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'गाँधीगीरी' लखनऊ की सड़कों पर | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
आम तौर पर कहा जाता है कि बंबइया फिल्में समाज में हिंसा और ग़लत जीवन मूल्यों को बढ़ावा देती हैं लेकिन लखनऊ में युवकों का एक जत्था सकिय हो गया है जिसका कहना है कि वह फ़िल्म से प्रेरणा लेकर गांधीवादी तरीकों से समस्याएँ हल करेगा. लेकिन फ़िल्मी तर्ज़ पर फूलों का गुलदस्ता भेंट कर एक सरदार जी की शराब की दुकान हटवाने के चक्कर में इन युवकों को कुछ देर हज़रतगंज इलाके में हिरासत में रहना पड़ा. शराब दुकानदार से सुलह समझौते के बाद ही इन्हें थाने से मुक्ति मिली. लेकिन थोड़ी देर की इस हिरासत से जितनी पब्लिसिटी मिली उससे इस नवसर्जित गांधी टोपी ब्रिगेड के हौसले बुलंद हैं. सरदार गुरनाम सिंह की शराब की यह दुकान राणा प्रताप मार्ग पर एक अंग्रेजी अख़बार के दफ्तर के बगल में है और वहीं सामने एक और छोटा सा मंदिर है. गुलज़ार कॉलोनी मुहल्ले के कुछ लोग यह दुकान हटवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक गए लेकिन सरकारी लाइसेंस होने की वजह से दुकान जहाँ की तहाँ है. फिल्म 'लगे रहे मुन्ना भाई' देखने से गुलज़ार कॉलोनी निवासी साड़ी व्यवसायी शिवकुमार लखानी को एक नया आइडिया सूझा. उन्होंने मोहल्ले के एक दर्जन लड़कों को गाँधी टोपी पहनाई और फूलों के गुच्छे लेकर निकल पड़े. सबसे पहले ये हाईकोर्ट गए और वकीलों के ज़रिए जज को फूलों के गुलदस्ते के साथ दुकान हटाने का ज्ञापन भेजा. फिर कचहरी जिला मजिस्ट्रेट और आबकारी कार्यालय भी फूल और ज्ञापन भेंट किया. यहाँ तक सब बढ़िया चल रहा था. इसके बाद ये एक टीवी न्यूज़ चैनल की टीम को लेकर शराब की दुकान के अंदर पहुंच गए. लखानी और उनके साथियों का कहना है कि वे तो दुकानदार गुरनाम सिंह और उनके बेटे दलजीत सिंह को गुलदस्ता देकर विनम्रता के साथ दुकान हटाने का अनुरोध करने गए थे लेकिन दलजीत सिंह ने पुलिस को ख़बर दी कि कुछ लोग उनकी दुकान लूटने आ गए हैं. दलजीत सिंह का आरोप है कि टोपी लगाए कुछ लड़के शराब की कुछ बोतलें भी हथियाने लगे थे. पुलिस फ़ौरन हरकत में आई और इन युवकों को जीप में बिठाकर थाने ले गई. सरदार दलजीत सिंह के मुताबिक सामने वाले मंदिर के केयरटेकर ने लिखकर दे रखा है कि उसको कोई आपत्ति नहीं है. मगर लखानी इस तर्क को नहीं मानते. अनुयायी लखानी कहते हैं कि इस फ़िल्म को देखने से मुझे बहुत प्रेरणा मिली है और अब हम गाँधी जी के बारे में सब कुछ पढ़कर उनके आदर्शों पर चलेंगे. लेकिन जहाँ तक उनके निजी बिजनेस का सवाल है लखानी का कहना है कि बिना बेईमानी कोई बिजनेस चल ही नहीं सकता.
गांधी टोपी लगाए युवक मिलन का कहना है कि अब वह गाँधीवादी हो गया है लेकिन जब सरदार दलजीत सिंह ने कहा कि ये सारे लड़के शराब पीते हैं तो उसने माना कि कभी-कभी आनंद पाने के लिए पार्टी में मैं शराब पी लेता हूँ. दुकानदार बाप-बेटे गुरनाम सिंह और दलजीत सिंह कहते हैं कि यह "गांधीगिरी नहीं, बल्कि दादागिरी है." इसी इलाक़े में रहने वाले एक कंप्यूटर इंजीनियर राजीव गर्ग इससे सहमत नहीं हैं. उनके अनुसार, यह केवल अपनी बात को शांतिपूर्वक कहने का तरीका है. बस कुछ और नहीं. गांधी बिग्रेड के एक अन्य सदस्य संदीप सेठ कहते हैं- "इस गांधीवादी विनम्र तरीक़े से हमको ज़रूर सफलता मिलेगी." मगर दुकानदार दलजीत सिंह कहते हैं कि "इस मुहिम के पीछे शराब के तस्कर हैं और वह उनको बेनकाब करके रहेंगे." फ़िल्म बनाना और देखना आसान हो सकता है, गांधी बनना इतना आसान नहीं लगता. |
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