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भारत में मृत्युदंड पर गहरे मतभेद | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में यह बहस पुरानी है कि क्या किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देना ठीक है? क्या सचमुच यह सबसे बड़ी सज़ा है? इसे लेकर दुनिया भर में दो तरह की राय हैं. भारत में भी इस विषय पर विशेषज्ञ दो खेमों में बँटे हुए हैं. एक वर्ग इसका विरोध करता है और चाहता है कि भारत में मृत्युदंड को ख़त्म कर दिया जाए. दूसरा इसे सही मानता है. मानवाधिकारों के जाने-माने विशेषज्ञ रवि नायर का मानना है कि संगीन अपराधों के लिए मौत की सज़ा की जगह आजीवन कारावास होना चाहिए. उनका कहना है, "मृत्युदंड कठोर दंड नहीं होता है और आजीवन कारावास ही कठोर दंड है. सज़ा मिलना सुनिश्चित होना चाहिए, इसके लिए सज़ा का कठोर होना ज़रूरी नहीं है. लेकिन यहाँ भारत में जो क़ानून व्यवस्था है उसमें आप देखेंगे कि सज़ा मिलने की सुनिश्चितता नहीं है." डर का सवाल लेकिन कुछ लोग मानते हैं कि आख़िरी सज़ा तो मौत ही होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष का कहना है, "गंभीर अपराधों के लिए यदि मृत्युदंड दिया जाता है तो कोई भी व्यक्ति संगीन अपराध करने से पहले ज़रूर सोचेगा. हम अपराधी लोगों के टैक्स के पैसे से क्यों पालते रहें?" लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि भारत में ऐसा कोई अध्ययन तो किया ही नहीं गया है जिससे यह पता लग सके कि मृत्युदंड के खौफ़ से संगीन अपराध को रोका भी जा सकता है या नहीं. 1972 में विधि आयोग ने अध्ययन करने की कोशिश ज़रूर की थी, लेकिन इस रिपोर्ट में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया था कि कोई भी व्यक्ति मृत्युदंड के डर से अपराध करने से बचेगा. इस मुद्दे पर 1983 में संसद में बहस भी हुई थी उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मृत्युदंड को समाप्त करने की बात कही थी लेकिन उनकी पार्टी के भीतर ही विरोध के चलते ऐसा नहीं हो पाया. रवि नायर का मानना है कि भारतीय क़ानून में कई प्रकार के सुधार आवश्यक हैं. वे कहते हैं, "इसके कई पहलू हैं, एक तो यह कि अपराध क्षणिक क्रोध के चलते होते हैं. उस समय अपराधी सोच समझ नहीं पाता कि मैं छूट जाउँगा या बच जाउँगा या फांसी हो जाएगी. दूसरा पहलू ये है कि हिंदुस्तान में आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधारों की ज़रुरत है." वे कहते हैं, "एक तो हर दिन सुनवाई होनी चाहिए और पुलिस प्रशासन में सुधार बहुत ज़रूरी हैं. तीसरा पहलू राजनीतिक मुद्दों का है. हमारे यहाँ 'विक्टिम प्रोटक्शन एक्ट' नहीं है और 'विटनेस प्रोटेक्शन एक्ट' नहीं है." दूसरे पक्ष का सवाल क़ानून विशेषज्ञ पीएच पारेख का कहना है, "दो तरह के अपराधी होते हैं, एक तो वे जो भावुकता में आकर अपराध करते हैं और दूसरे वे जो सोच-समझकर अपराध करते हैं." उनका कहना है "अपराधी को मौत की सज़ा देते हुए आप एक ही पक्ष के बारे में सोच रहे होते हैं कि आदमी ने क़ानून का उल्लंघन किया, उसके मानवाधिकार, उसके परिवार के बारे में नहीं सोचते." हालाँकि बहुत कम परिस्थितियों में ही मृत्युदंड की सज़ा दी जाती है लेकिन भारतीय क़ानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अगर अभियुक्त बेगुनाह साबित होता है तो उसे किसी प्रकार का मुआवज़ा दिया जाए. मिसाल के तौर पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में अभियुक्त केहर सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी. लेकिन बाद में उस मामले के न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने इस सज़ा को ग़लत बताया था. उस मामले के वकील राम जेठमलानी कहते हैं, "मैं मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ हूँ क्योंकि इंसान भूल कर सकता है, जज भी भूल कर सकते हैं, और क्रिमिनल लॉयर की हैसियत से मेरा ये अनुभव है कि कई बार अगर कोई अच्छा वकील न तो बेगुनाह इंसान भी फाँसी पर चढ़ जाए." वे कहते हैं कि मौत की सज़ा ऐसी है जिसको बाद में ठीक नहीं किया जा सकता. वहीं भारतीय खुफ़िया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व प्रमुख अरूण भगत मानते हैं कि क़ानून में कभी ग़लती तो हो सकती है लेकिन इसकी गुंजाइश बहुत ही कम होती है. उनका मानना है कि फ़ाँसी की सज़ा सुनाने से पहले हर मामला एक लंबी प्रक्रिया से गुज़रता है. साथ ही, कोई भी अभियुक्त अपने बचाव में याचिका भी दायर कर सकता है. अरूण भगत का मानना है कि अन्य देशों के मुक़ाबले भारत की सामाजिक परिस्थितियाँ बहुत अलग हैं और इसकी तुलना छोटे देशों से नहीं की जा सकती. वो कहते हैं, "हमारे यहाँ इतने अपराध हैं लेकिन किसी भी अपराधी से आप पूछें कि वो किस सज़ा से डरता है तो वह कहता है कि मौत से उसे डर लगता है." |
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