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रविवार, 18 मई, 2008 को 10:27 GMT तक के समाचार
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असल ज़िंदगी का मुन्ना भाई....

लक्ष्मण तुकाराम
लक्ष्मण पर 14 मामले चल रहे थे जिसमें उन्हें चार साल की सज़ा हूई थी
फ़िल्मों में गांधीजी से प्रभावित होकर मुन्ना भाई यानी संजय दत्त की गांधीगिरी से सब वाकिफ़ हैं लेकिन मुंबई के लक्ष्मण तुकाराम गोले असल ज़िंदगी के मुन्नाभाई हैं.

मुंबई की जेलों में गांधीजी की जीवनी पढ़ने के बाद लक्ष्मण गोले ने बुराई का रास्ता त्यागने का फ़ैसला किया और अपनी पिछली जिंदगी से नाता तोड़ लिया लेकिन ये सब इतना आसान भी नहीं था.

अब ग्रांट रोड पर गांधी बुक सेंटर में काम करने वाले लक्ष्मण से मिलने पर लगता नहीं कि वो कभी भाई रहे होंगे. दुबली काया लेकिन आंखों में एक आत्मविश्वास ज़रुर झलकता है.

वो अपने जीवन के पहले अपराध के बारे में बताते हैं, "मैं घाटकोपर के पास झुग्गी में रहता था. वहाँ पानी को लेकर झगड़े होते थे और एक गुंडे का दबदबा था. एक दिन इसी लड़ाई में मैंने उसको चाकू मार दिया. यहीं से मेरी अपराध की ज़िंदगी शुरु हुई."

इसके बाद तो मानो लक्ष्मण ने पीछे मुड़कर देखना ही नहीं सीखा. चाकूबाज़ी, आगजनी, हफ्ता वसूली, गुंडागर्दी, मारपीट, अवैध व्यापार उसने सबकुछ किया.

मर्डर नहीं किया

लक्ष्मण गोले कहते हैं, "मैंने मर्डर छोड़ के सब तरह का अपराध किए होंगे. पैसा बहुत मिलता था लेकिन बार बार जेल भी जाते थे. लाइफ़ ऐसे ही चल रही थी."

लक्ष्मण को दो बार उसके इलाक़े से तड़ीपार भी किया गया यानी एक ख़ास इलाक़े में आने से रोक लगा दी गई.

 मुझे लगा कि जब गांधीजी ने ग़लत काम किया और प्रायश्चित कर के अच्छा बन सके तो मैं भी ऐसा कर सकता हूँ

बाद में मुंबई में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ गईं तो लक्ष्मण पर भी आतंकवाद निरोधक क़ानून के तहत आरोप लग गए जिसमें ज़मानत मिलने की संभावना बंद हो गई.

लेकिन इस आपराधिक माहौल यानी जेलों में गांधीजी से कैसे सामना हुआ.

लक्ष्मण बताते हैं, "असल में मैं उन दिनों नासिक और आर्थर रोड जेल में बंद रहता था. वहीं पर एक क़ैदी प्रदीप बोलकर ने मुझे गांधीजी की संक्षिप्त जीवनी दी. मुझे इसमें कोई रुचि नहीं थी लेकिन खाली टाइम में जब उसको पढ़ा तो अच्छा लगा. मुझे लगा कि जब गांधीजी ने ग़लत काम किया और प्रायश्चित करके अच्छा बन सके तो मैं भी ऐसा कर सकता हूँ."

लक्ष्मण का हृदय परिवर्तन

फिर क्या था, लक्ष्मण ने गांधी बुक सेंटर को पत्र लिखकर बड़ी जीवनी मंगाई और उसे पढ़ने के बाद तय किया कि वो अपने अपराधों का प्रायश्चित करेगा. उस समय लक्ष्मण के ख़िलाफ छोटे-मोटे 19 मामले दायर हो चुके थे.

लक्ष्मण तुकाराम
लक्ष्मण तुकाराम अब मुंबई में गांधी पर लिखी किताबों का स्टॉल चलाते हैं

लक्ष्मण के कुछ मामले ख़त्म थे और तीन मामलों में वो जेल में बंद था. लक्ष्मण ने प्रायश्चित का रास्ता निकाला और न्यायाधीश को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें जल्दी सज़ा सुनाई जाए ताकि अदालत का समय नष्ट न हो.

इस पत्र पर न्यायाधीश को आश्चर्य हुआ और उन्होंने लक्ष्मण को अदालत में बुलाकर इसका कारण पूछा तो लक्ष्मण ने बताया कि उन्हें अपराध कबूलने की प्रेरणा गांधीजी से मिली है.

इस पर न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि उसे तीन मामलों में सात साल की सज़ा हो सकती है जिस पर लक्ष्मण ने कहा कि उसे यह मालूम है और वो यह सज़ा कबूल करता है.

लक्ष्मण के प्रायश्चित भाव से प्रसन्न होकर न्यायाधीश ने उसे दो मामलों में कुल मिलाकर चार साल की सज़ा सुनाई और जुर्माना लगाया.

यह सज़ा काटने के दौरान लक्ष्मण जेल में अपने साथ रहने वाले क़ैदियों की देखभाल करता, गांधीजी का साहित्य बांटता और क़ैदियों का मन बदलने की कोशिश करता रहता.

उसके आचरण से प्रसन्न होकर जेल अधिकारियों ने उसे 50 दिन पहले ही रिहा कर दिया.

गांधीजी के लिए काम करुंगा

जेल से निकलने के बाद जब लक्ष्मण के बारे में लोगों को पता चला तो एक हीरा व्यापारी ने उसे अपने यहां नौकरी देने की पेशकश की लेकिन लक्ष्मण ने वहां काम करने से इंकार कर दिया.

वो कहते हैं, "हीरा व्यापारी के पास पैसा तो अधिक मिलता लेकिन शांति नहीं मिलती है. मुझे तो गांधीजी के रास्ते पर ही चलना था. इसलिए मैंने गांधी बुक सेंटर वालों से अपील की कि मुझे वो कोई नौकरी दे दें."

लक्ष्मण को मिले पत्र
कई लोग जेल से लक्ष्मण को पत्र लिखकर गांधी के बारे में जानना चाहते हैं

अब लक्ष्मण मुंबई के ग्रांट रोड पर गांधी बुक सेंटर में काम करते हैं. सातवीं पास लक्ष्मण ने जेल में ही गुजराती पढ़ना लिखना सीखा है. अब वो चरखा कातते हैं और किताबें बेचते हैं.

लक्ष्मण मुन्नाभाई की गांधीगिरी के बारे में पूछने पर मुस्कुराते हैं और कहते हैं, "अच्छी फ़िल्म है. लोगों को गांधीजी के बारे में बताया लेकिन असल जीवन में गांधीजी के मूल्यों को अपनाने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए लेकिन जो ऐसा करता है उसे बहुत खुशी मिलती है. ऐसा मैं जानता हूं."

असली मुन्ना भाई

असली जीवन का यह मुन्ना भाई अब चाकू की जगह चरखा पकड़ चुका है और जेलों से उसे कई पत्र भी आते हैं. वो उनके जवाब लिखता है, खादी पहनता है और गांधीजी के बताए रास्ते पर चलने की कोशिश भी करता है.

मुन्नाभाई की गांधीगिरी फ़िल्मी पर्दे की कहानी थी लेकिन लक्ष्मण गोले का जीवन दर्शाता है कि गांधी में अब भी वो ताकत है कि किसी को चाकू से चरखे पर ला सके.

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