी वो संस्था है जो पूरी दुनिया में असैन्य तरीके से होने वाले परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल के कारोबार को नियंत्रित करता है. एनएसजी से मंज़ूरी मिलने के बाद भारत इन 45 देशों में से किसी से भी परमाणु ऊर्जा पैदा करने के लिए यूरेनियम ख़रीद सकता है. आईएईए का मुख्यालय ऑस्ट्रिया की राजधानी विएना में है. आईएईए की प्रवक्ता मेलिसा फ़्लैमिंग का कहना था, " 35 देशों के आईएईए बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की बैठक एक अगस्त को होगी. इसमें भारत के साथ सुरक्षा समझौते के मुद्दे पर विचार होगा." मेलिसा के मुताबिक़ इस बैठक से पहले भारत शुक्रवार को आईएईए को बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स के सामने इस समझौते की कुछ बातें रखेगा. भारत का ड्राफ़्ट भारत आईएईए के सामने अपने सुरक्षा ड्राफ़्ट को पेश कर चुका है. इस ड्राफ़्ट का गहराई से अध्ययन करने वाले कई आलोचकों का कहना है कि इसमें भारत ने कई ऐसी शर्तें रखी हैं जो भारत के परमाणु कार्यक्रम को अंतरराष्ट्रीय निगरानी से दूर रखती हैं.
1974 में पहली बार पोखरण में परमाणु परीक्षण करने के बाद भारत ने परमाणु अप्रसार संधि(एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं जिसकी वजह से अमरीका ने भारत के साथ परमाणु समझौता अब तक नहीं किया है. आईएईए और एनएसजी से मंज़ूरी मिलने के बाद अमरीका के साथ होने वाले क़रार के बाद भारत को अमरीका से असैन्य परमाणु तकनीक के अलावा परमाणु ईंधन भी मिल सकेगा. इसके बदले में भारत असैन्य परमाणु संस्थानों में निगरानी को मंज़ूरी तो देगा लेकिन उसके सैनिक परमाणु संस्थान इस निगरानी से बचे रहेंगे. इस परमाणु क़रार की आलोचना करने वालों को डर है कि कहीं भारत असैनिक परमाणु संस्थानों को मिलने वाले यूरेनियम का इस्तेमाल परमाणु बम बनाने में तो नहीं कर लेगा. भारत-अमरीका परमाणु क़रार को लेकर वामदलों ने सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ रखा है. वामदलों के सांसदों के यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद सरकार अल्पमत में आ गई है. उसे अब 22 जुलाई को संसद में अपना बहुमत साबित करना है. वैसे इस क़रार को लेकर भारत पर लगातार अमरीका की तरफ़ से दबाव बना हुआ है. अमरीका चाहता है कि भारत इस साल नवंबर में होने वाले अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव से पहले ये समझौता कर ले. अगर 22 जुलाई को सरकार अपना बहुमत साबित नहीं कर पाती है तो भारत में आम चुनाव होंगे और अमरीका के साथ परमाणु समझौता का भविष्य भी ख़तरे में पड़ जाएगा. |
इससे जुड़ी ख़बरें परमाणु सौदे पर अमरीका की चेतावनी20 फ़रवरी, 2008 | भारत और पड़ोस 'परमाणु समझौता जल्दी हो तो अच्छा'06 मई, 2008 | भारत और पड़ोस परमाणु संयंत्र की सुरक्षा पर बैठक13 अप्रैल, 2008 | भारत और पड़ोस बैठकें जारी, सपा पर नज़रें टिकीं24 जून, 2008 | भारत और पड़ोस सरकार पर दबाव डालेंगे: आडवाणी29 जून, 2008 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||