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अदालती पैसों की हेराफेरी: कई सवाल... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक जज को यह अधिकार है कि वह कि वह किसी अपराधी को फांसी या उम्रक़ैद की सज़ा दे दे. जज को अधिकार है कि वह संसद के बनाए गए क़ानून को असंवैधानिक पाने पर रद्द कर दे. अपार धन संपदा वाले विवाद में भी अदालत ही फ़ैसला करती है. सबसे बड़ी बात यह है कि जज को यह भी अधिकार है कि वह बड़े से बड़े अफसर और मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा कर दोषी पाए जाने पर उसे पद से बेदख़ल कर दे. जेल भेज दे या कानून में निर्धारित दूसरी कोई सज़ा दे दे. लेकिन क़ानून किसी को अपने ही मामले में दरोगा या जज बनने का अधिकार नहीं देता. एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए भारत के संविधान में स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था है. अब तो यह स्वतंत्रता जजों की नियुक्ति से लेकर उनके संपूर्ण आतंरिक प्रशासन में भी है. यह स्वतंत्रता न्यायपालिका के सदस्यों पर सामूहिक ज़िम्मेदारी भी डालती है कि वह अपनी व्यवस्था को पूरी तरह न्यायपूर्ण, सत्यनिष्ठ, पारदर्शी और संदेह से परे रखे. डगमगाता भरोसा लेकिन गाज़ियाबाद ज़िला अदालत के वित्तीय प्रशासन में जो अभूतपूर्व और अफ़सोसनाक घोटाला हुआ है, उसने इस विश्वास को हिलाकर रख दिया है और कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ का कहना है, "बहुत ज़्यादा चिंताजनक है भ्रष्टाचार का यह स्वरूप कि न्यायालय के कर्मचारी प्रोविडेंट फंड से धन निकालें और न्यायिक अधिकारियों को उससे लाभ पहुँचाएं. यह बहुत दुखद है और न्यायपालिका के ऊपर बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न है." संक्षेप मे मामला यह है कि गाज़ियाबाद ज़िला अदालत में पिछले सात सालों मे कर्मचारियों के जीपीएफ़ खातों से करीब सात करोड़ रुपए फर्ज़ी तौर से निकाल लिया गया. यह पैसा कुछ कर्मचारियों और कुछ ग़ैर-कर्मचारियों के नाम से निकाला गया और फिर ज़िला अदालत के जूनियर जज से लेकर, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इसका इस्तेमाल अपने घरेलू ख़र्च और ऐशो-आराम पर किया. हाईकोर्ट के विजिलेंस सेल ने इस मामले को पकड़ा. लेकिन कोर्ट की तरफ़ से फ़रवरी मे 82 लोगों के ख़िलाफ़ रिपोर्ट पुलिस में लिखाई गई. लेकिन इसमें किसी जज का नाम नहीं था जो आपने आप में एक रहस्य का विषय है कि ऐसा भेदभाव क्यों हुआ. पुलिस ने फ़टाफ़ट कर्मचारियों और अन्य लोगों की धर-पकड़ की. मुख्य अभियुक्त कोर्ट के नाज़िर समेत 61 लोग गिरफ़्तार कर लिए गए. 'ठीक से हो जाँच-पड़ताल'
मामले की जांच-पड़ताल ठीक से हो इसलिए गाज़ियाबाद बार एसोशिएशन ने हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर करके मामले की सीबीआई जांच की मांग की. बार एसोसिएशन के अध्यक्ष देवेन्द्र शर्मा का कहना है, "हो सकता है कि पुलिस जजों से पूछताछ न कर सके, इसलिए हमने सीबीआई जांच की मांग की है." हाईकोर्ट ने 19 मार्च के अपने आदेश में लिखा है कि 'गाजियाबाद जजशिप में इस घोटाले ने सारे घोटालों को पीछे छोड़ दिया है.' सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि अभी तक जो कुछ सामने आया है वह बहुत थोड़ा है और इस मामले का दायरा बहुत व्यापक है जो गहराई से छानबीन के बाद ही पता चलेगा. जांच अधिकारी ने भी अदालत को बताया कि भलीभांति जांच में उसे बड़ी दिक्कत आ रही है. हाईकोर्ट इससे पहले कई मामलों में सीबीआई जांच का आदेश दे चुका है. लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि बड़े-बड़े न्यायाधीशों के शामिल होने के कारण स्थानीय पुलिस इस मामले की जांच ठीक से नहीं कर सकेगी. और इस तरह कोर्ट ने सीबीआई जाँच की मांग नामंज़ूर कर दी. जांच ठीक से करने के लिए अदालत ने पुलिस को कई निर्देश भी दिए. सीबीआई जाँच की अपील मायावती सरकार अपनी तरफ़ से भी अनेक मामलों में सीबीआई जाँच की माँग केंद्र सरकार से कर चुकी है. लेकिन उसने