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गूजर आंदोलन: अदालत पर टिकी निगाहें | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान में गूजरों के आंदोलन के दौरान गिरफ़्तार हुईं महिलाओं के मामले की सुनवाई गुरुवार को दौसा की ज़िला अदालत में हो रही है. इस समस्या को सुलझाने के लिए सरकार और गूजरों के बीच रुकी हुई बातचीत का भविष्य इस सुनवाई पर निर्भर करता है. गूजर नेता अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की माँग पर आंदोलन कर रहे हैं. लेकिन मसला सुलझाने के लिए दूसरे चरण की बातचीत इसलिए रुकी है क्योंकि गूजर गिरफ़्तार महिलाओं की रिहाई की माँग कर रहे हैं. इस साल इस आंदोलन को चलते 21 दिन हो चुके हैं और इस दौरान पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच हुई झड़पों और पुलिस फ़ायरिंग में दो पुलिसकर्मियों समेत 41 लोग मारे गए है. गिरफ़्तार महिलाओं का मामला आंदोलन कर रही 25 गूजर महिलाओं को छह जून को दौसा ज़िले में बांदीकुई से उस वक्त गिरफ़्तार किया गया जब उन्होंने रेल मार्ग रोक दिया था. इन महिलाओं पर रेलवे एक्ट के अलावा शांति भंग करने और हिंसा फैलाने से संबंधित मामले दर्ज हैं. इनकी ज़मानत याचिका बुधवार को एक स्थानीय अदालत ने ठुकरा दी थी. जहाँ ये मामला अब ज़िला अदालत में आ रहा है वहीं माना जा रहा है कि अगर इन महिलाओं को ज़मानत मिलती है तो बातचीत फिर शुरु हो सकती है. गूजर नेताओं ने राज्य से इन महिलाओं के ख़िलाफ़ मामला वापस लेने की माँग की है. लेकिन सरकारी पक्ष का कहना है कि एक बार अदालत में जाने के बाद मुक़दमा वापस लेना आसान नहीं है और इस प्रक्रिया में समय लगता है. |
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