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रविवार, 22 जून, 2008 को 15:30 GMT तक के समाचार
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टूटा नहीं है परमाणु समझौते पर गतिरोध

प्रकाश कारत
वामपंथी दल यूपीए घटक दलों को समझा रहे हैं
भारत अमरीका परमाणु समझौते पर वामपंथी दलों के विरोध के बावजूद सरकार के आगे बढ़ने के संकेत देने से उत्पन्न गतिरोध टूटता नज़र नहीं आ रहा है.

सरकार की ओर से मुख्य वार्ताकार और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ऑस्ट्रेलिया दौरे पर हैं. लिहाज़ा सरकार की ओर से इस मुद्दे पर रविवार को कोई गतिविधि नज़र नहीं आई.

लेकिन वामपंथी नेताओं ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के घटक दलों को अपने पक्ष में खड़े करने के प्रयास जारी रखते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि से बातचीत की.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के महासचिव प्रकाश कारत और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के वरिष्ठ नेता डी राजा उनसे मिलने चेन्नई पहुँचे. इस बातचीत का पूरा ब्यौरा अभी नहीं मिल पाया है.

विचार-विमर्श

लेकिन सीपीआई के महासचिव एबी बर्धन ने बीबीसी को बताया कि वाम दल घटक दलों से क्या विचार-विमर्श कर रहे हैं.

 हम उनसे ये कह रहे हैं कि जिस तरह से प्रधानमंत्री और कुछ अन्य लोग इस समझौते पर एकतरफ़ा आगे बढ़ना चाहते हैं. ऐसी स्थिति में तो आप देश पर चुनाव लाद दोगे और इस समय महंगाई आसमान छू रही है. आपकी प्राथमिकता महंगाई को क़ाबू में करने की होनी चाहिए
एबी बर्धन

उन्होंने कहा, "हम उनसे ये कह रहे हैं कि जिस तरह से प्रधानमंत्री और कुछ अन्य लोग इस समझौते पर एकतरफ़ा आगे बढ़ना चाहते हैं. ऐसी स्थिति में तो आप देश पर चुनाव लाद दोगे और इस समय महंगाई आसमान छू रही है. आपकी प्राथमिकता महंगाई को क़ाबू में करने की होनी चाहिए."

यूपीए सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी ने वामदलों के सामने ये दावा किया है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर आगे जाने के लिए उसको यूपीए के घटक दलों का समर्थन प्राप्त है.

उसके बाद से ही वामपंथी पार्टियों ने यूपीए के घटक दलों से संपर्क साधा और इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखना शुरू किया है. हालाँकि अभी तक किसी भी घटक दल ने खुल कर वाम दलों के पक्ष में अपनी बात नहीं रखी है.

लेकिन यूपीए के दो महत्वपूर्ण नेताओं शरद पवार और करुणानिधि ने सरकार और वामदलों के बीच गतिरोध को तोड़ने का बीड़ा उठाने के संकेत दिए हैं.

अपील

लेकिन क्या वामदलों के पास इस मुद्दे से पीछे हटने की कोई गुंजाइश है, इस सवाल पर करुणानिधि से मुलाक़ात के बाद प्रकाश कारत ने कहा है कि उन्होंने करुणानिधि से इस मामले पर हस्तक्षेप की अपील की है.

यूपीए-लेफ़्ट समन्वय समिति का भी लाभ नहीं हो रहा

साथ ही ये भरोसा दिया है कि वामपंथी पार्टियाँ भी फिर आपस में चर्चा करेंगी.

कितनी गुंजाइश है वामपंथी पार्टियों के पास, इस मुद्दे पर बर्धन कहते हैं- शर्त ये थी कि जब प्रारूप तैयार हो जाएगा, तो हमें वो दिखाया जाएगा. इसके बाद यूपीए-वामदलों के पैनल का जो निष्कर्ष होगा, उसी पर मामला आगे बढ़ेगा. लेकिन इसी बीच वो आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं.

कुल मिलाकर पिछले चार साल से यूपीए सरकार को संसद में अपनी संख्याबल और यूपीए घटक दलों से अच्छे तालमेल के आधार पर अपनी बात मनवाने वाली वामपंथी पार्टियाँ की इस बार कठिन परीक्षा है.

ताज़ा हालात में उसके तरकश में एक ही तीर है कि वो घटक दलों को ये समझाए कि अगर सरकार भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर आगे बढ़ती है, तो सरकार गिर जाएगी और समय से पहले ही सबको चुनाव में उतरना पड़ेगा.

लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस घटक दलों को ये विश्वास दिला चुकी है कि वामदलों के समर्थन वापसी की सूरत में समाजवादी पार्टी के दम पर सरकार को बचाया जा सकता है.

शायद यही कारण है कि वामपंथी नेताओं को कहीं से भी स्पष्ट आश्वासन नहीं मिल रहा है.

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