भी इस मामले में कोई पहल नही की. बार एसोसिएशन ने अब सुप्रीम कोर्ट में अपील की है जिस पर अगले हफ़्ते सुनवाई होनी है. लोकल पुलिस के पास न तो सीबीआई जैसी स्वतंत्रता है, न उतने विशेषज्ञ अधिकारी और संसाधन. फिर भी इस बात की तारीफ़ करनी पड़ेगी कि स्थानीय पुलिस ने 55 बैंको से जानकारी जुटाई, जहाँ यह धन जमा हुआ था और 69 लोगों के पते-ठिकाने ढूँढ़ कर उन्हें गिरफ़्तार किया. इतने अभियुक्तों के मामले की पैरवी करने के लिए न तो पर्याप्त कर्मचारी लगाए गए, न ही कम्प्यूटर, फ़ोटोकॉपी मशीन और ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम था. गंभीर मोड़ तब आया जब मुख्य अभियुक्त ने अपना जुर्म स्वीकार करके पूरे मामले से परदा उठा दिया. मुक़दमे के मुख्य अभियुक्त आशुतोष अस्थाना ने मजिस्ट्रेट के सामने 30 पेज का कलमबंद बयान रिकार्ड कराया है. इसमें उन्होंने बताया है कि उन्होंने और दूसरे कर्मचारियों ने लगातार सात सालों तक यह धन कैसे निकलवाया. यह धन न्यायिक प्रशासन देखने वाले अधिकारियों की सहमति और स्वीकृति के बिना निकाला नहीं जा सकता था. 'बेटा-बेटी के ख़र्च से फर्नीचर तक'
अस्थाना ने अपने बयान में विस्तार से इस बारे में दावा किया कि किस जज को कितना रुपया हर महीने घर ख़र्च के लिए दिया जाता था. उन्होंने अपने बयान में बता कि किस जज के बेटा-बेटी को क्या-क्या सामान ख़रीदवाया. किस-किस जज के इलाहाबाद, लखनऊ और कोलकाता स्थित मकान में कितने फर्नीचर और दूसरे सामान भिजवाए. और किस-किस जज और उनके परिवार के लोगों को घूमने के लिए टैक्सियों का इंतज़ाम किया और किस ट्रेवल एजेंट को कितना भुगतान किया गया. मज़े की बात है कि इसमें से तमाम भुगतान उन्हें फ़र्जी तौर पर कोर्ट का कर्मचारी दिखाकर किया गया. शायद बड़े अधिकारियों को यह आशंका नहीं थी कि आशुतोष अस्थाना कोर्ट में अपने जुर्म का इक़बाल करके सबका भांडा फोड़ देंगे. यहीं से इस जाँच की दिशा बदल गई. भ्रष्टाचार और गबन के संदेह के घेरे में आए जजों से पूछताछ करने के बजाय लोकल पुलिस बहाने ढूँढने लगी कि कैसे उसे इस मामले से मुक्ति मिले. आईपीएस अधिकारी रहे इश्वर चंद्र द्विवेदी 11 सालों तक सीबीआई के डीआईजी रहें हैं और उत्तरप्रदेश के पुलिस महानिदेशक पद से सेवानिवृत हुए हैं. उनका कहना है, "देखिए जो क्रिमिनल प्रोसीजर कोड है वह विभिन्न अभियुक्तों में कोई फ़र्क नहीं करता, जज हो या कोई सामान्य व्यक्ति हो, एक अभियुक्त, अपराध का अभियुक्त ही है. ऐसे में मुक़दमे में पुलिस के पास विवेचना करने के अलावा और कोई विकल्प है ही नही. अगर वह नहीं कर रहे हैं तो वो मेरी राय में अपना कर्तव्य नहीं निभा रहे हैं. जिन जजों का नाम आया है, उनसे पूछताछ करने में कोई रोक नही है." 'क़ानून से ऊपर कोई नहीं' एक जज ने गुजरात के बहुचर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश की कॉपी मुझे ढूंढ कर दी जिसमे कोर्ट ने कहा था, "कोई भी आदमी चाहे जितने बड़े पद पर हो, वह क़ानून से ऊपर नहीं हैं और उसे आपराधिक क़ानून को तोड़ने की सज़ा अवश्य भुगतनी पड़ेगी." सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि एक मजिस्ट्रेट, जज या किसी अन्य न्यायिक अधिकारी को एक अपराध के लिए किसी सामान्य नागरिक की तरह ही आपराधिक मुक़दमे का सामना करना पड़ेगा. अदालत ने न्यायपालिका की स्वततंत्रता और आपराधिक मामलों की सही विवेचना के बीच संतुलन के लिए कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत तय किए. इसमे ख़ासकर यह कहा गया कि अगर किसी अपराध के लिए एक न्यायिक अधिकारी को गिरफ़्तार करना है तो ज़िला जज या हाईकोर्ट को सूचना देकर ऐसा किया जाए. 1985 में जजों को संरक्षण देने का जो क़ानून बनाया गया उसमें भी केवल न्यायिक या प्रशासनिक कार्यों के लिए संरक्षण की बात कही गई है, न कि भ्रष्टाचार या अपराध के लिए. यह मामला तो न्यायिक कार्य से संबंधित है भी नहीं. दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस के जांच अधिकारी को विवेचना के दौरान संदिग्ध अभियुक्तों और गवाहों का बयान दर्ज करने, उनसे पूछताछ करने का पूरा अधिकार हैं. क़ानूनी तौर पर कोर्ट भी इस काम में कोई दखलंदाज़ी नहीं कर सकता. लेकिन 12 मई को हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के महाधिवक्ता ज्योतिंद्र मिश्र की उपस्थिति, यानी उनकी सलाह से, गाज़ियाबाद के पुलिस कप्तान दीपक रतन ने अदालत से प्रार्थना की कि उन कुछ लोगों के ख़िलाफ़ आगे कार्रवाई की अनुमति दी जाए जिनके मामले में शामिल होने की जानकारी विवेचना के दौरान सामने आई है. जजों की तरफ़ इशारा
