|
सरकार ने कहा, अदालतें ही सर्वोपरि | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
केंद्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि देश की न्यायिक अदालतें ही सर्वोपरि हैं और उनके सामने शरिया अदालतों का कोई अस्तित्व नहीं हैं. शरियत अदालतों पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के एक दिन बाद केंद्र सरकार ने स्पष्ट कह दिया है कि देश में एक ही न्यायिक प्रणाली है और उन्हें क़ानून में श्रेणीबद्ध किया गया है. केंद्रीय क़ानून मंत्री हंसराज भारद्वाज ने कहा है कि इन न्यायालयों के अलावा कुछ भी प्रासंगिक नहीं हैं. उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 16 अगस्त को केंद्र सरकार, सात राज्य सरकारों, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दारुल उलूम जैसी संस्थाओं को नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि वे इन अदालतों की वैधानिक स्थिति बताएँ. सुप्रीम कोर्ट ने यह नोटिस एक जनहित याचिका पर जारी किया था जिसमें कहा गया था कि शरियत अदालतें समानांतर अदालतों की तरह काम कर रही हैं और इन्हें ग़ैरक़ानूनी घोषित किया जाना चाहिए. हाल ही में कई मामलों में शरिया अदालतों द्वारा फ़तवे जारी करने के बाद यह याचिका दायर की गई है. दो टूक जवाब इस मामले पर अपना रुख़ स्पष्ट करते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि इस देश में किसी और अदालत की कोई भूमिका नहीं है. उन्होंने कहा, "क़ानून के अनुसार पहले ज़िला दंडाधिकारी की अदालत होती है, फिर सिविल जज की अदालत फिर सत्र न्यायालय और फिर ज़िला अदालतें. इसके बाद हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट. इसमें कोई और अदालत की कोई जगह नहीं है." उन्होंने कहा कि संविधान और किसी वैधानिक व्यवस्था को मान्यता ही नहीं देता. शरिया अदालतों पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, "शरिया अदालत तो एक समाज विशेष के बारे में है जो शरिया पर चलता है, यदि उनके समाज में कुछ ग़लत होता है तो वे उसे सुधार सकते हैं." फ़तवों के बारे में उन्होंने कहा कि वैधानिक व्यवस्था सर्वोच्च है और इस व्यवस्था में फ़तवों की कोई प्रासंगिकता ही नहीं है. उन्होंने कहा कि यह कहना ग़लत होगा कि कोई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को नहीं मानता. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||