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गुरुवार, 08 मई, 2008 को 13:50 GMT तक के समाचार
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गांधी के वारिस की गांधीगिरी

राजभवन ने शाम का अंधेरा पहले कभी नहीं देखा था
कोलकाता में आलीशान राजभवन की बत्तियां बुधवार की दोपहर डेढ़ और शाम छह बजे अचानक गुल हो गईं.

दिन में तो बाहर से इसका पता नहीं चला, लेकिन शाम को राजभवन में अंधेरा छा गया. पास के ईडेन गार्डेन से आती फ्लड लाइट की रोशनी में यह सफेद इमारत दूर से चमक रही थी.

ऐसा किसी तकनीकी गड़बड़ी के कारण नहीं हुआ था. अब इसे चाहें राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी की 'गांधीगिरी' कहें या फिर बिजली की भारी किल्लत के इस दौर में राज्य की वाममोर्चा सरकार पर दबाव डालने का तरीक़ा, दोनों बार एक-एक घंटे तक राजभवन की बिजली गुल रही.

दरअसल, राज्य में भारी गर्मी और बिजली की किल्लत की वजह से आम लोगों को होने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए राज्यपाल ने कल ही रोजाना दो घंटे तक राजभवन की बत्तियां गुल रखने का फैसला किया था. एक बयान के जरिए इसकी जानकारी दी गई थी.

 मैं राज्यपाल के फैसले पर ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहता. लेकिन आजादी के 60 साल बीतने के बाद अब पूरे देश में यह बहस चलाई जानी चाहिए कि क्या राज्यपाल के पद जरूरी हैं
विमान बसु, वाममोर्चा अध्यक्ष

अब राज्यपाल की मंशा भले ही आम लोगों की दिक्कतों में सहभागी बनना हो, उनका यह फैसला सत्तारुढ़ वाममोर्चा को फूटी आंख नहीं सुहाया है. इसे कोलकाता में गांधी की गांधीगिरी कहा जा रहा है. राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी महात्मा गांधी के पौत्र हैं.

वाममोर्चा के नेताओं ने उनकी इस कथित गांधीगिरी से प्रभावित हुए बिना सवाल उठाया है कि क्या देश को सचमुच राज्यपालों की जरूरत है. मोर्चे के अध्यक्ष विमान बसु कहते हैं कि "मैं राज्यपाल के फैसले पर ज्यादा टिप्पणी नहीं करना चाहता. लेकिन आजादी के 60 साल बीतने के बाद अब पूरे देश में यह बहस चलाई जानी चाहिए कि क्या राज्यपाल के पद जरूरी हैं?"

नाराज़गी

माकपा और वाममोर्चा के नेताओं की तल्ख टिप्पणी समझी जा सकती है. राज्य में आम लोगों को इस गर्मी में बड़े पैमाने पर बिजली की कटौती झेलनी पड़ रही है. राज्यपाल का फैसला उनको सरकार पर तीखा प्रहार लग रहा है. राज्यपाल गांधी ने इससे पहले बीते साल के आखिर में नंदीग्राम में जारी हिंसा पर कटु टिप्पणी करके सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया था.

गोपाल कृष्ण गांधी
राज्यपाल ने नंदीग्राम पर भी टिप्पणी की थी

राज्य के बिजली मंत्री मृणाल बनर्जी इस पर कहते हैं कि "अगर कोई व्यक्ति खाद्य संकट के चलते दिन में एक ही बार खाने का फैसला करता है तो इसमें हम क्या कर सकते हैं? वैसे, माकपा महासचिव प्रकाश कारत ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा है कि "अगर कोई बिजली बचाता है तो यह एक बड़ी बात है. हम भला इस पर आपत्ति क्यों करेंगे".

माकपा नेता विमान बसु ने सवाल किया कि "राज्यपाल ने दो घंटे बिजली कटौती का फैसला किया है. लेकिन तब वे इतनी बड़ी इमारत (राजभवन) में क्यों रह रहे हैं? राज्य के लाखों लोगों के सिर पर कोई छत नहीं है. राज्यपाल को भी किसी छोटे भवन या फ्लैट में रहना चाहिए".

राजभवन के एक अधिकारी बताते हैं कि रोजाना दो घंटे बिजली गुल रखने का प्रस्ताव खुद राज्यपाल ने ही दिया था. उनका प्रस्ताव सुनकर राजभवन के तमाम अधिकारी सकते में आ गए. राजभवन में एक अलग फीडर लाइन के जरिए चौबीसों घंटे बिजली की सप्लाई होती है. यानी वहां बिजली कभी गुल नहीं होती.

जब तमाम समझाने-बुझाने पर भी गांधी अपनी बात पर अड़े रहे तो रोजाना दो घंटे के लिए बिजली गुल रखने का फैसला किया गया. राजभवन में कोई जेनरेटर भी नहीं है. नतीजतन बुधवार की शाम को जब एक घंटे के लिए बिजली गुल हुई तो गोपाल कृष्ण गांधी ने मोमबत्तियों के सहारे ही समय बिताया.

 पहले बिजली की किल्लत जरूर थी. लेकिन अब चार परियोजनाओं से राज्य को 15 सौ मेगावाट अतिरिक्त बिजली मिलने की वजह से ऐसा कोई संकट नहीं है
मृणाल बनर्जी, बिजली मंत्री

राजभवन में पहली बार गुल होती बिजली और अंधेरे में डूबे राजभवन की कवरेज की लिए तमाम टीवी चैनलों और प्रिंट मीडिया के पत्रकारों ने पहले से ही राजभवन के मुख्यद्वार पर डेरा जमा लिया था.

बिजली मंत्री मृणाल बनर्जी कहते हैं कि "पहले बिजली की किल्लत जरूर थी. लेकिन अब चार परियोजनाओं से राज्य को 15 सौ मेगावाट अतिरिक्त बिजली मिलने की वजह से ऐसा कोई संकट नहीं है".

वे कहते हैं कि "कोलकाता में बिजली की कटौती तकनीकी वजहों से होती होगी, बिजली की कमी से नहीं".

उनकी यह गांधीगिरी कब तक चलती है, यह तो बाद में ही पता चलेगा. लेकिन कम से कम बुधवार को तो कोलकाता महानगर में एक सेकेंड के लिए बिजली की कटौती नहीं हुई. इससे पहले रोजाना एकाध घंटे की कटौती तो आम हो गई थी. यानी पहले दिन से ही गांधी की गांधीगिरी का थोड़ा-बहुत असर नजर आने लगा है.

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