पुलिस की अपील में इशारा जजों की तरफ़ था. कोर्ट ने अपने आदेश में सिर्फ़ यह कहा, "पुलिस कप्तान माननीय मुख्य न्यायाधीश से आवश्यक अनुमति प्राप्त करेंगे, अगर इसकी कोई ज़रूरत हो तो." जानकारों का कहना है कि अव्वल तो विवेचना के लिए अनुमति माँगने की ज़रूरत नहीं थी और अगर एहतियातन न्यायपालिका का सम्मान रखने के लिए ऐसा करना भी था तो यह काम पत्राचार से हो सकता था, इसके लिए अदालत में प्रार्थना की ज़रूरत नहीं थी. ख़ैर अब आगे जो हुआ वह और भी विचलित करने वाला हैं. ख़बरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस केजी बालाकृष्णन ने एसएसपी गाज़ियाबाद से कहा कि पहले वह हर जज के लिए अपने सवालों की सूची उन्हें भेजें और विवेचना अधिकारी लिखित उत्तर से संतुष्ट न हों तो वह 'मेरिट' के आधार पर व्यक्तिगत पूछताछ की अनुमति देने पर विचार करेंगे. न्यायमूर्ति कमलेश्वर नाथ उन लोगों में हैं जो इसे ठीक नहीं मानते. वे कहते हैं, "यह सवाल देने की जो प्रक्रिया है वह शायद 'सेल्फ़ डिफ़ीटिंग' है. जिस आदमी को आप सवाल दे रहे हैं वह अपने आप को पहले से ही तैयार रखता है कि हमे किस बात पर क्या कहना है. दूसरी बात यह है कि एक प्रश्न पूछा गया, उसका कुछ उत्तर आया, उस उत्तर के परिप्रेक्ष्य में ऐसा दूसरा प्रश्न उठ सकता है जो प्रश्नावली में न हो. उसका उत्तर कैसे मिल मिलेगा?" कमलेश्वर कहते हैं, "भारत के मुख्य न्यायाधीश हमारी न्यायपालिका के सर्वोच्च अधिकारी हैं. उनका उत्तरदायित्व है कि पूरे भारत की न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा करें. जब इतना गंभीर आरोप है तो उसके बारे में अलग-अलग सवाल बनाकर मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाए कि वे उस पर संबंधित न्यायाधीश से पूछें यह उचित नही मालूम होता. जाँच का यह काम पुलिस का है. यह जज का काम नहीं है. न्यायपालिका अपने प्रशासनिक दायरे में जो चाहे जाँच करा ले, उसमें पुलिस का कोई हस्तक्षेप नही है." विवेचना की रफ़्तार पर असर क़रीब एक महीने से गाज़ियाबाद पुलिस अपने सवालों की सूची तैयार कर रही हैं. आगे की विवेचना एक तरह से ठप है. भारत की न्यायपालिका में अब तक के सबसे बड़े इस घोटाले में मुक़दमा दर्ज हुए करीब छह महीने हो रहे हैं. पुलिस सूत्रों के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश हेमंत लक्ष्मण गोखले ने अभी तक कोई प्रशासनिक क़दम नहीं उठाया है और संपर्क करने के बावजूद उनका कार्यालय कुछ भी बताने में हिचक रहा है. अगर ऐसा ही चलता रहा तो आश्चर्य नहीं कि इनमें से कुछ जज जिनपर आरोप लगे हैं, वे प्रमोशन पाकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाएँ. इसी इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज गंभीर आरोपों के बावजूद देश के एक हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश हो गए. और, याद दिलाने की ज़रूरत नहीं कि भारत के एक मुख्य न्यायाधीश पर अपने बेटे को व्यावसायिक लाभ पहुँचाने के आरोप लगे, जबकि उन्हें ऐसे मुक़दमों की सुनवाई से अलग हो जाना चाहिए था. रिटायर होने के बावजूद अभी तक उनके ख़िलाफ़ कोई जाँच नही बैठ पाई. ये सारे सवाल किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज को विचलित कर सकते हैं. आदमी जब सब जगह से हार जाता है तो वह अदालत का दरवाज़ा खटखटाता है. अगर न्यायपालिका से भी उसका भरोसा उठ जाएगा तो कहाँ जाएगा वह? |
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