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हंगामा है क्यों बरपा... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यूँ तो यह राजमार्ग जयपुर के हवामहल से हमें आगरा तक ले जाता है. लेकिन इस बार यह मार्ग मुझे एक अलग दुनिया में ले गया जहाँ कदम-कदम पर समुदायों के बीच कटुता का बसेरा था. हिंसा की तपिश झेल रहा दौसा इसी मार्ग पर है. जयपुर से दौसा और फिर पाटोली गाँव पहुँचने में बमुश्किल डेढ़ घंटे लगते हैं. लेकिन उस दिन यह सफ़र इतना लंबा हुआ कि हमें पाटोली पहुँचने में पांच घंटे लग गए. इस राजमार्ग पर हमें 'राज' की उपस्थिति कहीं नज़र नहीं आई. सड़क मार्ग को जातियों ने अपने-अपने हिस्से में बाँट रखा था. दौसा तक एक बिरादरी की हुकूमत थी तो उससे आगे की दुनिया पर किसी दूसरी जाति का आधिपत्य. सड़क पर मुँह बाए खड़े अवरोध और उसे पार कर लो तो भीड़ का विरोध. पुलिस का कहीं नामोनिशान नहीं. सन्नाटा
लाठियों से लैस भीड़ ने कदम-कदम पर हमें रोका. लेकिन प्रेस की दुहाई देने पर अपनी-अपनी जाति के हक़ में पैरवी की हिदायत के साथ हमें जाने दिया गया. जिस राजमार्ग को हमेशा गाड़ियों की आवाज़ और मुसाफ़िरों की आवाजाही गुले-गुलज़ार रखती थी, वहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था. सड़क किनारे के ढाबे 'सदा सुहागन' सा श्रँगार कर दिन-रात खुले रहते थे. मगर अभी वहाँ मनहूसियत छाई थी. उस वीराने ने हमें भीतर तक डरा दिया. सड़क पर बढ़ते हमारे इकलौते वाहन को देखकर लोग कहते कि रुक जाओ आगे ख़तरा है. किसी गांव कस्बे का पड़ाव आता तो लाठियाँ लिए लोग हुज़ूम की शक्ल में खड़े मिलते. वे सबसे पहले हमारी जाति पूछते और यह तसल्ली करने के बाद जाने देते कि हम उस ख़ास बिरादरी से नहीं हैं, जिसे वे ढूँढ़ रहे हैं. सड़कों पर कुछ वाहन धूँ-धूँ कर जलते मिले तो क्षतिग्रस्त सरकारी दफ़्तर और दुकानें ऐसा दृश्य प्रस्तुत करतीं जैसे यहाँ कोई लड़ाई लड़ी गई हो. अनियंत्रित युवकों की भीड़ निर्माणाधीन सरकारी इमारतों से लोहे के सरिए निकालने की मशक्कत कर रही थी ताकि उन्हें हथियार की तरह इस्तेमाल में लाया जा सके. ये वो हाथ थे जिन्हें रचना और निर्माण की इबारत लिखनी थी. मगर वे विध्वंस के काम में लगे हुए थे. समरसता इससे पहले दौसा के लालसोठ में सांगीतिक दंगल 'हेला ख़याल' का कवरेज़ होता रहा है. मेरे जहन में उस संगीत समारोह में गूजर और मीणा जातियों की शिरकत और प्रस्तुति के दृश्य ताजा हो गए. वो इन जातियों की समरसता का मेला था. अचानक मैंने लाठियाँ भाँजती भीड़ को मेरी गाड़ी की ओर बढ़ते देखा तो मुझे लगा अब तो यहाँ कोई और ही दंगल लड़ा जा रहा है. जिसमें निशाने पर इंसानियत है. दौसा में होने वाले उस संगीत दंगल में गूजर, मीणा और सभी लोग अपनी काव्य रचनाओं के साथ आते और राजनीति पर तीखे प्रहार करते. लेकिन इस बार राजनीति की बारी थी. उसने सामाजिक समरसता पर ऐसा वार किया कि भाई भाई का दुश्मन हो गया. मेरा टैक्सी ड्राइवर जनजाति समुदाय से था. भीड़ ने उसकी जाति पूछी तो ड्राइवर ने अपनी पहचान छुपा ली. लेकिन वो नहीं जानता था कि इस क्षेत्र के भाईचारे को भंग करने वाले तो सियासत में माथा ऊँचा कर घूम रहे हैं. मुझे लगा हिंसा के इस दौर में न जाने कितने बेगुनाह लोगों को अपनी पहचान छुपाकर जान बचानी पड़ेगी. | इससे जुड़ी ख़बरें तीसरे दौर की बातचीत विफल01 जून, 2007 | भारत और पड़ोस राजस्थान में गूजर-पुलिस संघर्ष29 मई, 2007 | भारत और पड़ोस दिल्ली में गुर्जर समाज की रैली 17 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस राजस्थान के 11 ज़िलों में रासुका लागू02 जून, 2007 | भारत और पड़ोस दिल्ली में गूजरों का प्रदर्शन, बीजेपी अध्यक्ष से मिले03 जून, 2007 | भारत और पड़ोस राजस्थान में गतिरोध ख़त्म होने के आसार03 जून, 2007 | भारत और पड़ोस गूजर नेताओं के साथ अहम बातचीत04 जून, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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