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पति के इंतज़ार में पथराई आँखें... | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मोर्चे पर गए अपने पति के इंतज़ार में शांतामाया लिंबू की आँखें भले ही पथरा गई है लेकिन उन पथराई आँखों में उम्मीद अब भी बाकी है. नेपाल की शांतामाया लिंबू पिछले 66 सालों से अपने पति बाबूराजा का इतंज़ार कर रही है. बाबूराजा दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रितानी सैनिकों की तरफ़ से बर्मा में लड़ने गए थे और 1942 से लापता हैं. 81 वर्षीय शांतामाया ने वर्ष 1941 में आख़िरी बार अपने पति को देखा था जब वे 10 दिनों की छुट्टी पर घर आए थे. लेकिन छुट्टियों के ख़त्म होने के पहले ही बाबूराजा को बर्मा में छिड़ी लड़ाई में भाग लेने के लिए बुला लिया गया. बर्मा में उनकी ब्रिगेड के लोग ग़ायब हो गए. शांतामाया कहती है, "जब वे नौ वर्ष तक ग़ायब रहे तो मुझसे कहा गया कि सभी ग़ायब सैनिकों की मौत हो गई. लेकिन बिना उनका मुँह देखे मैं कैसे मान लूँ कि वे जीवित नहीं हैं?" वे कहती हैं, "शुरू में उनका चेहरा हर वक़्त मेरी आँखों के सामने घूमता रहता था. अब मैं सामान्य होने की कोशिश कर रही हूँ लेकिन मेरा दिल मुझे ऐसा करने नहीं देता." लंबी जुदाई
शांतामाया जब 14 वर्ष की थी तब उनकी शादी हो गई थी. जब बाबूराम लड़ाई पर गए तब उनकी शादी के एक वर्ष ही हुआ था. शांतामाया ने फिर शादी नहीं की. वे कहती हैं, "भले ही मैं अपने पति को बहुत अच्छी तरह नहीं समझ पाई, लेकिन मैं उनसे बहुत प्यार करती थी. वे मेरे सब कुछ हैं. मैं कैसे किसी और से शादी कर सकती हूँ?" भारतीय आर्मी पेंशन के हिसाब से उन्हें 4000 नेपाली रुपए मिलते हैं. लेकिन वे खुश नहीं है. वे कहती हैं, "मेरे पति ने ब्रितानी सरकार के लिए लड़ाई लड़ी थी. मुझे ब्रितानी पेंशन मिलना चाहिए, वे ब्रिटेन के लिए लड़ते हुए ही ग़ायब हुए थे." अपने पेंशन और पति के भाग्य के बारे में जानने के लिए उन्होनें कई भारतीय और ब्रितानी अधिकारियों से मुलाक़ात की लेकिन उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली. शांताराम की उम्र 81 वर्ष है. उनके कोई बच्चे नहीं हैं, वे अपने एक संबंधी के साथ रहती हैं. |
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