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राजनीतिक लड़ाई है गूजर आंदोलन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
राजस्थान के गूजर समुदाय ने ख़ुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की माँग को लेकर आंदोलन छेड़ रखा है जो उग्र रूप ले चुका है. इस आंदोलन में अनेक लोग हताहत हुए हैं. इस मुद्दे पर राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार का रुख़ भी साफ़ नहीं है. जानकारों का कहना है कि यह सामाजिक मुद्दा ना रहकर सिर्फ़ राजनीतिक लड़ाई बनकर रह गया है और वोट राजनीतिक का भी एक जीता-जागता उदाहरण है. राजस्थान के गूजर समुदाय की आरक्षण की माँग के मुद्दे पर बनी उच्चाधिकार प्राप्त चोपड़ा समिति के सदस्य योगेश अटल से हमने इस मुद्दे पर धुंध साफ़ करने का अनुरोध किया. योगेश अटल का कहना था कि गूजरों को राजस्थान में पिछले सात-आठ वर्ष पहले पिछड़े वर्ग में शामिल कर लिया गया था और उन्हें तब से आरक्षण का लाभ भी मिल रहा है लेकिन अब उनकी माँग है कि उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी से हटाकर अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में डाल दिया जाए और उन्हें उस समुदाय को मिलने वाले सभी लाभ दिए जाएँ. जनजाति के लाभ अनुसूचित जनजाति में जगह मिलने के कुछ लाभ हैं. पहला यह कि जनजातियों के बीच जब कोई झगड़ा होता है तो निर्णय के लिए उन्हें किसी कोर्ट में नहीं जाना पड़ता है और वे अपने मसले ख़ुद ही सुलझा सकते हैं यानी पंचायत की ख़ासी अहमियत होती है. दूसरा लाभ यह है कि जनजाति की ज़मीन केवल जनजाति के लोग ही खरीद सकते हैं इसलिए अगर गूजरों को जनजाति का दर्जा मिल जाता है तो वे दूसरी पिछड़ी हुई जनजातियों की ज़मीन का अधिग्रहण कर सकते हैं. तीसरा तुलनात्मक लाभ यह है कि गूजर अपनी तुलना मीणाओं से करते हैं. राजस्थान में मीणाणों की संख्य़ा लगभग साढ़े छह लाख है. यह उतनी ही है जितनी जनसंख्या गुजरों की है. गूजरों का मानना है कि मीणाओं ने जनजाति में अपना स्थान बनाकर अपने बहुत से हित साधे हैं. वे आज बहुत ऊंचे स्थान पर पहुँच चुके हैं. वे एक तरह से क्रीमी लेयर में हैं. गूजर यह सोचते हैं कि अगर मीणाओं को यह मिल सकता है तो उन्हें भी यह मिलना चाहिए. गूजर अपने आपको सापेक्षिक रूप से वंचित समझते हैं. वे यह समझते हैं कि जनजाति का दर्जा मिलने से उनका यह वंचन दूर हो जाएगा. ये तीन अलग-अलग लाभ हैं जो गूजरों के मौजूदा आंदोलन और मांगों में छिपे हुए हैं. अगर कोई जाति आरक्षण या जनजाति के दर्जे की माँग करती है तो केंद्र सरकार राज्य सरकार से पूछती है कि क्या यह होना चाहिए या नहीं. केंद्र सरकार राज्य सरकार से उसकी संस्तुती मांगती है. केंद्र की कसौटियाँ केंद्र सरकार ने किसी जाति को जनजाति में शामिल करने के संबंध में 1952-53 में कुछ कसौटियाँ बनाई थीं. अगर इन कसौटियों को माना जाए तो आज जनजाति की सूची में शामिल कई जातियाँ उससे बाहर हो जाएँगी. राजस्थान सरकार से कहा गया है कि वह चोपड़ा समिति की सिफ़ारिशों को केंद्र सरकार को भेजे और कहे कि इन कसौटियों के आधार पर राज्य सरकार आरक्षण की संस्तुति करने की स्थिति में नहीं है क्योंकि ये इतनी साधारण और ग़ैरवाज़िब हैं कि ये आज के संदर्भ में बिल्कुल खरी नहीं उतरती हैं. चोपड़ा समिति ने कहा है कि इस मामले पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस हो और इस मामले पर केंद्र सरकार पुनर्विचार करे, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक चोपड़ा समिति की रिपोर्ट भी प्रकाशित नहीं की है. मामला राजनैतिक अंतर यह है कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार है और राजस्थान में भाजपा की सरकार है. चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, इसलिए कांग्रेस भी इस मामले में रुचि नहीं ले रही है. वह चाह रही है कि आंदोलन हो, जिससे राज्य सरकार थोड़ा परेशान हो. यह सारी लड़ाई एक राजनीतिक मुद्दा और वोट की राजनीति बन चुका है. (यह लेख राजस्थान सरकार की ओर से गठित चोपड़ा उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सदस्य योगेश अटल से बीबीसी संवाददाता ममता गुप्ता की हुई बातचीत पर आधारित है) |
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